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    25-08-2026 : “मुक्त ज्ञान कोष” के लोकार्पण अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अगस्त 25, 2026

    जय हिन्द!

    आज “मुक्त ज्ञान कोष” के लोकार्पण के अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। जहाँ ज्ञान की रोशनी पहुँचती है, वहाँ अवसरों के नए द्वार खुलते हैं, और जहाँ अवसर पहुँचते हैं, वहाँ परिवर्तन की शुरुआत होती है। इस महत्वपूर्ण पहल के लिए मैं कुलपति प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी जी और उनकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई देता हूँ।

    किसी विश्वविद्यालय की वास्तविक पहचान उसके भवनों से नहीं, उसके ज्ञान, शोध, विचार और समाज के प्रति योगदान से होती है। इस दृष्टि से “मुक्त ज्ञान कोष” केवल एक डिजिटल मंच नहीं, बल्कि ज्ञान को समाज की शक्ति और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा सदैव ज्ञान के विस्तार और साझेदारी की रही है। ऋग्वेद का मंत्र है-

    “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।”
    अर्थात्, संसार की सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ। यही हमारी ज्ञान-परंपरा की उदारता है-सीखना, साझा करना और निरंतर आगे बढ़ना। आज आधुनिक तकनीक के माध्यम से इसी महान परंपरा को नई शक्ति देने का अवसर हमारे सामने है।

    मेरे लिए “मुक्त ज्ञान कोष” “राष्ट्र प्रथम” की भावना से जुड़ी एक महत्वपूर्ण पहल है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री या रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान नागरिक, चरित्रवान समाज और सक्षम राष्ट्र का निर्माण करना है। ज्ञान जब राष्ट्रहित से जुड़ता है, तभी शिक्षा की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होती है। शिक्षा व्यक्ति को सक्षम बनाती है, संस्कार उसे जिम्मेदार बनाते हैं और राष्ट्र प्रथम की भावना उसके ज्ञान को सही दिशा देती है।

    साथियों,

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और दूरगामी परिवर्तन हो रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने शिक्षा को बहुविषयकता, शोध, नवाचार, तकनीक, कौशल, भारतीय ज्ञान परंपरा और वैश्विक अवसरों से जोड़ने की नई दिशा दी है। “वन नेशन, वन सब्सक्रिप्शन” जैसी पहलें विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए विश्वस्तरीय शोध सामग्री तक पहुँच के नए द्वार खोल रही हैं।

    यह भारत को ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार की वैश्विक शक्ति बनाने की व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। आज उच्च शिक्षा का लक्ष्य केवल अधिक विद्यार्थियों को डिग्री देना नहीं, बल्कि उन्हें शोध, नवाचार, कौशल और वैश्विक ज्ञान से जोड़ना है। भारत की नई शिक्षा-दृष्टि इसी व्यापक परिवर्तन की ओर बढ़ रही है।

    इसी राष्ट्रीय ज्ञान-यात्रा को उत्तराखण्ड की आवश्यकताओं से जोड़ने में “मुक्त ज्ञान कोष” महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हमारा राज्य भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है और हमारे अनेक विद्यार्थी पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में रहते हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री को डिजिटल माध्यम से गाँव-गाँव और घर-घर तक पहुँचाना ज्ञान के लोकतंत्रीकरण और समान अवसर का सशक्त माध्यम है।

    यह केवल शिक्षा की पहुँच बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि प्रतिभा को उसकी भौगोलिक सीमाओं से मुक्त करने का प्रयास है। मैं इसे सरल शब्दों में कहूँ तो-पहाड़ में दूरी हो सकती है, लेकिन ज्ञान की पहुँच में दूरी नहीं होनी चाहिए।

    जब ज्ञान गाँव तक पहुँचता है, तो प्रतिभा को आगे बढ़ने के लिए अवसरों के नए द्वार खुलते हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि पहाड़ का युवा अपने क्षेत्र में रहते हुए भी सीख सके, अपने कौशल को विकसित कर सके और स्थानीय स्तर पर नए अवसरों का निर्माण कर सके। यही शिक्षा को सशक्तीकरण और विकास का माध्यम बनाने की दिशा है।

    मुक्त शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति है- सीखने को स्थान, समय और परिस्थितियों की सीमाओं से मुक्त करना। कोई युवा रोजगार के साथ पढ़ सकता है, कोई गृहिणी अपनी अधूरी शिक्षा पूरी कर सकती है और कोई भी व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर नया ज्ञान अर्जित कर सकता है। यही आजीवन शिक्षा है। “मुक्त ज्ञान कोष” इस निरंतर ज्ञान-यात्रा को गति देने का सशक्त माध्यम बने। क्योंकि जो समाज सीखना नहीं छोड़ता, उसकी प्रगति कभी रुकती नहीं।

    मुझे प्रसन्नता है कि उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय ने मुक्त शैक्षणिक संसाधनों की नीति लागू की है और “मुक्त ज्ञान कोष” में ई-पुस्तकों के साथ वीडियो व्याख्यान, शोध-पत्र, शोध डेटासेट, शोध प्रबंध, परियोजना प्रतिवेदन, पॉडकास्ट, वार्षिक प्रतिवेदन, विश्वविद्यालय की नीतियाँ, एसओपी तथा अन्य शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया है।

    यह भी सराहनीय है कि मंच 26 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के समर्थन की दिशा में कार्य कर रहा है। मेरी अपेक्षा है कि आने वाले समय में उत्तराखण्ड की स्थानीय भाषाओं, लोकज्ञान, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भी इसमें पर्याप्त स्थान मिले।

    मैं चाहूँगा कि “मुक्त ज्ञान कोष” केवल दुनिया का ज्ञान उत्तराखण्ड तक लाने का माध्यम न रहे, बल्कि उत्तराखण्ड के ज्ञान को दुनिया तक पहुँचाने का माध्यम भी बने।

    हिमालय की पारंपरिक कृषि, जल संरक्षण, औषधीय वनस्पतियाँ, लोक-चिकित्सा, पर्यावरण-संरक्षण, लोक-कला और सामुदायिक जीवन से जुड़ा हमारा ज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। इसे दस्तावेजीकृत, सुरक्षित और प्रमाणित करना हमारी जिम्मेदारी है। हमारा प्रयास केवल इस ज्ञान को सुरक्षित रखने तक सीमित न हो, इन परंपरागत ज्ञान-रूपों का आधुनिक शोध और वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन भी हो, ताकि हमारी विरासत केवल स्मृति बनकर न रह जाए, बल्कि नई पीढ़ी के लिए उपयोगी ज्ञान-संपदा बने।

    विद्वत साथियों,

    आज भारत “जय अनुसंधान” की भावना के साथ आगे बढ़ रहा है। शोध की वास्तविक सफलता तब है, जब वह समाज की किसी समस्या को समझने, उसका समाधान खोजने और जीवन को बेहतर बनाने में योगदान दे। शोध प्रयोगशालाओं और शोध-पत्रों तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यार्थियों, समाज और नीति-निर्माण तक पहुँचे। “मुक्त ज्ञान कोष” इस ज्ञान-प्रवाह को गति दे सकता है। हमारे विश्वविद्यालयों का शोध तभी सार्थक होगा, जब वह प्रयोगशाला से निकलकर खेत, गाँव, उद्योग, विद्यालय और समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान तक पहुँचे।

    मैं विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों से आग्रह करता हूँ कि इस मंच को केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम न बनाकर ज्ञान साझा करने का मंच भी बनाएँ। प्रत्येक शिक्षक और शोधकर्ता का योगदान इसे और समृद्ध करेगा।

    आज हम आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस के युग में हैं। एआई ज्ञान का विकल्प नहीं, बल्कि ज्ञान तक पहुँच, उसके विश्लेषण और उपयोग को अधिक प्रभावी बनाने का माध्यम है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो मशीनों से प्रतिस्पर्धा करने वाली पीढ़ी नहीं, बल्कि तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करने वाली पीढ़ी तैयार करे। हमें एआई का उपयोग उत्तर पाने के लिए ही नहीं, बेहतर प्रश्न पूछने, नए विचार खोजने और समस्याओं के समाधान विकसित करने के लिए भी करना होगा। तकनीक हमारी गति बढ़ा सकती है, लेकिन हमारी दिशा का निर्धारण हमारे मूल्य ही करेंगे।

    मेरे युवा साथियों,

    आपके हाथ में केवल मोबाइल फोन नहीं, ज्ञान की पूरी दुनिया तक पहुँचने का माध्यम है। इसका उपयोग अपने ज्ञान, कौशल और व्यक्तित्व के निर्माण के लिए कीजिए। प्रश्न पूछिए, सीखिए, शोध कीजिए और अपने ज्ञान को समाज तथा राष्ट्र की सेवा से जोड़िए।

    अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन अधिकारों के साथ कर्तव्यों, स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और विचारों के साथ संस्कार भी आवश्यक हैं। परिवर्तन केवल आक्रोश से नहीं, ज्ञान, चरित्र और सकारात्मक संकल्प से आता है।

    याद रखिए! ज्ञान आपको ऊँचाई देगा, लेकिन संस्कार उस ऊँचाई को गरिमा देंगे।

    मेरी अपेक्षा है कि उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय “मुक्त ज्ञान कोष” को इतना व्यापक, गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी बनाए कि देश के अन्य विश्वविद्यालय भी इसे अनुकरणीय मॉडल के रूप में देखें। यह उत्तराखण्ड के ज्ञान, शोध और बौद्धिक क्षमता की राष्ट्रीय पहचान बने।

    मैं ऐसे विकसित उत्तराखण्ड की कल्पना करता हूँ जहाँ दूरस्थ गाँव का विद्यार्थी भी श्रेष्ठ ज्ञान तक पहुँच सके, हमारी बेटियाँ और बेटे अपनी प्रतिभा को अवसरों की कमी से सीमित न करें और हमारे युवा ज्ञान, शोध, नवाचार तथा उद्यमिता के माध्यम से राज्य और देश के विकास में योगदान दें।

    ज्ञान की पहुँच बढ़ेगी, तो अवसर बढ़ेंगे, अवसर बढ़ेंगे, तो प्रतिभा आगे आएगी, और प्रतिभा आगे आएगी, तो उत्तराखण्ड की विकास-यात्रा नई गति पाएगी और भारत की शक्ति और मजबूत होगी।

    विकसित भारत का निर्माण ज्ञानवान, कुशल, चरित्रवान और जिम्मेदार नागरिकों से होगा। इसलिए शिक्षा में किया गया प्रत्येक निवेश राष्ट्र के भविष्य में निवेश है। ज्ञान में किया गया निवेश युवाओं के आत्मविश्वास को मजबूत करता है और राष्ट्र की विकास-यात्रा को गति देता है।

    इसी भावना के साथ “मुक्त ज्ञान कोष” के लोकार्पण पर उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय को हार्दिक शुभकामनाएँ। इस पहल से जुड़े सभी शिक्षकगण, शोधकर्ता, अधिकारी, कर्मचारी और तकनीकी टीम को हृदय से बधाई।

    आइए, संकल्प लें कि प्रतिभा को अवसरों की कमी से रुकने नहीं देंगे, तकनीक को मानवीय मूल्यों से जोड़ेंगे और शिक्षा को व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण की शक्ति बनाएँगे।

    ज्ञान से शक्ति, शक्ति से सेवा और सेवा से राष्ट्र निर्माण- यही “मुक्त ज्ञान कोष” की सार्थकता हो। इसी आशा, अपेक्षा और विश्वास के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!