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    31-10-2026 : लोक भवन में आयोजित विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के स्थापना दिवस समारोह में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अक्टूबर 31, 2026

    आदरणीय अतिथिगण, विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों से पधारे महानुभावों, देवियों एवं सज्जनों! आप सभी का हृदय से अभिवादन करता हूँ।

    ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ अभियान के अंतर्गत देवभूमि उत्तराखण्ड के लोक भवन में आयोजित इस समारोह में आप सभी का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन है।

    आज हम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के स्थापना दिवस तथा 01 नवम्बर को स्थापना दिवस मनाने वाले मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और दिल्ली, चंडीगढ़, पुडुचेरी, लक्षद्वीप तथा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की गौरवशाली विरासत का उत्सव मना रहे हैं। मैं इन सभी प्रदेशों के नागरिकों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ।

    राष्ट्र की एकता और अखण्डता की रक्षा प्रत्येक भारतीय का परम कर्तव्य है। व्यक्तिगत एवं पारिवारिक हितों से ऊपर राष्ट्रहित को सर्वाेपरि रखना ही सच्ची राष्ट्रनिष्ठा है। जब मातृभूमि के प्रति समर्पण हमारे प्रत्येक कार्य की प्रेरणा बनता है, तभी सशक्त और अखण्ड भारत का संकल्प साकार होता है।

    आदरणीय सज्जनों,

    आज 31 अक्टूबर को हम भारत की एकता के महान शिल्पकार, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जी का स्मरण कर रहे हैं। स्वतंत्रता के समय देशी रियासतों का एकीकरण और नवस्वतंत्र भारत की अखण्डता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती थी। सरदार पटेल जी ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और कूटनीतिक कुशलता से 560 से अधिक रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनके इस योगदान से ही आधुनिक भारत के राजनीतिक एकीकरण की आधारशिला मजबूत हुई।

    उन्होंने सिद्ध किया कि जब राष्ट्रहित सर्वाेपरि हो और संकल्प दृढ़ हो, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। आज का एकीकृत भारत उनके दूरदर्शी नेतृत्व और राष्ट्रनिष्ठा का साक्षी है। राष्ट्रीय एकता दिवस पर मैं ऐसे महान राष्ट्रनायक को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।

    इसी राष्ट्रीय एकात्मता को जन-जन के हृदय में और अधिक प्रगाढ़ बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 31 अक्टूबर, 2015 को ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ अभियान की घोषणा की। यह पहल विभिन्न राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के नागरिकों के बीच सांस्कृतिक संवाद, पारस्परिक समझ और आत्मीयता बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है।

    इस अभियान का संदेश स्पष्ट है-हम अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं पर गर्व करें तथा दूसरों की विशिष्टताओं का भी सम्मान करें। जब एक प्रदेश का विद्यार्थी दूसरे प्रदेश की संस्कृति को समझता है, जब राज्यों के बीच ज्ञान और अनुभव साझा होते हैं और जब नागरिक एक-दूसरे की उपलब्धियों से प्रेरणा लेते हैं, तब राष्ट्रीय एकता केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव बन जाती है।

    देवियों एवं सज्जनों,

    भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की हिमालयी भव्यता, मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहर, कर्नाटक की संगीत एवं ज्ञान परंपरा, छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, हरियाणा की खेल भावना, पंजाब की वीरता और सेवा-परंपरा, केरल की सांस्कृतिक समृद्धि, आंध्र प्रदेश की साहित्यिक विरासत तथा तमिलनाडु की प्राचीन सभ्यता हमारी राष्ट्रीय संस्कृति के अनमोल आयाम हैं। दिल्ली, चंडीगढ़, पुडुचेरी, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की विशिष्ट पहचान भी भारत की बहुरंगी विरासत को समृद्ध करती है।

    हमारी भाषाएँ अनेक हैं, हमारी वेशभूषाएँ विविध हैं, हमारी परंपराएँ अलग-अलग हैं; किंतु हमारी मातृभूमि एक है और हमारा राष्ट्रीय संकल्प एक है। विविधता हमारी पहचान है, एकता हमारी शक्ति है और राष्ट्रभक्ति हमारा साझा आधार है।

    हमारी प्राचीन सभ्यता ने सदैव समन्वय और सह-अस्तित्व का संदेश दिया है। ऋग्वेद का उद्घोष है-

    “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”

    अर्थात् हम साथ चलें, संवाद करें और हमारे विचारों में सामंजस्य हो। यह वैदिक संदेश आज भी हमें प्रेरित करता है कि हम अपनी विशिष्टताओं को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रहित के सूत्र में एकजुट रहें।

    उत्तराखण्ड की यह पावन भूमि भगवान शिव की तपोभूमि, माँ गंगा के उद्गम की भूमि और ऋषियों-मुनियों की साधना-स्थली है। यहाँ की आध्यात्मिक चेतना, वीर सैनिकों का शौर्य, लोकसंस्कृति और जनसेवा की परंपरा भारत की साझा विरासत को समृद्ध करती है। देवभूमि हमें सिखाती है कि राष्ट्रप्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा, त्याग और समाज के प्रति उत्तरदायित्व में प्रकट होना चाहिए।

    प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट सामर्थ्य है। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, प्रौद्योगिकी, पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में परस्पर सहयोग से हम एक-दूसरे से काफी कुछ सीख सकते हैं। हमें सांस्कृतिक आदान-प्रदान को समारोहों तक सीमित न रखकर विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं और उद्यमियों के जीवन से जोड़ना होगा।

    आत्मनिर्भर भारत, समृद्ध भारत और विकसित भारत का निर्माण हमारा सामूहिक लक्ष्य है। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक राज्य का सामर्थ्य राष्ट्र की शक्ति बने और प्रत्येक नागरिक को प्रगति के अवसर मिलें। युवा नवाचार करें, महिलाएँ राष्ट्रनिर्माण में प्रभावी भागीदारी निभाएँ, किसान और श्रमिक समृद्ध हों तथा विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। हमारी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी इसी राष्ट्रीय दायित्व का अभिन्न अंग है।

    हमारा संविधान राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, बंधुत्व और नागरिक कर्तव्यों का मार्गदर्शन करता है। अधिकारों के प्रति जागरूकता के साथ अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

    आदरणीय अतिथिगण,

    आज इस पावन अवसर पर मैं आप सभी से आह्वान करता हूँ-आइए, हम संकल्प लें कि अपने प्रदेश की प्रगति के साथ राष्ट्र की उन्नति को भी सर्वाेपरि रखेंगे। हम भाषायी और सांस्कृतिक विविधताओं का सम्मान करेंगे, राज्यों के बीच आत्मीयता बढ़ाएँगे और राष्ट्रीय एकता को अपने आचरण से सुदृढ़ करेंगे। हमारी युवा पीढ़ी भारत की विविधता को पहचाने, हमारी भावी पीढ़ियाँ अपनी विरासत पर गर्व करें और प्रत्येक नागरिक विकसित भारत के निर्माण में अपना योगदान दे।

    हम ऐसा भारत बनाएँ, जहाँ विविधता विभाजन नहीं, शक्ति बने; जहाँ प्रगति कुछ क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे; और जहाँ राष्ट्रीय एकता केवल हमारा आदर्श नहीं, बल्कि हमारा जीवन-मूल्य बने।

    आइए, सरदार वल्लभभाई पटेल जी के राष्ट्रनिष्ठा के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प को जन-जन के जीवन का हिस्सा बनाएँ।

    अंत में, सभी संबंधित राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के नागरिकों को स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए, उनके उज्ज्वल भविष्य और निरंतर प्रगति की कामना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय!