21-06-2026:कैबिनेट मंत्री श्री सतपाल महाराज जी के जन्मदिवस के अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन
जय हिन्द!
मंच पर उपस्थित सभी सम्मानित अतिथिगण, संत-महात्मागण, जनप्रतिनिधिगण, मातृशक्ति, युवा साथियों एवं उपस्थित सभी श्रद्धालुजन,
आज का यह अवसर अत्यंत हर्ष, प्रसन्नता और आत्मीयता का अवसर है। हम सभी उत्तराखण्ड के वरिष्ठ जनप्रतिनिधि, आध्यात्मिक गुरु, मानवतावादी चिंतक और जनसेवक श्री सतपाल महाराज जी के जन्मदिवस के पावन अवसर पर एकत्रित हुए हैं।
इस शुभ अवसर पर मैं श्री सतपाल महाराज जी को हृदय की गहराइयों से जन्मदिवस की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, ऊर्जा और निरंतर लोकसेवा का सामथ्र्य प्रदान करें।
धर्मनगरी हरिद्वार की इस पावन धरती पर जन्मे श्री सतपाल महाराज जी का जीवन अध्यात्म, साधना, मानवता और जनसेवा के अद्भुत समन्वय का प्रेरणादायी उदाहरण है। हरिद्वार केवल एक नगर नहीं, बल्कि युगों-युगों से प्रवाहित भारतीय अध्यात्म, तप, साधना और सनातन चेतना की जीवंत धरोहर है।
माँ गंगा की निर्मल एवं पावन धारा, हिमालय की तपोभूमि और ऋषि-मुनियों की महान संत परंपरा से अनुप्राणित इस दिव्य परिवेश ने श्री सतपाल महाराज जी के व्यक्तित्व को गहराई और व्यापकता प्रदान की। उनके जीवन में अध्यात्म की अनुभूति, मानवता के प्रति करुणा, सेवा का संकल्प और लोककल्याण की भावना इसी महान सनातन परंपरा का सशक्त प्रतिबिंब है।
आपने अध्यात्म को केवल आत्मसाधना तक सीमित न रखते हुए उसे मानव सेवा, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाया है। यही आपके व्यक्तित्व की सबसे प्रेरणादायी पहचान है।
हमारी सनातन संस्कृति केवल पूजा-पद्धतियों और परंपराओं का नाम नहीं है। यह ऐसी जीवन-दृष्टि है, जो मनुष्य को आत्मबोध, करुणा, सेवा, संयम और लोककल्याण का मार्ग दिखाती है। हमारी संस्कृति व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठकर समाज और संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए जीने की प्रेरणा देती है।
हमारी इसी महान परंपरा में प्रार्थना की गई है-
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने।
यही सनातन अध्यात्म का मूल स्वर है-अपने सुख से आगे बढ़कर सर्वजन के सुख की कामना और अपने जीवन को लोकमंगल के लिए समर्पित करना।
श्री सतपाल महाराज जी के आध्यात्मिक जीवन में इसी भावना की स्पष्ट अनुभूति होती है। मानव उत्थान सेवा समिति के माध्यम से उन्होंने देश-विदेश में मानव धर्म, आत्मज्ञान, सद्भावना, प्रेम और सेवा का संदेश पहुँचाया है। उनका अध्यात्म केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा और समाज के उत्थान का माध्यम बना है।
मेरा मानना है कि सच्चा अध्यात्म व्यक्ति को संसार से विमुख नहीं करता, बल्कि उसे अपने दायित्वों के प्रति और अधिक जागरूक बनाता है। अध्यात्म हमें अपने भीतर देखने की दृष्टि देता है और सेवा उस आत्मबोध को समाज के कल्याण में लगाने की दिशा देती है। श्री सतपाल महाराज जी के जीवन में अध्यात्म और सेवा का यही सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
हमारी सनातन संस्कृति की व्यापकता को व्यक्त करते हुए कहा गया है-
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
अर्थात् उदार चरित्र वाले व्यक्ति के लिए संपूर्ण विश्व ही परिवार है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का यह संदेश आज पूरी मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। श्री सतपाल महाराज जी ने मानव धर्म, सद्भाव और सर्वधर्म समभाव के माध्यम से इसी सार्वभौमिक चेतना को आगे बढ़ाने का कार्य किया है।
हमारी आध्यात्मिक परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि राष्ट्र सेवा स्वयं में एक महान साधना है। जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के हित को प्राथमिकता देता है, तब उसका जीवन राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन जाता है। इसी भावना का विस्तार है-‘राष्ट्र प्रथम’।
आज हमारा देश ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। विकसित भारत केवल आर्थिक और भौतिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं है; यह समर्थ, संस्कारवान और आत्मविश्वासी भारत के निर्माण का भी संकल्प है। विकास तभी सार्थक है, जब उसके केंद्र में मानव कल्याण और उसके आधार में नैतिकता हो। मुझे विश्वास है कि सनातन मूल्यों, अध्यात्म, राष्ट्र प्रथम की भावना और विकसित भारत के संकल्प का यह समन्वय भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा।
श्री सतपाल महाराज जी के सार्वजनिक जीवन में भी हमें इसी समन्वय के दर्शन होते हैं। लोक निर्माण, पर्यटन, सिंचाई, संस्कृति एवं धर्मस्व जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों के माध्यम से वे उत्तराखण्ड की सेवा कर रहे हैं। हमारी चारधाम यात्रा, तीर्थ परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक पर्यटन उत्तराखण्ड की पहचान के अभिन्न अंग हैं।
उत्तराखण्ड की पहचान केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक चेतना से निर्मित होती है। यहाँ हिमालय केवल पर्वत नहीं, साधना का प्रतीक है और गंगा केवल नदी नहीं हमारी आस्था और जीवनधारा है। इसलिए देवभूमि का विकास ऐसा होना चाहिए, जिसमें हमारी आध्यात्मिक विरासत सुरक्षित रहे, सांस्कृतिक जड़ें और मजबूत हों तथा आधुनिक विकास के नए अवसर भी पैदा हों। विकास और विरासत एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
श्री सतपाल महाराज जी के जन्मदिवस के इस पावन अवसर पर मैं कामना करता हूँ कि उनकी आध्यात्मिक साधना, मानव सेवा और जनसेवा की यात्रा निरंतर आगे बढ़ती रहे। उनका अनुभव और मार्गदर्शन हमारी युवा पीढ़ी को आत्मज्ञान, संस्कार, सेवा, सद्भाव और राष्ट्र प्रथम की प्रेरणा देता रहे।
श्री सतपाल महाराज जी का जीवन हमें यही संदेश देता है-अध्यात्म से आत्मबोध, आत्मबोध से सेवा, सेवा से राष्ट्रबोध और राष्ट्रबोध से विश्वकल्याण। यही भारतीय जीवन-दृष्टि की महान परंपरा है।
ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि श्री सतपाल महाराज जी को स्वस्थ, दीर्घायु और मंगलमय जीवन प्रदान करें तथा वे इसी प्रकार उत्तराखण्ड, समाज और राष्ट्र की सेवा करते हुए आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देते रहें।
श्री सतपाल महाराज जी को जन्मदिवस की पुनः हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ।
जय हिन्द!
जय उत्तराखण्ड!
वंदे मातरम्!