17-06-2026 : हिमालयन आश्रम, सतखोल में आयोजित कार्यक्रम हेतु माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
(तिथिः 17 जून, 2026)
जय हिन्द!
आदरणीय संतजन, हिमालयन आश्रम सतखोल के पदाधिकारीगण, प्रिय भाईयों एवं बहनों, उपस्थित छात्र-छात्राओं तथा किसान साथियों!
आज इस शांत, पवित्र और प्रकृति की गोद में बसे हिमालयन आश्रम सतखोल में उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मैं इस अवसर के लिए आश्रम परिवार का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
उत्तराखण्ड की भूमि सदियों से आध्यात्मिक साधना, आत्मचिंतन और मानव कल्याण की परम्परा की वाहक रही है। हिमालय केवल पर्वतों का समूह नहीं है, बल्कि वह एक ऐसी चेतना का प्रतीक है जो हमें भीतर की यात्रा करने की प्रेरणा देता है। ऐसे वातावरण में स्थित यह आश्रम न केवल ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास का केन्द्र है, बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए भी प्रेरणादायी कार्य कर रहा है।
आज ध्यान सत्र में सहभागी होकर मुझे भी एक विशेष अनुभव प्राप्त हुआ। हम सभी अपने दैनिक जीवन में अनेक जिम्मेदारियों, चुनौतियों और व्यस्तताओं से घिरे रहते हैं। ऐसे समय में कुछ क्षण स्वयं के लिए निकालना, अपने भीतर की शांति से जुड़ना और अपने मन को स्थिर करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। ध्यान हमें यही अवसर प्रदान करता है।
मुझे स्मरण है कि कुछ समय पूर्व मुझे हैदराबाद स्थित हार्टफुलनेस के वैश्विक केन्द्र के भ्रमण का अवसर प्राप्त हुआ था। वहाँ मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा कि किस प्रकार ध्यान, आत्मिक विकास और मानवीय मूल्यों के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया जा रहा है। विशाल परिसर, अनुशासित वातावरण और सबसे बढ़कर वहाँ आने वाले लोगों के चेहरे पर दिखाई देने वाली शांति और संतोष की भावना ने मुझे गहराई से प्रभावित किया।
उस यात्रा के दौरान मैंने यह अनुभव किया कि आध्यात्मिकता केवल किसी एक स्थान, समुदाय या परम्परा तक सीमित नहीं है। यह एक सार्वभौमिक मानवीय आवश्यकता है। चाहे कोई विद्यार्थी हो, किसान हो, युवा हो, प्रशासनिक अधिकारी हो या समाज का कोई अन्य वर्ग, हर व्यक्ति अपने जीवन में संतुलन, स्पष्टता और आंतरिक शक्ति की तलाश करता है। ध्यान उस दिशा में एक प्रभावी माध्यम बन सकता है।
आज सतखोल में उपस्थित होकर मुझे उसी भावना की अनुभूति हो रही है। यहाँ हिमालय की प्राकृतिक ऊर्जा, आश्रम का शांत वातावरण और साधना की परम्परा मिलकर एक ऐसा परिवेश निर्मित करते हैं जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ने का कार्य करता है।
मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता हुई कि आश्रम केवल ध्यान और आध्यात्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों और किसानों के सशक्तीकरण के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।
आज मुझे विशेष रूप से यह जानकर प्रसन्नता हुई कि यहाँ बच्चों के लिए ‘ब्राइटर माइंड्स’ कार्यक्रम तथा किसानों के लिए सुगंधित एवं औषधीय पौधों के संवर्धन जैसे विषयों पर भी कार्य किया जा रहा है। यह एक अत्यंत सराहनीय पहल है। किसी भी समाज का भविष्य उसके बच्चों की प्रतिभा और उसके किसानों की समृद्धि पर निर्भर करता है। जब हम दोनों क्षेत्रों में सकारात्मक निवेश करते हैं, तब विकास का आधार और अधिक मजबूत होता है।
हम सभी जानते हैं कि वर्तमान समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने जीवन को नई दिशा दी है। लेकिन इसके साथ-साथ मानसिक संतुलन, आत्मानुशासन और आंतरिक शांति की आवश्यकता भी पहले से अधिक बढ़ गई है। ध्यान की प्रक्रिया व्यक्ति को स्वयं से जोड़ती है। यह हमें अपने भीतर झाँकने, अपने विचारों को संतुलित करने और जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर देती है।
आज मुझे भी आप सभी के साथ ध्यान सत्र में सहभागी होने का अवसर प्राप्त हुआ। यह अनुभव अत्यंत सुखद और आत्मिक शांति प्रदान करने वाला रहा। मेरा मानना है कि जब व्यक्ति का मन शांत होता है, तभी वह परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का बेहतर निर्वहन कर सकता है।
उत्तराखण्ड के संदर्भ में भी हमें विकास और पर्यावरण, आधुनिकता और परम्परा, तथा भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। हमारी संस्कृति सदैव हमें यही सिखाती रही है कि बाहरी उपलब्धियों के साथ-साथ आंतरिक समृद्धि भी आवश्यक है।
मैं हिमालयन आश्रम सतखोल द्वारा किए जा रहे जनहितकारी और आध्यात्मिक प्रयासों की सराहना करता हूँ। मुझे विश्वास है कि यह आश्रम आने वाले समय में और अधिक लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बनेगा।
अंत में, मैं पूज्य दाजी जी को सादर प्रणाम एवं शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ तथा आश्रम परिवार के सभी सदस्यों को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए बधाई देता हूँ।
आप सभी के उत्तम स्वास्थ्य, सुख, शांति और समृद्धि की कामना करता हूँ।
जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!