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    28-04-2026:आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर, बैंगलुरु में आयोजित कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अप्रैल 28, 2026

    जय हिन्द!

    मंगलमय वंदन एवं दिव्य अनुभूति

    परम श्रद्धेय श्री श्री रविशंकर जी, देश-विदेश से पधारे प्रबुद्ध अतिथिगण, तथा आर्ट ऑफ लिविंग परिवार के समर्पित स्वयंसेवक भाइयों एवं बहनों! आप सभी को मेरा सप्रेम प्रणाम।

    इस पावन आश्रम की दिव्य भूमि पर उपस्थित होकर मैं स्वयं को अत्यंत धन्य और कृतार्थ अनुभव कर रहा हूँ। यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा, शांति और सकारात्मकता हृदय को गहराई तक स्पर्श कर रही हैं। यह केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि जागृत चेतना का प्रेरणास्थल है, जहाँ से शांति, प्रेम और करुणा का प्रकाश समस्त विश्व में आलोकित हो रहा है।

    देवभूमि से तपोभूमि का दिव्य संगम

    मैं उत्तराखण्ड की उस पावन भूमि से आया हूँ, जिसे ‘देवभूमि’ कहा जाता है, जहाँ के कण-कण में भगवान शिव की उपस्थिति का दिव्य अनुभव होता है, और जहाँ हिमालय की शांति में भी तप, साधना और आध्यात्म की गूंज सुनाई देती है।

    आज कर्नाटक की इस तपोभूमि में उपस्थित होकर यह अनुभव होता है कि उत्तर और दक्षिण का यह संगम भौगोलिक सीमाओं से परे, भारत की अखंड आध्यात्मिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। यह पावन संगम हमें स्मरण कराता है कि हमारी वास्तविक शक्ति हमारी विविधता में निहित उस अद्वितीय एकता में है, जो भारत की आत्मा को सशक्त और चिरस्थायी बनाती है।

    45 वर्षों की प्रेरणादायी यात्रा

    आज हम आर्ट ऑफ लिविंग के 45 स्वर्णिम वर्षों का उत्सव मना रहे हैं। वर्ष 1981 में परम श्रद्धेय श्री श्री रविशंकर जी द्वारा बोया गया एक छोटा सा बीज आज एक विराट वटवृक्ष का रूप ले चुका है, जिसकी शाखाएँ विश्व के 180 से अधिक देशों तक फैलकर मानवता को शांति और संतुलन का संदेश दे रही हैं। इसकी छाया में करोड़ों लोग मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संतुलन का अनुभव कर रहे हैं।

    यह केवल एक संगठन की यात्रा नहीं, बल्कि मानव चेतना के उत्कर्ष की दिव्य यात्रा है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सनातन आदर्श आज सजीव रूप में साकार हो रहा है, जहाँ समूचा विश्व एक परिवार के रूप में जुड़कर शांति, प्रेम और सामूहिक कल्याण की दिशा में अग्रसर है।
    गुरुदेव का प्रेरणामय जीवन

    आगामी 13 मई 2026 को हम परम श्रद्धेय श्री श्री रविशंकर जी का 70वाँ जन्मदिवस श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ मनाने जा रहे हैं। आपका सम्पूर्ण जीवन मानवता की सेवा, वैश्विक शांति की स्थापना और आत्मिक जागरण के लिए समर्पित रहा है।

    आपने विश्व को ‘सुदर्शन क्रिया’ जैसा दिव्य साधन प्रदान किया, जिसने आधुनिक जीवन के तनाव, अशांति और मानसिक दबाव से मुक्ति का सरल एवं प्रभावी मार्ग दिखाया। गुरुदेव का जीवन हमें यह स्पष्ट संदेश देता है कि सच्चा अध्यात्म केवल आत्म-कल्याण तक सीमित नहीं होता, बल्कि लोक-कल्याण के व्यापक उद्देश्य से जुड़कर ही पूर्णता प्राप्त करता है।

    ध्यान मंदिरः सामूहिक चेतना का केंद्र बिंदु

    हम सभी के लिए यह अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है कि इस पावन आश्रम में शीघ्र ही 20 हजार साधकों की क्षमता वाला भव्य ‘ध्यान मंदिर’ प्रारंभ होने जा रहा है। यह केवल एक स्थापत्य नहीं, बल्कि सामूहिक साधना और जागृत चेतना का विराट केंद्र होगा।

    जब हजारों साधक एक साथ ध्यान में लीन होंगे, तब उत्पन्न होने वाली सकारात्मक ऊर्जा केवल इस परिसर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि विश्व शांति, सामूहिक सद्भाव और मानवता के कल्याण की दिशा में एक शक्तिशाली प्रेरक बल के रूप में प्रसारित होगी।

    सेवाः सनातन का मूल मंत्र

    सनातन संस्कृति का मूल मंत्र “सेवा” है, और सेवा का अर्थ केवल दान नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से समाज और मानवता के कल्याण हेतु निरंतर समर्पण है। सेवा हमें अहंकार से मुक्त करती है, समर्पण हमें ईश्वर से जोड़ता है और कल्याण का भाव हमें समाज के प्रति उत्तरदायी बनाता है। यही तत्व एक सशक्त, संवेदनशील और समरस राष्ट्र की आधारशिला रखते हैं।

    “आर्ट ऑफ लिविंग” ने सेवा को आध्यात्म का अभिन्न अंग बनाकर इसे जन-आंदोलन का स्वरूप दिया है। आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण एवं नदी पुनर्जीवन, शिक्षा और ग्रामीण विकास, युवा सशक्तीकरण और नशामुक्ति जैसे विविध प्रयास इस सत्य को सशक्त रूप से स्थापित करते हैं कि सच्चा आध्यात्म केवल आत्म-कल्याण नहीं, बल्कि समाज के व्यापक कल्याण में ही अपनी पूर्णता पाता है।

    आंतरिक शांतिः जीवन का आधार

    सेना में कर्नल के रूप में सेवा के दौरान मुझे आर्ट ऑफ लिविंग का कोर्स करने का अवसर मिला, जिसने मेरे दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। उस अनुभव ने मुझे यह सिखाया कि जीवन केवल संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन, सजगता और आंतरिक शांति की साधना भी है। “जीने की कला” वास्तव में ऐसी साधना है, जिसे अपनाकर मनुष्य हर परिस्थिति में संतुलित, सकारात्मक और प्रसन्न रह सकता है, और यही आंतरिक शांति एक सशक्त समाज और समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला बनती है।

    योग और ध्यानः आत्मबोध से परमबोध तक का सेतु

    योग और ध्यान मात्र शारीरिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का दिव्य सेतु हैं। जब मन स्थिर, निर्मल और एकाग्र होता है, तब भीतर का प्रकाश प्रकट होता है और उसी आत्मजागरण में परम सत्य का साक्षात्कार संभव होता है। यही सनातन का शाश्वत संदेश है- “अहं ब्रह्मास्मि”, अर्थात् आत्मा और ब्रह्म का अद्वैत एकत्व।

    सनातन प्रतीकों का गूढ़ दर्शन

    हमारे शास्त्र प्रतीकों के माध्यम से गहन और जीवनोपयोगी ज्ञान का संप्रेषण करते हैं। महाराज दशरथ के ‘दस रथ’ केवल एक कथा नहीं, बल्कि हमारी दस इंद्रियों पर संयम और नियंत्रण का दार्शनिक संकेत हैं। उसी प्रकार माँ दुर्गा के 10 महाविद्या स्वरूप, जीवन के विभिन्न आयामों में शक्ति, करुणा और संतुलन का संदेश देते हैं। जब हम इन प्रतीकों के वास्तविक अर्थ को आत्मसात करते हैं, तभी सनातन का यह दिव्य ज्ञान हमारे जीवन में उतरकर हमें सजग, संतुलित और समर्थ बनाता है।
    अंतरात्मा की पहचानः त्रिनेत्र की दिव्य दृष्टि

    आज के युग में हमें बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बाह्य जगत को देखने में तल्लीन हम अपनी ही अंतरात्मा से दूर होते जा रहे हैं। सनातन दर्शन हमें ‘त्रिनेत्र’ की वह दिव्य दृष्टि प्रदान करता है- पहला नेत्र, जो भौतिक जगत को देखता है; दूसरा नेत्र, जो ज्ञान और विवेक का मार्ग प्रशस्त करता है; और तीसरा नेत्र, जो आत्मचेतना और परम सत्य का साक्षात्कार कराता है।

    जब हम पंचतत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को इस त्रिनेत्र की दृष्टि से देखते हैं, तब हमें केवल प्रकृति नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के गूढ़ सत्य का बोध होता है। यही आत्म-जागरण हमें भीतर से प्रकाशित कर, जीवन को सार्थक और दिव्य बनाता है।

    ब्रह्म-ज्ञान और गुरु परंपरा का प्रकाश

    सनातन परंपरा हमें केवल आस्था नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के गूढ़ सत्य का साक्षात् ज्ञान कराती है। यही ज्ञान जब गुरु परंपरा के माध्यम से जीवन में उतरता है, तो वह अध्यात्म को कर्म, साहस और त्याग से जोड़ देता है। सिख गुरु परंपरा इसका उज्ज्वल उदाहरण है, जहाँ ध्यान के साथ-साथ धर्म, कर्तव्य और मानवता की रक्षा का संदेश मिलता है।

    गुरु नानक देव जी का “एक ओंकार” का उद्घोष सम्पूर्ण सृष्टि की एकता का सशक्त संदेश है। गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा का अनुपम आदर्श है, और गुरु गोविंद सिंह जी का अदम्य साहस और पराक्रम हमें सत्य और धर्म के लिए अडिग खड़े रहने की प्रेरणा देता है। यह गुरु परंपरा हमें सिखाती है कि सच्चा अध्यात्म आत्मचिंतन के साथ-साथ मानवता की रक्षा और सत्य के लिए समर्पित जीवन जीने का मार्ग है।

    राष्ट्रः हमारे संस्कारों का डीएनए

    हमारे लिए राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमाओं का मानचित्र नहीं, बल्कि हमारी आत्मा का विस्तार है। हमारे संस्कार, संस्कृति और चेतना के प्रत्येक कण में राष्ट्र के प्रति समर्पण स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। भारत का वास्तविक डीएनए अध्यात्म, सेवा और त्याग की उस महान परंपरा से निर्मित है, जो हमें केवल नागरिक नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता बनने की प्रेरणा देती है।

    कोविड की सीखः मानवता का जागरण

    वैश्विक महामारी कोविड-19 ने समूची मानवता को गहराई से झकझोर दिया। इस अभूतपूर्व संकट ने हमें यह सिखाया कि जीवन अनिश्चित है, मानवता ही सर्वाेपरि धर्म है और आत्मिक शक्ति ही सच्ची शक्ति है। इस कठिन कालखंड ने हमें रुककर आत्म-चिंतन करने, अपने भीतर झाँकने और जीवन में संतुलन, संवेदना तथा सामूहिक उत्तरदायित्व को पुनः स्थापित करने की प्रेरणा दी। यही वह जागरण है, जो हमें अधिक सजग, सहृदय और सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर करता है।

    युवा शक्तिः राष्ट्रनिर्माण का जागृत संकल्प

    आज की युवा पीढ़ी हमारे राष्ट्र की सबसे बड़ी सामथ्र्य और भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति है। हमारी इस अमृत पीढ़ी के लिए केवल तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं, उन्हें संस्कार, चरित्र और आत्मिक चेतना से भी समृद्ध होना होगा। जब युवा अनुशासन, सेवा और सकारात्मकता को जीवन में अपनाएँगे, तभी उनकी सफलता समाज और राष्ट्र के लिए सार्थक सिद्ध होगी।

    आवश्यक है कि हमारी युवा शक्ति “राष्ट्र सर्वाेपरि” के भाव को आत्मसात कर, अपने कर्म, संकल्प और ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण में समर्पित करे। यही जागृत युवा शक्ति भारत को सशक्त, समृद्ध और विश्वगुरु बनाने की आधारशिला सिद्ध होगी। युवा ही नए भारत की दिशा और दशा दोनों तय करेंगे।

    समापनः आत्म-प्रकाश से विश्व-कल्याण

    भगवान बुद्ध का अमर संदेश- “अप्प दीपो भव”, हमें आज भी यही प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर ज्ञान, करुणा और चेतना का प्रकाश स्वयं प्रज्वलित करें। जब प्रत्येक व्यक्ति भीतर से प्रकाशित होगा, तभी समाज में सद्भाव और राष्ट्र के वास्तविक उत्थान का मार्ग प्रशस्त होगा।

    अंत में, मैं परम श्रद्धेय श्री श्री रविशंकर जी को उनके आगामी 70वें जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ, तथा आर्ट ऑफ लिविंग के 45 गौरवशाली वर्षों की इस प्रेरणादायी यात्रा पर आप सभी को बधाई देता हूँ।

    आइए! हम सब मिलकर एक ऐसे भारत और विश्व के निर्माण का संकल्प लें, जो तनाव-मुक्त, हिंसा-मुक्त और करुणा से परिपूर्ण हो, जहाँ मानवता सर्वाेपरि हो और शांति उसका आधार हो।

    ईश्वर आप सभी को स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रखें। परमपिता परमेश्वर सम्पूर्ण विश्व का कल्याण करें। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदेमातरम ! भारत माता की जय! जय हिन्द!