24-01-2026 : अखण्ड ज्योति सम्मेलन: मातृ-विलय यात्रा एवं समापन समारोह के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
आज देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन धरती, हरिद्वार में, इस ऐतिहासिक शताब्दी समारोह में उपस्थित होना मेरे लिए केवल एक औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि एक गहन आत्मिक अनुभूति है।
यह वही पवित्र भूमि है जहाँ हिमालय की गोद में ऋषियों ने मानवता के लिए जीवन-दर्शन गढ़ा, जहाँ साधना केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान का माध्यम बनी।
हरिद्वार की यह पावन धरा माँ गंगा की अविरल धारा और युगों-युगों से चली आ रही ऋषि-परंपरा, तप, त्याग और साधना की चेतना से पवित्र हुई है।
आज शताब्दी नगर में जो विराट दृश्य उपस्थित है, वह केवल एक आयोजन का दृश्य नहीं है। यह उस चेतना का साक्षात स्वरूप है, जो भारतीय संस्कृति की आत्मा रही है।
आज जब हम परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रज्ज्वलित अखण्ड दीपक की शताब्दी और परमवंदनीया माताजी की जन्मशताब्दी को एक साथ मना रहे हैं, तो यह कोई साधारण संयोग नहीं है। यह तप और त्याग के उस दिव्य संगम का प्रतीक है, जो किसी भी युग-परिवर्तन की आधारशिला होता है। अखण्ड दीपक निरंतरता का प्रतीक है- ऐसी निरंतरता, जो परिस्थितियों से विचलित नहीं होती।
यह मेरा सौभाग्य है कि आज मैं उस युगतीर्थ शान्तिकुंज की धरती पर खड़ा हूँ, जिसने आधुनिक युग में ऋषिकुल की परंपरा को पुनर्जीवित किया है। जहाँ साधना, सेवा और संस्कार का समन्वय दिखाई देता है। जहाँ अध्यात्म केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन पद्धति बनकर जन-जन तक पहुँचा है। और जहाँ भारत की सनातन संस्कृति नवयुग की चेतना के साथ आगे बढ़ रही है।
आज का यह आयोजन युगचेतना का महाकुंभ है। अखण्ड ज्योति आंदोलन के सौ वर्षों की साधना, तपस्या और सेवा का यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक प्रकाश कभी बुझता नहीं, वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी मानवता के पथ को आलोकित करता रहता है। यह सम्मेलन उस सतत साधना का प्रतीक है, जिसने समाज को नैतिकता, करुणा और कर्तव्यबोध का मार्ग दिखाया।
“मातृ-विलय यात्रा” – यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि मातृत्व, त्याग और करुणा के उन संस्कारों का पुनर्पाठ है, जिन्हें वंदनीया माताजी ने अपने संपूर्ण जीवन से प्रतिष्ठित किया।
यह यात्रा हमें स्मरण कराती है कि सच्ची साधना आत्म विसर्जन में है, सच्ची शक्ति सेवा में है और सच्चा नेतृत्व करुणा में है। और आज का यह समापन समारोह केवल किसी आयोजन का अंत नहीं, बल्कि एक नए युग का शुभारंभ है।
जन्मशताब्दी 2026 का यह अवसर हमें यह संकल्प लेने को प्रेरित करता है कि हम गुरुदेव और माताजी की विचारधारा को केवल स्मरण नहीं करेंगे, बल्कि अपने आचरण में उतारेंगे। यह समापन नहीं, संकल्प संस्कार का क्षण है, जहाँ से युगधर्म और राष्ट्रधर्म की नई यात्रा प्रारंभ होती है।
आज यहाँ देश-विदेश के विभिन्न भागों से पधारे पचास हजार से अधिक साधक, कार्यकर्ता, युवा, महिलाएँ और प्रबुद्धजन एकत्रित हुए हैं। यह कोई सामान्य भीड़ नहीं है। यह उन व्यक्तियों का समागम है, जिन्होंने जीवन को केवल भोग का साधन नहीं, बल्कि साधना और सेवा का माध्यम माना है। इस विराट सहभागिता में अनुशासन है, शालीनता है और एक मौन संकल्प है। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज निर्माण का।
देवभूमि उत्तराखण्ड सदा से योग, आयुर्वेद और अध्यात्म की भूमि रही है। ऋषिकेश, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे धामों ने इस भूमि को वैश्विक आध्यात्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाया है।
आज जब विश्व भारत की ओर योग, ध्यान और संतुलित जीवन के मार्गदर्शन के लिए देख रहा है, तब उत्तराखण्ड इस भूमिका में अग्रणी बनकर उभर रहा है। यह भूमि न केवल शरीर को आरोग्य देती है, बल्कि आत्मा को भी दिशा प्रदान करती है।
परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का संपूर्ण जीवन इसी विचार का मूर्त रूप रहा कि आधुनिक समाज की समस्याएँ केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं, मूलतः नैतिक और मानसिक हैं। वे केवल एक संत या लेखक नहीं, बल्कि युगद्रष्टा थे।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक व्यक्ति के भीतर सद्बुद्धि का जागरण नहीं होगा, तब तक कोई भी व्यवस्था समाज को स्थायी दिशा नहीं दे सकती। उनका दर्शन समग्र था- व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र चारों स्तरों को एक साथ देखने वाला।
उन्होंने विचार क्रांति की बात की, क्योंकि वे जानते थे कि बाहरी क्रांतियाँ अस्थायी होती हैं, परंतु विचारों में परिवर्तन होने पर समाज स्वतः परिवर्तित होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अध्यात्म का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि संसार के बीच रहकर अपने कर्तव्यों को अधिक सजगता, नैतिकता और करुणा के साथ निभाना है।
यही कारण है कि गायत्री परिवार की साधना केवल उपासना तक सीमित नहीं रही, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुधार, महिला सशक्तीकरण और युवा जागरण जैसे क्षेत्रों में निरंतर सक्रिय रही।
इस महान साधना-यात्रा में परमवंदनीया माताजी भगवती देवी शर्मा जी की भूमिका अत्यंत मौलिक और प्रेरणादायी रही। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नारी केवल सहयोगी भूमिका में नहीं, बल्कि संपूर्ण आंदोलन की आत्मा हो सकती है। उनका जीवन मौन तप, असीम करुणा और अद्भुत सहनशीलता का प्रतीक रहा।
माताजी ने मातृत्व को केवल पारिवारिक दायरे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची शक्ति शोर में नहीं, साधना में होती है।
आज का “मातृ-विलय कार्यक्रम” किसी देह के विलय का आयोजन नहीं है। यह मातृत्व को जीवन-दृष्टि के रूप में आत्मसात करने का संकल्प है। यह हमें स्मरण कराता है कि यदि समाज को संवेदनशील, समरस और संस्कारवान बनाना है, तो करुणा, सहनशीलता और सेवा को केंद्र में लाना होगा।
शान्तिकुं्ज हरिद्वार केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि युगतीर्थ है- एक आध्यात्मिक प्रयोगशाला है, जहाँ मानवता के नवसंस्कार गढ़े जाते हैं। यहाँ साधना, प्रशिक्षण और सेवा का ऐसा समन्वय है, जो व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक और श्रेष्ठ मानव बनाता है। देश-विदेश में फैले गायत्री परिवार का यह मार्गदर्शन केंद्र आज विश्व शांति का एक मौन दूत बन चुका है।
आज यदि यह साधना-परंपरा सजीव और प्रभावी रूप में आगे बढ़ रही है, तो इसके पीछे वर्तमान नेतृत्व की स्पष्ट दृष्टि भी निहित है। डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी के मार्गदर्शन में गायत्री परिवार ने गुरुदेव की विचारधारा को समकालीन संदर्भों से विशेषकर युवा पीढ़ी के साथ जोड़ा है। यह नेतृत्व पद का नहीं, उत्तरदायित्व का नेतृत्व है।
शान्तिकुंज और अखिल विश्व गायत्री परिवार का राष्ट्र हेतु योगदान बहुआयामी रहा है। व्यसन-मुक्ति अभियान, पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, ग्राम विकास, महिला सशक्तीकरण, युवा निर्माण, आपदा राहत और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जन-जागरण ये सभी इस बात का प्रमाण हैं कि अध्यात्म जब कर्म से जुड़ता है, तब समाज-परिवर्तन की धारा बह निकलती है।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय आध्यात्मिकता और आधुनिक शिक्षा का अनूठा संगम है। यहाँ मूल्य-आधारित शिक्षा के माध्यम से ऐसे युवाओं का निर्माण हो रहा है, जो केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य समझते हैं।
देववाणी संस्कृत भारतीय ज्ञान-परंपरा की आत्मा है। वेद, उपनिषद, गीता और शास्त्र इसी भाषा में मानवता को दिव्य संदेश देते हैं। संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि भविष्य की विज्ञान-सम्मत भाषा है। इसके संरक्षण और प्रचार में देव संस्कृति विश्वविद्यालय की भूमिका प्रशंसनीय है।
संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान मेरा यह अनुभव रहा है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्थाओं से अधिक उसके नागरिकों के चरित्र में निहित होती है। कानून आवश्यक हैं, किंतु वे तभी प्रभावी होते हैं, जब समाज में नैतिक अनुशासन और कर्तव्यबोध हो। इसी दृष्टि से गायत्री परिवार द्वारा किया जा रहा व्यक्ति निर्माण का कार्य राष्ट्र के दीर्घकालिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आज भारत अमृतकाल के दौर से गुजर रहा है। हम आर्थिक, तकनीकी और सामरिक दृष्टि से निरंतर प्रगति कर रहे हैं। परंतु इतिहास साक्षी है कि यदि विकास मूल्यबोध से विहीन हो जाए, तो वह समाज को भीतर से खोखला कर देता है। गुरुदेव और माताजी की साधना-परंपरा हमें यह स्मरण कराती है कि विकास तभी सार्थक है, जब उसके साथ चरित्र निर्माण भी हो।
गायत्री मंत्र सद्बुद्धि की प्रार्थना है। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि है जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित होने से रोकती है और उसे समाज के प्रति उत्तरदायी बनाती है। यहाँ उपस्थित हजारों कार्यकर्ता इस सद्बुद्धि के जीवंत उदाहरण हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों में मौन सेवा के माध्यम से समाज को दिशा दे रहे हैं।
अंत में, मैं यही कामना करता हूँ कि शान्तिकुं्ज, हरिद्वार से प्रवाहित यह विचारधारा आने वाली पीढ़ियों को भी उसी प्रकार प्रेरित करती रहे, जैसे उसने अब तक किया है। माँ गायत्री हम सभी को सद्बुद्धि, सेवा-भाव और विनम्रता प्रदान करें।
हम सब व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र-निर्माण के इस महायज्ञ में सहभागी बनें, यही इस शताब्दी समारोह की सच्ची उपलब्धि होगी।
जय हिन्द!