19-03-2026:द्वितीय हिमालयन हेल्थकेयर इनोवेशन समिट में उत्तराखण्ड के माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
हिमालय की गोद में, जहाँ प्रकृति की विराटता, अध्यात्म की शांति और मानवता की करुणा का एक साथ आभास होता है, वहाँ “द्वितीय हिमालयन हेल्थकेयर इनोवेशन समिट” जैसे दूरदर्शी आयोजन के इस अवसर पर देवभूमि उत्तराखण्ड में आप सभी का अभिनंदन करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व की अनुभूति हो रही है।
यह समिट केवल विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि एक साझा संकल्प है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि तकनीक, नवाचार और मानवीय संवेदना के समन्वय से हिमालय की दुर्गम परिस्थितियों को सुगम बनाया जा सकता है। आज हमारा उद्देश्य केवल चिकित्सा पर चर्चा करना नहीं, बल्कि ‘स्वस्थ हिमालय’ के उस स्वप्न को साकार करना है, जो राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि का आधार है।
हिमालय केवल पर्वतों की श्रृंखला नहीं है, यह धैर्य, दृढ़ता और जीवन की निरंतरता का शाश्वत प्रतीक है। इस महान पर्वत श्रृंखला के बीच बसे हमारे गाँव, घाटियाँ और सीमांत क्षेत्र हमें यह स्मरण कराते हैं कि मानव सेवा का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है जब हम सबसे कठिन परिस्थितियों में भी लोगों तक सहायता पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि हिमालयी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना अनेक चुनौतियों से भरा हुआ कार्य है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ, सीमित परिवहन सुविधाएँ, मौसम की अनिश्चितता और विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी-ये सभी कारक हिमालयी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। कई बार प्राकृतिक आपदाएँ भी इस चुनौती को और बढ़ा देती हैं।
इसके बावजूद हमारे डॉक्टर, नर्स, आशा कार्यकर्ता, एएनएम और अन्य स्वास्थ्य कर्मी अद्भुत समर्पण के साथ सेवा कर रहे हैं। कई बार वे कठिन पहाड़ी रास्तों को पार करके दूरस्थ गाँवों तक पहुँचते हैं, कई बार सीमित संसाधनों में भी जीवन बचाने के प्रयास करते हैं। उनकी यह सेवा भावना वास्तव में अत्यंत प्रशंसनीय है। मैं ऐसे सभी स्वास्थ्य योद्धाओं को आज इस मंच से नमन करता हूँ।
साथियों,
जब हम हिमालयी क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था की बात करते हैं, तो यह केवल किसी एक राज्य की चिंता नहीं होती। चाहे उत्तराखण्ड हो, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम या हमारे उत्तर-पूर्व के राज्य- इन सभी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियाँ और चुनौतियाँ लगभग समान हैं।
इसीलिए आज समय की आवश्यकता है कि हम इन चुनौतियों का समाधान सामूहिक दृष्टिकोण से खोजें। इसी भावना के साथ मैं आज आपके सामने “हिमालयन हेल्थ कॉम्पैक्ट” की परिकल्पना रखना चाहता हूँ।
यह केवल एक औपचारिक समझौता नहीं, बल्कि हिमालयी राज्यों के बीच सहयोग, समन्वय और साझा संकल्प का एक जीवंत मंच होगा। जहाँ हम अपने अनुभवों, सफल मॉडलों और नवाचारों को एक-दूसरे के साथ साझा करेंगे। यदि किसी राज्य में कोई पहल सफल रही है, तो वह दूसरे राज्य के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। इस प्रकार ज्ञान और अनुभव का यह आदान-प्रदान पूरे हिमालयी क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में सहायक होगा।
साथियों,
पिछले वर्ष समिट में हमने जो वादे किए थे, वे केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि उन माताओं के भरोसे का जवाब थे जिन्हें इलाज के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता था। तब मैंने कहा था कि उत्तराखण्ड की महिलाओं का स्वास्थ्य और सुरक्षित मातृत्व हमारे लिए केवल योजना नहीं, बल्कि ‘सुशासन की अनिवार्यता’ है।
आज 2026 के इस पड़ाव पर गर्व है कि हमने बातों से आगे बढ़कर पहाड़ों की दुर्गम राहों पर आधुनिक चिकित्सा के ठोस पदचिह्न छोड़े हैं। हमने सिद्ध किया है कि यदि संकल्प अडिग हो, तो कोई भी बाधा सेवा का मार्ग नहीं रोक सकती। पिछले एक वर्ष के सुधार प्रमाणित करते हैं कि हमारी दिशा सही है और गति उत्साहजनक।
हिमालयी राज्यों के इस नवाचार पथ पर हमारे मार्गदर्शक माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का ‘अंत्योदय’ का विजन हमारी स्वास्थ्य नीतियों का प्राण है। आयुष्मान भारत योजना ने भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। हमारे उत्तराखण्ड के हजारों गरीब परिवारों के लिए यह योजना किसी वरदान से कम नहीं है। जहाँ पहले एक गंभीर बीमारी परिवार को आर्थिक रूप से तबाह कर देती थी, आज ‘गोल्डन कार्ड’ उनके हाथों में स्वाभिमान, सुरक्षा और जीवन की नई आशा बनकर खड़ा है।
प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में ‘डिजिटल इंडिया’ का जो पौधा रोपा गया था, आज वह स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘आभा’ आईडी और डिजिटल हेल्थ रिकॉड्र्स के रूप में फल दे रहा है। जन औषधि केंद्रों ने दवाओं को मध्यम वर्ग की पहुंच में लाकर ‘ईज ऑफ लिविंग’ को सार्थक किया है। माणा जैसे सीमांत गाँवों से लेकर लद्दाख की ऊँचाइयों तक, हर कोने को आधुनिक चिकित्सा से जोड़ने के उनके सपने को हम धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
साथियों,
हिमालयी क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए हमें कुछ मूलभूत स्तंभों पर विशेष ध्यान देना होगा। पहला, प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण। दूसरा, तकनीक आधारित स्वास्थ्य नवाचार। तीसरा, स्वास्थ्य कर्मियों का सशक्तीकरण और सम्मान।
पहाड़ी क्षेत्रों में कई बार जिला अस्पतालों तक पहुँचने में लम्बा समय लगता है। इसलिए यह आवश्यक है कि गाँव स्तर पर ही ऐसी स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध हों जहाँ प्रारंभिक जाँच, परामर्श और उपचार संभव हो सके।
स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि इन केंद्रों को टेलीमेडिसिन, डिजिटल डायग्नोस्टिक उपकरणों और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों से जोड़ा जाए, तो ये ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के सशक्त आधार बन सकते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है – तकनीक आधारित स्वास्थ्य नवाचार। आज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में तेजी से प्रगति हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेलीमेडिसिन, मोबाइल डायग्नोस्टिक यूनिट्स और डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को दूरस्थ क्षेत्रों तक विस्तारित किया जा सकता है।
लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ये तकनीकें केवल महानगरों तक सीमित न रहें। जब तकनीक पहाड़ के अंतिम गाँव तक पहुँचे और वहाँ रहने वाले व्यक्ति के जीवन को सरल और सुरक्षित बनाए- तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है।
मैं यहाँ उपस्थित हेल्थ-टेक कंपनियों और नवाचार से जुड़े उद्यमियों से विशेष आग्रह करना चाहता हूँ कि वे हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए समाधान विकसित करें। कम बिजली, सीमित इंटरनेट कनेक्टिविटी और कठिन मौसम जैसी परिस्थितियों में भी कार्य करने वाले उपकरण और प्रणालियाँ विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।
तीसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है- स्वास्थ्य कर्मियों का सशक्तीकरण और सम्मान। पर्वतीय क्षेत्रों में सेवा देना वास्तव में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। ऐसे में यह आवश्यक है कि यहाँ कार्यरत डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों को पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन प्राप्त हो।
डिजिटल प्रशिक्षण कार्यक्रम, करियर उन्नयन के अवसर और बेहतर कार्य परिस्थितियाँ स्वास्थ्य कर्मियों के मनोबल को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। जब स्वास्थ्य कर्मियों को यह अनुभव होगा कि उनके प्रयासों का सम्मान किया जा रहा है, तो वे और अधिक समर्पण के साथ सेवा करेंगे।
साथियों,
पहाड़ में एक महिला का स्वास्थ्य पूरे परिवार की रीढ़ होता है। जब एक महिला बीमार होती है, तो पूरा घर ठहर जाता है। यदि हम सच में विकसित भारत 2047 का लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें अपनी मातृ-शक्ति के स्वास्थ्य को सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी होगी। एनीमिया मुक्त उत्तराखण्ड और सुरक्षित संस्थागत प्रसव केवल सरकारी आँकड़े नहीं होने चाहिए, ये हमारे समाज की नैतिकता का पैमाना होना चाहिए।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि सेतु आयोग, एम्स ऋषिकेश और टाटा ट्रस्ट मिलकर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल पर कार्य कर रहे हैं। टेली-एनआईसीयू जैसी पहल दूरस्थ क्षेत्रों में नवजात शिशुओं को समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध हो सकती है। इसके साथ ही हमें गैर-संचारी रोगों- जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग की समय पर पहचान और रोकथाम के लिए सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहित करना होगा।
यहाँ मैं ‘सेतु’ आयोग की भूमिका की विशेष रूप से सराहना करना चाहता हूँ। उपाध्यक्ष राज शेखर जोशी जी के नेतृत्व में आयोग ने केवल नीतियाँ नहीं बनाई हैं, बल्कि सरकारी विभागों और निजी क्षेत्र के बीच एक सेतु का कार्य किया है। नवाचार तभी सफल होता है जब उसे सही नीतिगत समर्थन मिले।
मैं इस अवसर पर सेतु आयोग से यह अपेक्षा भी व्यक्त करना चाहूँगा कि आने वाले समय में हिमालयी क्षेत्रों के लिए कुछ नवाचार आधारित स्वास्थ्य मॉडल विकसित किए जाएँ।
इनमें ऊँचाई वाले क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत डायग्नोस्टिक सेवाओं का विस्तार, डिजिटल उपकरणों के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग और गाँव से जिला अस्पताल तक मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की एक सुदृढ़ डिजिटल श्रृंखला का निर्माण शामिल हो सकता है। ऐसी पहलें न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाएंगी, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक समावेशी और प्रभावी भी बनाएंगी।
मित्रों,
हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह निरंतर विकसित हो रही है और नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल रही है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को भी इसी प्रकार जीवंत, नवाचार आधारित और समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।
“द्वितीय हिमालयन हेल्थकेयर इनोवेशन समिट” इसी परिवर्तनकारी सोच का प्रतीक है। मुझे विश्वास है कि इस समिट में होने वाला विचार-विमर्श, अनुभवों का आदान-प्रदान और नई साझेदारियाँ हिमालयी क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था को एक नई दिशा प्रदान करेंगी।
हमें आयुर्वेद और पारंपरिक हिमालयी ज्ञान को भी आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना होगा। ‘हिलिंग हिमालय’ का विचार दुनिया को आकर्षित कर सकता है। हमारे पास शुद्ध जल, शुद्ध वायु और दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ हैं, यदि हम इन्हें आधुनिक तकनीक के साथ मिला दें, तो उत्तराखण्ड समेत हिमालयी राज्य दुनिया के वेलनेस हब बन सकते हैं।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हिमालय हमें केवल ऊँचाइयों का संदेश नहीं देता, बल्कि सेवा, साहस और संकल्प की प्रेरणा भी देता है। यदि हमारी सोच व्यापक हो, तकनीक जनकल्याण से जुड़ी हो और सेवा का भाव हमारे हृदय में हो, तो कोई भी दूरी हमारे प्रयासों को रोक नहीं सकती।
आइए! हम इस समिट को केवल संवाद का मंच नहीं, बल्कि ठोस परिवर्तन और सकारात्मक परिणामों की शुरुआत बनाएं। देवभूमि का आशीर्वाद, हिमालय की शक्ति और सेवा का हमारा संकल्प- ये तीनों मिलकर हमें एक स्वस्थ, समृद्ध और सशक्त हिमालय के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ाएंगे।
स्वस्थ हिमालय – समृद्ध हिमालय – सशक्त भारत। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!