24-08-2026 : ऑपरेशन सद्भावना के अंतर्गत राष्ट्रीय एकीकरण भ्रमण पर आए सीमावर्ती कुमाऊँ क्षेत्र के विद्यार्थियों को माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का संबोधन
जय हिन्द!
मेरे प्यारे बच्चों! कुमाऊँ के सीमावर्ती क्षेत्रों से आए मेरे युवा साथियों, आप सभी का लोक भवन, देहरादून में हृदय से स्वागत और अभिनंदन है।
आज आपसे मिलकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। आप मुनस्यारी और आसपास के दूरस्थ क्षेत्रों से यहाँ आए हैं। आपमें से कई बच्चों के लिए यह अपने गांव से बाहर की पहली बड़ी यात्रा है। इसलिए मैं समझ सकता हूँ कि आपके मन में इस समय कितनी उत्सुकता और कितने नए अनुभव होंगे।
आप उस धरती के बच्चे हैं, जहाँ देश की सीमा हमारे जीवन का हिस्सा है। कुमाऊँ की पहाड़ियां वीरता, साहस और देशभक्ति की परंपरा के लिए जानी जाती हैं। आपके गांवों से अनेक परिवारों ने देश की सुरक्षा में योगदान दिया है। इसलिए आज आप अपने गांवों के साथ-साथ सीमांत भारत की भावना का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
आपकी यह यात्रा भारतीय सेना के ऑपरेशन सद्भावना के अंतर्गत आयोजित की गई है। सद्भावना का अर्थ है- एक-दूसरे के करीब आना, समझना और दिलों को जोड़ना। इस यात्रा के माध्यम से आपको देश के अलग-अलग हिस्सों को देखने, वहाँ के लोगों से मिलने और भारत की विविधता को समझने का अवसर मिल रहा है। मैं भारतीय सेना को इस सुंदर पहल के लिए बधाई देता हूँ।
बच्चों! आपने अब तक दिल्ली में कई महत्वपूर्ण स्थान देखे हैं। आपने राष्ट्रपति भवन देखा, इंडिया गेट, कर्तव्य पथ और लाल किले को देखा। आपने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक जाकर हमारे वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। इन महत्वपूर्ण स्थलों की अपनी-अपनी कहानी है।
आपके लिए सबसे विशेष अवसर रहा-माननीय राष्ट्रपति जी से मुलाकात। मैं कल्पना कर सकता हूँ कि अपने गांवों से पहली बार इतनी दूर आए बच्चों के लिए यह कितना यादगार अनुभव रहा होगा। राष्ट्रपति भवन देखकर आपने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को करीब से जाना। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक ने आपको उन वीर जवानों के त्याग की याद दिलाई, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वाेच्च बलिदान दिया।
इन अनुभवों को अपनी स्मृति में जरूर रखिए, लेकिन इनके पीछे छिपे संदेश को भी समझिए। राष्ट्रपति भवन हमें लोकतंत्र और संविधान की शक्ति की याद दिलाता है। लाल किला हमें अपने इतिहास से जोड़ता है। राष्ट्रीय युद्ध स्मारक हमें कर्तव्य और बलिदान का अर्थ समझाता है।
आगे आपकी यात्रा देहरादून में भी कई महत्वपूर्ण संस्थानों तक जाएगी। आप आईएमए, आरआईएमसी, एफआरआई जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को देखेंगे। इन संस्थानों में आपको शिक्षा, अनुशासन, नेतृत्व, विज्ञान और राष्ट्रसेवा के अलग-अलग रूप देखने को मिलेंगे।
जब आप भारतीय सैन्य अकादमी और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज जाएं, तो वहाँ की इमारतों और परिसर को देखने के साथ वहां के जीवन को समझने का प्रयास कीजिए। वहाँ के युवाओं की मेहनत देखिए। उनके अनुशासन को देखिए। यह सोचिए कि वे अपने लक्ष्य के लिए किस तरह तैयारी करते हैं।
मैंने अपने सैन्य जीवन में एक बात सीखी है-अनुशासन हमें अपने लक्ष्य पर टिके रहना सिखाता है और नेतृत्व हमें जिम्मेदारी लेना सिखाता है। जीवन में आप कोई भी क्षेत्र चुनें, ये दोनों गुण हमेशा आपके काम आएंगे।
आपमें से कोई सैनिक बन सकता है, कोई डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी या उद्यमी बन सकता है। आपके सामने आज अनेक अवसर हैं। इसलिए अभी से अपने मन में यह विश्वास रखिए कि आप भी बड़े सपने देख सकते हैं और उन्हें पूरा करने की क्षमता रखते हैं।
आपका गांव दूर पहाड़ों में है, इससे आपके सपनों की ऊंचाई तय नहीं होती। आपके पास मेहनत है, प्रतिभा है और सीखने की इच्छा है, तो आपके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है। आज भारत विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, खेल, शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आप इस नए भारत की यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं।
बच्चों, अपनी जड़ों को कभी मत भूलिए। अपनी मातृभूमि, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं पर गर्व कीजिए। आप देश के अलग-अलग हिस्सों में जाएंगे और वहाँ अलग भाषा, खान-पान, वेशभूषा और संस्कृति देखेंगे। इन्हें देखकर आपको भारत की सुंदरता समझ में आएगी।
हम अलग-अलग हैं, फिर भी एक हैं। यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
दिल्ली से देहरादून, बरेली और लखनऊ तक आपकी यात्रा आपको भारत के अनेक रूप दिखाएगी। आप अलग-अलग लोगों से मिलेंगे। उनके अनुभव सुनेंगे। उनके जीवन को समझेंगे। यही अनुभव आपके मन में एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को और मजबूत करेगा।
मैं आपसे एक और बात कहना चाहता हूँ। इस यात्रा को सिर्फ अपने तक सीमित मत रखिए। जब आप अपने गांव लौटें, तो अपने माता-पिता, शिक्षकों और गांव के दूसरे बच्चों को अपनी यात्रा के बारे में बताइए। उन्हें बताइए कि आपने क्या देखा, क्या सीखा और आपको किन बातों ने प्रेरित किया। इस तरह आपकी यात्रा का अनुभव आपके पूरे गांव तक पहुँचेगा।
आप सीमावर्ती गांवों से आए हैं। याद रखिए-सीमावर्ती गांव भारत के अंतिम गांव नहीं, भारत के प्रथम गांव हैं। इन गांवों की शिक्षा, विकास और खुशहाली मजबूत उत्तराखण्ड और मजबूत भारत की आधारशिला है। आपके जैसे बच्चे इन गांवों के भविष्य हैं।
इसलिए आज यहां से जाते समय अपने मन में एक छोटा-सा संकल्प जरूर लेकर जाइए-
मैं खूब पढ़ूंगा।
मैं अपने माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करूंगा।
मैं अपने गांव और अपनी संस्कृति पर गर्व करूंगा।
मैं अपने जीवन में ईमानदारी और अनुशासन को अपनाऊंगा।
और मैं जो भी बनूंगा, अपने देश के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करूंगा।
हमारे लिए सबसे ऊपर है-राष्ट्र प्रथम।
राष्ट्र प्रथम का अर्थ है कि हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। हम जहाँ रहें, जिस क्षेत्र में काम करें, अपने देश को मजबूत बनाने में योगदान दें।
मेरे प्यारे बच्चों! आप इस यात्रा पर अपने गांवों से निकले हैं। मैं चाहता हूँ कि जब आप वापस लौटें, तो आपके साथ सिर्फ यात्रा की यादें न हों। आपके साथ नया आत्मविश्वास, नए सपने, नया ज्ञान और भारत के प्रति और गहरा प्रेम हो।
आप खूब पढ़ें, आगे बढ़ें, अपने परिवार और अपने गांव का नाम रोशन करें और एक दिन अपने कर्मों से पूरे उत्तराखण्ड और भारत का नाम गौरवान्वित करें।
आप सभी का भविष्य उज्ज्वल हो, इसी शुभकामना के साथ।
जय हिन्द!