30-04-2024:श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में “एक मानवता, एक हृदयः श्री गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षाएँ” विषय पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
भारत के पूर्व राष्ट्रपति, आदरणीय श्री राम नाथ कोविंद जी, परम पूज्य दाजी, उपस्थित देवतुल्य संतगण, प्रबुद्ध महानुभावों और विश्वभर से पधारे सभी साधकगण, आप सभी को हृदय से सादर अभिवादन।
अंतर्मन की दिव्यता और वैश्विक चेतना
‘कान्हा शांति वनम’ की इस पावन भूमि पर उपस्थित होकर ऐसा अनुभव हो रहा है मानो हृदय स्वयं ब्रह्मांड की लय से जुड़ गया हो। यह स्थान केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि आधुनिक युग का एक जीवंत आध्यात्मिक तीर्थस्थल है, जहाँ साधना, सेवा और समर्पण की धाराएँ मिलकर मानवता के वैश्विक परिवार का निर्माण करती हैं।
हृदयः चेतना और दिव्यता का केंद्र
हृदय केवल शरीर की धड़कन नहीं, बल्कि हमारे चित, चेतना और आत्मा का वास्तविक केंद्र है। हमारे शास्त्र कहते हैं-
“हृदि अयम् इति हृदयम्”। अर्थात् परमात्मा का निवास स्थान ही हृदय है।
सत्य का मार्ग किसी बाहरी खोज में नहीं, बल्कि हमारे अंतर्मन की उस पवित्र आवाज में निहित है, जिसे हम ‘दिल की पुकार’ कहते हैं। ध्यान के माध्यम से जब हम अपने हृदय की गहराइयों में उतरते हैं, तब हमें अनुभव होता है कि जिस शांति और प्रेम को हम बाहर खोजते हैं, वह हमारे भीतर ही विद्यमान है।
आध्यात्मिक त्रिवेणी का दिव्य संगम
आज हम तीन महान आध्यात्मिक धाराओं के पावन संगम पर उपस्थित हैं- पूज्य बाबूजी महाराज, जिन्होंने ध्यान को जन-जन तक पहुँचाकर ईश्वर तक पहुँचने का सरल हृदय-पथ दिखाया; राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज, जिन्होंने समाज को नैतिकता, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रसेवा का संदेश दिया और इस आयोजन की आत्मा, सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी, जिनकी 350वीं शहादत वर्षगांठ हमें त्याग, साहस और मानवता के सर्वाेच्च आदर्शों की स्मृति कराती है।
गुरु तेग बहादुर जी का व्यक्तित्व और ध्येय
गुरु तेग बहादुर जी का जीवन केवल एक संत का जीवन नहीं था, वह एक ऐसा प्रकाशस्तंभ था, जिसने मानवता को साहस, त्याग और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। जब अन्याय चरम पर था, जब आस्था पर आघात हो रहा था- तब गुरु तेग बहादुर जी ने केवल उपदेश नहीं दिया, बल्कि इतिहास को अपने बलिदान से दिशा दी।
कश्मीरी पंडितों की पुकार
इतिहास साक्षी है, जब लगभग 500 कश्मीरी पंडित अत्यंत पीड़ा और भय की अवस्था में उनके पास पहुँचे, तब गुरु तेग बहादुर जी ने उनके दर्द को अपना दर्द बना लिया। उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन या मृत्यु के विकल्प के बीच चुनने को विवश किया जा रहा था। यह केवल एक समुदाय का संकट नहीं था, यह मानवता की आत्मा पर आघात था।
बलिदान का संकल्प
गुरु का हृदय करुणा से भर उठा, परंतु उनके निर्णय में अडिगता थी। उन्होंने यह निश्चय किया कि वे तलवार से नहीं, बल्कि अपने बलिदान से अन्याय को चुनौती देंगे। उन्हें बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। उनसे कहा गया, या तो चमत्कार दिखाइए या धर्म परिवर्तन कीजिए। परंतु उन्होंने शांत, स्थिर और निर्भीक भाव से दोनों प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने तीन प्रिय शिष्यों को अपने सामने यातना सहते और बलिदान होते देखा, परंतु उनके मन में कोई भय नहीं, कोई विचलन नहीं था।
हिंद की चादरः धर्म और मानवता के रक्षक
24 नवंबर, 1675 को दिल्ली के चाँदनी चौक में उन्होंने अपना शीश अर्पित कर दिया, परंतु अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। यह केवल एक शहादत नहीं थी- यह अन्याय पर अंतरात्मा की विजय थी, यह भय पर सत्य की विजय थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि “सच्चा धर्म वही है, जो दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए भी खड़ा हो।” इसीलिए उन्हें “हिंद की चादर”- भारत की ढाल कहा जाता है। उनका बलिदान भारत की आत्मा का वह उज्ज्वल अध्याय है, जो युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।
एक नई चेतना का उदयः खालसा का निर्माण
उनकी शहादत अंत नहीं थी, वह एक क्रांति का प्रारंभ थी। उनके पुत्र, गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की, एक ऐसा दिव्य-सैनिक समुदाय, जिसने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष को अपना धर्म बनाया।
समता और साहस की विरासत
सिखों की वीरता, अनुशासन और बलिदान की परंपरा ने न केवल मुगल सत्ता को चुनौती दी, बल्कि एक ऐसे समाज की नींव रखी जहाँ समानता, समरसता और जाति-मुक्ति के आदर्श स्थापित हुए। आज सिख संस्कृति में जो समतावाद, सामाजिक न्याय और मानव समानता के मूल्य दिखाई देते हैं, वे गुरु तेग बहादुर जी के सर्वाेच्च बलिदान की ही देन हैं।
आज के युग में प्रासंगिकता
आज के इस युग में, जब दुनिया विभाजन, असहिष्णुता और संघर्षों से जूझ रही है, गुरु तेग बहादुर जी की शिक्षाएँ पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। वे हमें सिखाते हैं, कि सच्ची शक्ति भीतर की शांति में है, सच्चा साहस सत्य पर अडिग रहने में है, और सच्ची भक्ति मानवता की सेवा में है।
विकास और मूल्यः गुरु की शिक्षाओं का आधुनिक प्रतिरूप आज भारत “विकसित भारत 2047” के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। परंतु यह विकास तभी सार्थक होगा, जब उसमें गुरु तेग बहादुर जी जैसे महापुरुषों के आदर्शों का समावेश होगा, जहाँ प्रगति के साथ करुणा हो, शक्ति के साथ नैतिकता हो, और विकास के साथ मानवता हो।
एक मानवता, एक हृदयः अंतर्मन का आह्वान
इस अवसर पर मैं यही कहना चाहूँगा- गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान केवल इतिहास नहीं है, वह एक जीवंत चेतना है, एक दिव्य प्रेरणा है, एक मार्गदर्शक प्रकाश है। आइए, हम उस प्रकाश को अपने भीतर प्रज्वलित करें और एक ऐसे विश्व का निर्माण करें, जहाँ वास्तव में “एक मानवता, एक हृदय” का स्वप्न साकार हो।
प्रकृति और आध्यात्मिकता का संतुलन
कान्हा शांति वनम हमें यह सिखाता है कि सच्चा विकास वही है, जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया जाए। यहाँ का हर वृक्ष, हर वातावरण यह संदेश देता है कि प्रकृति ही ईश्वर की प्रथम अभिव्यक्ति है। यदि हम प्रकृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो हमारी आध्यात्मिकता अधूरी रह जाएगी।
युवाओं के लिए आह्वान
मेरे युवा मित्रों! आप इस राष्ट्र की ऊर्जा हैं। स्मरण रखें! बिना अध्यात्म के बुद्धि अहंकार बन जाती है, लेकिन जब वही बुद्धि हृदय से जुड़ती है, तो ‘प्रज्ञा’ बन जाती है। इस डिजिटल युग के शोर में ध्यान आपका सुरक्षा कवच है। यह केवल एकाग्रता ही नहीं बढ़ाता, बल्कि आपके चरित्र का निर्माण करता है। याद रखिए! भविष्य उन्हीं का होता है, जिनका हृदय जागृत होता है।
सेवा और समर्पण की भावना
यहाँ के स्वयंसेवकों की निस्वार्थ सेवा वास्तव में प्रेरणादायी है। यही सच्चा योग है- जब कर्म में समर्पण और सेवा का भाव जुड़ जाता है। जैसा गीता में कहा गया है-“योगः कर्मसु कौशलम्”। अर्थात कुशलता और निष्ठा से किया गया कार्य ही योग है।
आंतरिक शांति से वैश्विक शांति
आज विश्व अशांति से जूझ रहा है, लेकिन शांति बाहर नहीं, हमारे भीतर है। जब तक व्यक्ति के मन में द्वंद्व रहेगा, तब तक विश्व में शांति संभव नहीं है। इसलिए शांति की शुरुआत हृदय से ही करनी होगी और हार्टफुलनेस इसी दिशा में एक महान प्रयास है।
भारतः आध्यात्मिक गुरु की परंपरा
यह पावन स्थल इस शाश्वत सत्य का जीवंत प्रमाण है कि भारत आज भी विश्व को आध्यात्मिक दिशा देने की अद्भुत क्षमता रखता है। श्री राम चंद्र मिशन ने ‘सहज मार्ग’ को आधुनिक और वैज्ञानिक स्वरूप देकर विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया है। पूज्य दाजी का मार्गदर्शन इस युग की आवश्यकता है, जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
समापन आह्वान
अंत में, मैं आप सभी से यही विनम्र आह्वान करूँगा कि यहाँ से प्राप्त इस दिव्य अनुभूति को अपने जीवन में उतारें। दुनिया को आज शब्दों की नहीं, बल्कि उदाहरणों की आवश्यकता है। आप स्वयं एक ऐसी जीवंत प्रेरणा बनें, जिससे “एक मानवता, एक हृदय” का संदेश प्रस्फुटित हो।
इसी मंगल भावना के साथ, आइए! हम सब मिलकर प्रार्थना करें-
सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।
जय हिन्द! जय भारत!