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    19-04-2026:परम पूज्य जैन आचार्य लोकेश जी की जन्म जयंती के पावन अवसर पर ‘विश्व शांति-सद्भावना सम्मेलन’ में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अप्रैल 19, 2026

    जय हिन्द!

    अहिंसा, करुणा, समता और वैश्विक बंधुत्व के इस दिव्य महापर्व पर, अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक, विश्व शांतिदूत, परम पूज्य जैन आचार्य श्री लोकेश मुनि जी महाराज, पंजाब के माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया जी, मंचासीन समस्त संत-महात्मा, विभिन्न पंथों के पूज्य धर्मगुरु, विद्वतजन, शिक्षाविद तथा विश्व के विविध कोनों से पधारे शांति-साधक! आप सभी को मैं हृदय से प्रणाम करते हुए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ।

    आज का यह पावन अवसर केवल एक महापुरुष के जन्मोत्सव का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उन दिव्य मूल्यों का अभिनंदन है, जो मानवता को दिशा देते हैं, जो विश्व को विभाजन से समन्वय की ओर और अशांति से शांति की ओर अग्रसर करते हैं। परम पूज्य आचार्य लोकेश जी ने अपने तप, त्याग और तपस्या से “अहिंसा परमो धर्मः” के सनातन सिद्धांत को आधुनिक युग में पुनः प्रतिष्ठित किया है।

    पूज्य आचार्य लोकेश जी केवल एक जैन मुनि नहीं, अपितु मानवता के महान सेतु हैं, जो पूर्व और पश्चिम, अध्यात्म और विज्ञान, विचार और व्यवहार के मध्य एक जीवंत संवाद स्थापित करते हैं। उन्होंने धर्म को संकीर्ण परिधियों से बाहर निकालकर उसे लोकमंगल, जनसेवा और वैश्विक कल्याण का माध्यम बनाया है।

    मैं ‘अहिंसा विश्व भारती’ परिवार को इस विराट ‘विश्व शांति-सद्भावना सम्मेलन’ के आयोजन के लिए साधुवाद देता हूँ। यह सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतना है, जो युद्ध की विभीषिका से त्रस्त मानवता को शांति का मरहम प्रदान करती है, जो निराशा के अंधकार में आशा का दीप प्रज्वलित करती है।

    प्रबुद्ध मित्रों,

    आज का विश्व एक गहन द्वंद्व और विचित्र विडंबना के दौर से गुजर रहा है। हमारे पास संवाद के साधन हैं, पर संवाद का अभाव है। हमारे पास अपार संसाधन हैं, पर संतोष का अभाव है। हमारे पास शक्ति है, पर शांति का अभाव है। यह स्थिति हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हमने विकास की दौड़ में अपने मूल्यों को कहीं पीछे तो नहीं छोड़ दिया?

    आज आतंकवाद, पर्यावरणीय संकट, सामाजिक असमानता और सांस्कृतिक असहिष्णुता जैसी चुनौतियाँ मानव सभ्यता के सामने गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल नीतियों और योजनाओं से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए एक आंतरिक परिवर्तन, एक नैतिक जागरण, एक आध्यात्मिक उत्थान आवश्यक है। विश्व को शांति की आवश्यकता है, और शांति का मार्ग शक्ति से नहीं, बल्कि अहिंसा और करुणा से होकर गुजरता है।
    इतिहास साक्षी है- “न हिंसा न च युद्धेन, शांतिः कदापि लभ्यते।” अर्थात हिंसा कभी समाधान नहीं देती, वह केवल विनाश को जन्म देती है। इसके विपरीत, संवाद, सहिष्णुता और सहयोग ही स्थायी शांति के आधार स्तंभ हैं।

    भगवान महावीर स्वामी जी ने जो मार्ग दिखाया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनका अहिंसा का संदेश केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन करने की प्रेरणा देता है। उनका अनेकांतवाद हमें यह सिखाता है कि सत्य के अनेक आयाम होते हैं, और यदि हम दूसरों के दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करें, तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। अपरिग्रह हमें संयम और संतुलन का संदेश देता है, जो आज के उपभोक्तावादी युग में अत्यंत आवश्यक है।

    शांति क्या है? शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है। यह आत्मा की वह दिव्य अवस्था है, जहाँ संतुलन, संतोष और समरसता का स्थायी निवास होता है। भगवान महावीर जी ने कहा-“अप्पा सो परमप्पा”। अर्थात् आत्मा का साक्षात्कार ही परमात्मा का साक्षात्कार है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के संघर्ष को समाप्त नहीं करेगा, तब तक बाहरी शांति केवल एक मृग मरीचिका बनी रहेगी।

    एक सैनिक के रूप में अपने अनुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि शस्त्र सीमाओं की रक्षा कर सकते हैं, परंतु हृदयों को जीतने की शक्ति केवल अहिंसा और करुणा में ही निहित है। निस्संदेह हथियार सीमाएँ बचा सकते हैं, लेकिन मानवता को बचाने का कार्य केवल अहिंसा ही कर सकती है।
    इसी सत्य को आचार्य लोकेश जी ने आधुनिक संदर्भों में एक सशक्त सामाजिक आंदोलन का रूप दिया है। उनके द्वारा स्थापित ‘विश्व शांति केंद्र’ एक आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है, जो व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता का संचार करता है, समाज में समरसता का विस्तार करता है और विश्व में शांति का संदेश प्रसारित करता है।

    बंधुओं,

    आज के समय में ‘अनेकांतवाद’ की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। यदि हम यह स्वीकार कर लें कि “मेरा दृष्टिकोण ही अंतिम सत्य नहीं है”, तो संवाद के नए द्वार खुलेंगे, सहिष्णुता का विस्तार होगा और संघर्ष स्वतः कम होंगे। यही भारतीय दर्शन का सार है, यही हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों की आत्मा है।

    गुरु नानक देव जी का संदेश “इक ओंकार” हमें यह सिखाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति है। जब हम इस सत्य को आत्मसात कर लेते हैं, तो भेदभाव, घृणा और विभाजन की दीवारें स्वतः ढह जाती हैं।

    भारत की संस्कृति सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श पर आधारित रही है। जब विश्व ‘स्वार्थ’ में उलझा हुआ था, तब भारत ने ‘सर्वार्थ’ की भावना का संदेश दिया। यह विचार केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है, जो हमें समरसता, सह-अस्तित्व और सहानुभूति की ओर ले जाती है। जब हम ‘मैं’ से ऊपर उठकर ‘हम’ को अपनाते हैं, तभी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का स्वप्न साकार होता है।

    आज माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत /2047’ के महान संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। यह विकास केवल भौतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधारों पर निर्मित है। हम एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं, जो विश्व को ‘युद्ध’ नहीं, बल्कि ‘बुद्ध’ का मार्ग दिखाए।

    मैं उत्तराखण्ड की उस पावन देवभूमि से आया हूँ, जहाँ से गंगा और यमुना की निर्मल धाराएँ प्रवाहित होती हैं, जहाँ योग, ध्यान और साधना की परंपरा आज भी जीवंत है। यह भूमि हमें त्याग, सेवा और समर्पण का संदेश देती है। जैसे नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वैसे ही भारत का ज्ञान और उसकी संस्कृति भी सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है।

    प्रिय युवा साथियों,

    आप केवल भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान के परिवर्तनकारी नेतृत्वकर्ता हैं, आप इस युग के निर्माता हैं। आपके हाथों में तकनीक की अपार शक्ति है- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल क्रांति और नवाचार की असीम संभावनाएँ हैं। लेकिन स्मरण रखिए- बिना नैतिकता के प्रगति, प्रगति नहीं, विनाश का प्रारंभ है। इसलिए आवश्यक है कि हम ‘एथिक्स’ और ‘टेक्नोलॉजी’ के बीच संतुलन स्थापित करें और ऐसी तकनीक विकसित करें, जो मानवता को जोड़ने का कार्य करे, न कि विभाजित करने का।

    आचार्य लोकेश जी ने यह सिद्ध किया है कि सच्चा धर्म वही है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में प्रकाश लाए। नशामुक्ति, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में उनके प्रयास एक अनुकरणीय उदाहरण हैं।

    मित्रों,

    आज इस सम्मेलन के माध्यम से हमें एक संकल्प लेना होगा कि हम शांति के केवल दर्शक नहीं, बल्कि उसके सृजनकर्ता बनेंगे। हम अपने विचारों में, अपनी वाणी में और अपने आचरण में शांति और सद्भावना का संचार करेंगे।

    आइए, हम मिलकर एक ऐसे विश्व का निर्माण करें- जहाँ शस्त्रों की गर्जना नहीं, बल्कि शांति के गीत गूंजें। जहाँ विभाजन की रेखाएँ नहीं, बल्कि एकता के सेतु बनें। जहाँ मानवता, करुणा और प्रेम ही सर्वाेच्च मूल्य हों।

    अंत में, मैं पुनः परम पूज्य आचार्य लोकेश जी को उनके जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ और उनके दीर्घायु, स्वस्थ एवं यशस्वी जीवन की कामना करता हूँ।

    आपका मार्गदर्शन, आपकी तपस्या और आपका यह ‘विश्व शांति केंद्र’ सम्पूर्ण मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ बनकर युगों-युगों तक मानवता का पथ आलोकित करता रहे, इसी मंगलकामना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    नमो जिनाणं! वन्दे मातरम्! जय हिन्द!