16-06-2026: ICAR-IVRI, मुक्तेश्वर में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
(तिथिः 16 जून, 2026)
जय हिन्द!
आज मुक्तेश्वर की इस पावन धरा पर उपस्थित होकर मैं जिस अलौकिक अनुभूति से अभिभूत हूँ, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
हिमालय की गोद में बसी यह तपोभूमि, देवदार और बुरांश से आच्छादित पर्वत श्रेणियाँ तथा इस संस्थान की शताब्दी से भी अधिक पुरानी गौरवशाली वैज्ञानिक परंपरा मिलकर इसे एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं। यहाँ उपस्थित होकर ऐसा प्रतीत होता है मानो मैं किसी संस्थान में नहीं, बल्कि एक ऐसे ज्ञानतीर्थ में खड़ा हूँ, जहाँ विज्ञान, सेवा और राष्ट्रनिर्माण का अद्भुत संगम साकार होता है।
आईवीआरआई मुक्तेश्वर केवल अनुसंधान का केंद्र नहीं है, बल्कि भारत के वैज्ञानिक पुरुषार्थ, नवाचार और राष्ट्रसेवा का प्रेरणास्रोत है। एक शताब्दी से अधिक समय से यह संस्थान पशु स्वास्थ्य, रोग नियंत्रण, जैव सुरक्षा तथा पशुधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देता आया है और देश के पशुधन संसाधनों की सुरक्षा तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
जब रिंडरपेस्ट जैसी महामारी ने देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट में डाल दिया था, तब इसी संस्थान के वैज्ञानिक प्रयासों ने पशुधन की रक्षा कर लाखों किसानों के जीवन को संबल प्रदान किया। यह गौरवशाली विरासत हमें विश्वास दिलाती है कि समाजोन्मुख विज्ञान ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति और आत्मनिर्भरता का आधार बनता है।
पशुधन की सुरक्षा और उत्पादकता केवल वैज्ञानिक दायित्व नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। हमारे पर्वतीय क्षेत्रों में पशुधन केवल आय का साधन नहीं, बल्कि परिवार की सामाजिक सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सम्मान का सबसे बड़ा आधार है। विशेष रूप से हमारी मातृशक्ति ने कठिन परिस्थितियों में पशुधन के माध्यम से परिवार और समाज की आर्थिक व्यवस्था को सशक्त बनाए रखा है।
जब किसी गाँव का पशु बीमार पड़ता है, तब केवल एक जीव नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका संकट में आ जाती है। ऐसे समय में जब वैज्ञानिक और पशु स्वास्थ्य विशेषज्ञ दूरस्थ गाँवों तक पहुँचकर समय पर परामर्श और उपचार उपलब्ध कराते हैं, तब किसान के चेहरे पर लौटने वाली मुस्कान ही अनुसंधान की सबसे बड़ी सफलता बन जाती है। यही विज्ञान की वास्तविक सामाजिक उपयोगिता है और यही मानवता की सर्वाेच्च सेवा भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान प्रयोगशालाओं और शोधपत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि सीधे खेतों और गाँवों तक पहुँचे। ‘‘लैब टू लैंड’’ की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब हमारे अनुसंधान का लाभ सीमांत किसान और अंतिम पंक्ति में खड़े पशुपालक तक पहुँचे। किसी भी वैज्ञानिक उपलब्धि का सर्वाेच्च मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि उसने अंतिम पंक्ति में खड़े किसान और पशुपालक के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन लाया।
उत्तराखण्ड के समक्ष पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन एक गंभीर चुनौती है। लंबे समय से कहा जाता रहा है कि ‘‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती।’’ अब समय आ गया है कि हम इस धारणा को बदलें।
यदि विज्ञान आधारित डेयरी, बकरी पालन, कुक्कुट पालन, मधुमक्खी पालन तथा अन्य पशुधन आधारित गतिविधियों को आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए, तो स्थानीय युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और विकसित उत्तराखण्ड का सपना साकार होगा।
मुझे विश्वास है कि यदि यह संस्थान स्थानीय युवाओं को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन तथा उद्यमिता से जोड़ने का अभियान चलाए, तो पशुपालन केवल परंपरागत व्यवसाय न रहकर एक सशक्त ग्रामीण उद्यम और नवाचार आधारित स्टार्टअप मॉडल बन सकता है, जो पलायन रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
आज जब जलवायु परिवर्तन वैश्विक चुनौती बन चुका है, तब पशु स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। बदलती जलवायु के कारण लम्पी जैसी नई बीमारियाँ तथा अनेक जूनोटिक रोग हमारे सामने चुनौती बनकर उभर रहे हैं।
ऐसे समय में ‘‘वन हेल्थ’’ की अवधारणा को मिशन मोड में अपनाना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि मानव, पशु और पर्यावरण का स्वास्थ्य परस्पर इतना गहराई से जुड़ा है कि किसी एक की सुरक्षा, शेष दोनों की सुरक्षा की भी अनिवार्य शर्त है।
उत्तराखण्ड जैव विविधता का अनुपम धनी प्रदेश है। हमारी स्वदेशी नस्लें, विशेषकर औषधीय गुणों से समृद्ध बद्री गाय तथा पर्वतीय भेड़-बकरियाँ, हमारी पारिस्थितिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके आनुवंशिक संरक्षण और उत्पादकता वृद्धि के लिए दीर्घकालिक वैज्ञानिक रोडमैप तैयार किया जाना समय की आवश्यकता है।
इसके साथ-साथ प्राकृतिक खेती, जीवामृत, पंचगव्य तथा अन्य पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का वैज्ञानिक परीक्षण एवं प्रमाणीकरण कर उन्हें व्यापक स्तर पर बढ़ावा देना चाहिए। इससे उत्तराखण्ड को जैविक कृषि के क्षेत्र में राष्ट्रीय नेतृत्व प्राप्त हो सकता है और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।
आज डिजिटल क्रांति का युग है। उत्तराखण्ड की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (।प्), टेली-वेटरिनरी सेवाओं तथा डिजिटल तकनीकों का व्यापक उपयोग समय की आवश्यकता है।
ऐसे सरल डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए जाने चाहिए जिनके माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालक सीधे वैज्ञानिकों से जुड़कर त्वरित परामर्श प्राप्त कर सकें। ज्ञान का प्रसार जितनी सरल और स्थानीय भाषा में होगा, उसका प्रभाव उतना ही व्यापक होगा। डिजिटल तकनीक विज्ञान और समाज के बीच की दूरी को न्यूनतम करने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है।
मेरे युवा वैज्ञानिकों और छात्र-छात्राओं,
ज्ञान की वास्तविक सार्थकता समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में आशा का संचार करने में है। विज्ञान तभी पूर्ण होता है जब उसमें मानवीय संवेदना का स्पर्श हो। विज्ञान के मस्तिष्क और करुणा से भरे हृदय का यह समन्वय ही राष्ट्रनिर्माण की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है।
अनुसंधान तभी सार्थक होता है जब उसका परिणाम समाज के जीवन में परिवर्तन के रूप में दिखाई दे। मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि समय-समय पर गाँवों में जाएँ, किसानों और पशुपालकों के बीच बैठें, उनकी वास्तविक समस्याओं को समझें और फिर प्रयोगशाला में लौटकर उनके सरल, सस्ते तथा व्यावहारिक समाधान विकसित करें। आपके अनुसंधान की वास्तविक सफलता तभी होगी, जब उसका प्रत्यक्ष लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।
मैं विशेष रूप से उत्तराखण्ड की मातृशक्ति का उल्लेख करना चाहूँगा, जो खेत, जंगल और पशुधन-तीनों की वास्तविक संरक्षक रही है। यदि विज्ञान उनके श्रम को कम करने वाली तकनीकों तथा महिला-अनुकूल उपकरणों का विकास करेगा, तो उसका लाभ केवल परिवार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे ग्रामीण समाज की प्रगति का आधार बनेगा।
अंत में, मैं इस संस्थान से एक विनम्र अपेक्षा करता हूँ कि आने वाले वर्षों में आईवीआरआई मुक्तेश्वर उत्तराखण्ड के कम से कम सौ मॉडल पशुपालक गाँव विकसित करने का संकल्प ले, जहाँ वैज्ञानिक पशुपालन, जैविक कृषि और स्थानीय उद्यमिता का समन्वय हो। ऐसे आदर्श गाँव विकसित उत्तराखण्ड की मजबूत आधारशिला बनेंगे और पूरे देश के लिए आत्मनिर्भर ग्रामीण विकास का प्रेरक मॉडल प्रस्तुत करेंगे।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपकी निष्ठा, अनुसंधान क्षमता और राष्ट्रसेवा की भावना के बल पर यह संस्थान आने वाले समय में नई ऊँचाइयों को प्राप्त करेगा तथा विकसित भारत और विकसित उत्तराखण्ड के निर्माण में अपनी ऐतिहासिक भूमिका का और अधिक विस्तार करेगा।
आइए! हम सब मिलकर विज्ञान को सेवा का माध्यम, अनुसंधान को राष्ट्रनिर्माण का साधन और ज्ञान को जनकल्याण का आधार बनाने का संकल्प लें।
इस आशा और विश्वास के साथ मैं आप सभी के उज्ज्वल भविष्य तथा इस प्रतिष्ठित संस्थान की निरंतर प्रगति की कामना करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!