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    26-07-2026 : लोक भवन में आयोजित ‘‘वैदिक मानस योग’’ कार्यक्रम के समापन के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 26, 2026

    जय हिन्द!

    परम आदरणीय योगऋषि स्वामी रामदेव जी, आचार्य बालकृष्ण जी, पतंजलि योगपीठ से पधारे सभी विद्वानगण, सम्मानित अतिथिगण, शिक्षकगण, अभिभावक, मेरे प्रिय विद्यार्थियों तथा उपस्थित सभी देवियों और सज्जनों।

    आप सभी को मेरा स्नेहपूर्ण नमस्कार।

    आज लोक भवन में आयोजित वैदिक मानस योग कार्यक्रम में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। उत्तराखण्ड योग और अध्यात्म की पावन भूमि है। हमारा प्रदेश उत्तराखण्ड हिमालय की गोद में बसे होने के साथ-साथ, भारत की उस सनातन ज्ञानधारा का जीवंत केंद्र भी है, जिसने विश्व को शरीर, मन और आत्मा के संतुलन का मार्ग दिखाया है।

    साथियों,

    आज का युग अभूतपूर्व अवसरों का है, लेकिन चुनौतियों का भी है। तकनीक ने हमारे जीवन को गति दी है, परंतु उसी गति के साथ मानसिक तनाव, चिंता, एकाग्रता की कमी और भावनात्मक असंतुलन जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। विशेष चिंता का विषय यह है कि इन चुनौतियों का प्रभाव अब हमारे बच्चों और युवाओं पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। ऐसे समय में वैदिक मानस योग जैसी पहल केवल एक योग कार्यक्रम नहीं, बल्कि मन, मस्तिष्क और व्यक्तित्व के समग्र विकास का एक सशक्त माध्यम बनकर सामने आई है।

    मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई कि वर्ष 2014 में प्रारंभ हुई यह पहल अब पूरे देश के विद्यार्थियों के लिए एक सुव्यवस्थित स्वरूप ग्रहण कर रही है। अब तक पाँच हजार से अधिक छात्र-छात्राएँ इसका प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव किए गए हैं। इस कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल अनुभव पर आधारित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा भी प्रमाणित है।

    साथियों,

    मुझे बताया गया है कि अब तक वैदिक मानस योग पर तीन वैज्ञानिक शोध प्रकाशित हो चुके हैं, जो इसे भारत के उन विरले कार्यक्रमों में स्थान देते हैं जहाँ मस्तिष्क प्रशिक्षण की प्रक्रिया को वैज्ञानिक कसौटी पर परखा गया है। पहले अध्ययन में पाँच से पंद्रह वर्ष आयु के बच्चों पर तीन दिवसीय अभ्यास कराया गया। इसके परिणामों में बच्चों के मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार तथा उनकी आंतरिक चेतना में लगभग बाईस प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।

    दूसरे अध्ययन में एक सौ उनहत्तर स्कूली बच्चों पर किए गए शोध में यह पाया गया कि उनकी संज्ञानात्मक क्षमता में लगभग बावन प्रतिशत तक का सुधार हुआ। साथ ही चिंता, भावनात्मक अस्थिरता और नकारात्मक व्यवहार में कमी आई तथा सहयोग, अनुशासन और सकारात्मक व्यवहार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

    सबसे बड़े अध्ययन में पाँच सौ इकहत्तर किशोर विद्यार्थियों को सम्मिलित किया गया। मात्र तीन दिन के प्रशिक्षण के बाद उनकी बौद्धिक क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, भावनात्मक संतुलन और सकारात्मक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया।

    साथियों,

    यह अत्यंत उत्साहजनक है कि हमारे प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर परखा जा रहा है और उसके सकारात्मक परिणाम विश्व के सामने आ रहे हैं। भारत की ज्ञान परंपरा सदैव कहती आई है कि मन ही बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का मार्ग है। आज विज्ञान भी उसी सत्य की पुष्टि कर रहा है।

    आज पूरी दुनिया डमदजंस भ्मंसजीए म्उवजपवदंस प्दजमससपहमदबम और ठतंपद क्मअमसवचउमदज पर गंभीरता से कार्य कर रही है। नई नई तकनीकों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (।तजपपिबपंस प्दजमससपहमदबम) और तीव्र प्रतिस्पर्धा के इस युग में सबसे बड़ी चुनौती केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि मन को स्थिर रखना, सही निर्णय लेना और परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखना है।

    मेरा दृढ़ विश्वास है कि 21 वीं सदी की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा केवल तकनीक की नहीं होगी, बल्कि मन की स्थिरता, निर्णय क्षमता और भावनात्मक संतुलन की होगी। जिस राष्ट्र के युवाओं का मन सबसे अधिक सशक्त होगा, वही राष्ट्र विश्व का नेतृत्व करेगा।

    भारत सदियों पहले इस सत्य को जान चुका था। हमारे ऋषियों ने मन को ही जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला तत्व माना। ‘‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’’ – अर्थात् मनुष्य के बंधन और मुक्ति, दोनों का कारण उसका मन ही है। आज आधुनिक विज्ञान भी उसी सत्य को नए शब्दों में स्वीकार कर रहा है।

    इसलिए मुझे विशेष संतोष है कि वैदिक मानस योग केवल हमारी प्राचीन परंपरा का पुनस्मरण नहीं करा रहा, बल्कि उसे वैज्ञानिक अनुसंधानों के माध्यम से प्रमाणित भी कर रहा है। जब किसी भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रभावशीलता शोध और वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध होती है, तब वह केवल भारत की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की धरोहर बन जाती है।

    साथियों,

    मेरा मानना है कि यदि हमारे विद्यालयों में बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के साथ-साथ उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए, तो हम केवल सफल विद्यार्थी नहीं, बल्कि संवेदनशील, आत्मविश्वासी और उत्तरदायी नागरिक तैयार कर सकेंगे।

    हमारा लक्ष्य केवल स्किल डेवलपमेंट नहीं होना चाहिए, बल्कि माइंड डेवलपमेंट और कैरेक्टर डेवलपमेंट भी होना चाहिए। विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा, जब हमारे युवा शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से संतुलित, बौद्धिक रूप से सक्षम और नैतिक रूप से दृढ़ होंगे।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी विद्यार्थियों के समग्र विकास (भ्वसपेजपब क्मअमसवचउमदज) पर बल देती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो विचारों से समृद्ध हो, चरित्र से दृढ़ हो, भावनाओं से संतुलित हो और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझता हो।

    यदि विद्यालयों में ज्ञान के साथ-साथ मन के प्रशिक्षण को भी समान महत्व दिया जाए, तो हम ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो केवल सफल पेशेवर नहीं, बल्कि संवेदनशील नागरिक, सक्षम नेतृत्वकर्ता और सशक्त राष्ट्रनिर्माता बनेगी। यही विकसित भारत /2047 की वास्तविक आधारशिला है।

    मुझे विश्वास है कि पतंजलि योगपीठ द्वारा विकसित वैदिक मानस योग आने वाले समय में देशभर के विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों तक पहुँचेगा तथा नई पीढ़ी के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

    मैं पतंजलि योगपीठ, इस कार्यक्रम से जुड़े सभी शोधकर्ताओं, शिक्षकों तथा आयोजकों को हार्दिक बधाई देता हूँ। साथ ही सभी विद्यार्थियों से आग्रह करता हूँ कि वे योग को केवल एक अभ्यास न समझें, बल्कि उसे अपने जीवन का संस्कार बनाएँ। स्वस्थ शरीर, शांत मन और जागृत चेतना ही एक सशक्त व्यक्ति, सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र का आधार है।

    आइए, हम सब यह संकल्प लें कि योग को केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उसे जीवन जीने की कला बनाएँगे। हम अपने बच्चों को केवल बेहतर करियर ही नहीं, बल्कि बेहतर चरित्र, बेहतर चिंतन और बेहतर चेतना भी देंगे। क्योंकि जब मन स्वस्थ होता है, तभी समाज स्वस्थ बनता है; जब समाज स्वस्थ होता है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।

    इन्हीं शुभकामनाओं के साथ मैं पतंजलि योगपीठ के इस अभिनव प्रयास की पुनः सराहना करता हूँ और विश्वास व्यक्त करता हूँ कि वैदिक मानस योग आने वाले वर्षों में भारत के लाखों विद्यार्थियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनेगा।

    आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!