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    16-07-2026:हरेला पर्व-2026 के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 16, 2026

    जय हिन्द!

    देवभूमि उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक-संस्कृति, प्रकृति के प्रति हमारी सनातन आस्था तथा कृषि-प्रधान जीवन-दर्शन के पावन पर्व ‘हरेला’ के इस शुभ अवसर पर भारत की हरित क्रान्ति की जन्मस्थली, गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर की पावन धरती पर आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता एवं आत्मीय संतोष का अनुभव हो रहा है। मैं विश्वविद्यालय परिवार, प्रदेश के अन्नदाता किसानों तथा समस्त प्रदेशवासियों को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलकामनाएँ देता हूँ।

    पंतनगर में हरेला का यह आयोजन केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि भारतीय कृषि परम्परा, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और वैज्ञानिक नवाचार का प्रेरक संगम है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का सशक्त उदाहरण है।

    भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती आई एक महान सांस्कृतिक सभ्यता है। हमारी संस्कृति ने प्रकृति को पूज्य माना है और पृथ्वी को माता का स्थान दिया है। अथर्ववेद का उद्घोष है- ‘‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’’
    अर्थात् यह पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।

    भारतीय दर्शन का सिद्धान्त ‘‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’’ हमें सिखाता है कि मानव और प्रकृति अभिन्न हैं। इसलिए प्रकृति का संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, अपनी संस्कृति और भावी पीढ़ियों की सुरक्षा का आधार है।

    इसी सनातन जीवन-दृष्टि की सजीव अभिव्यक्ति है हरेला। यह केवल हरियाली का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय कृषि सभ्यता का जीवन-पर्व है। किसान जब मिट्टी में बीज डालता है, तब वह केवल फसल नहीं बोता, बल्कि विश्वास, परिश्रम और भविष्य का भी बीजारोपण करता है। यही कारण है कि हरेला हमें प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, श्रम के सम्मान और सतत विकास का संदेश देता है।

    हरेला का सबसे बड़ा संदेश ‘बीज’ है। जैसे बीज भविष्य की अनंत संभावनाओं का आधार है, वैसे ही श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ संस्कार और श्रेष्ठ अनुसंधान राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला हैं।

    इसीलिए मुझे लगता है कि हरेला और पंतनगर का संबंध केवल संयोग नहीं, बल्कि भारतीय कृषि सभ्यता का स्वाभाविक संगम है। हरेला हमें बीज बोना सिखाता है, पंतनगर उस बीज को विज्ञान देता है। किसान उसे अपने श्रम से सींचता है, वैज्ञानिक उसे अनुसंधान और नवाचार से समृद्ध बनाते हैं तथा प्रकृति उसे जीवन प्रदान करती है। जब परम्परा, विज्ञान, किसान और प्रकृति साथ चलते हैं, तभी समृद्ध समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है। यही हरेला का संदेश और इस महान विश्वविद्यालय का ध्येय है।

    गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय भारत की कृषि यात्रा का गौरवपूर्ण अध्याय है। हरित क्रान्ति में ऐतिहासिक योगदान देने वाला यह विश्वविद्यालय आज आधुनिक कृषि अनुसंधान, नवाचार और किसान-केंद्रित शिक्षा के माध्यम से भविष्य की कृषि को नई दिशा दे रहा है।

    आज कृषि का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन नहीं, बल्कि सतत, जलवायु-अनुकूल और किसान-केंद्रित कृषि व्यवस्था का निर्माण है। मुझे प्रसन्नता है कि पंतनगर विश्वविद्यालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल कृषि, जैव प्रौद्योगिकी तथा नवाचार के माध्यम से इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। विज्ञान तभी सार्थक है, जब उसका लाभ प्रयोगशाला से निकलकर किसान के खेत तक पहुँचे और किसानों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए।

    यह भी प्रसन्नता का विषय है कि विश्वविद्यालय अपने पूर्व छात्रों की प्रतिभा और अनुभव को विकास यात्रा से जोड़ रहा है। ठत्।प्छ 3ण्0 ज्ञान, नवाचार और उत्तरदायित्व का प्रेरक संगम है। उद्योगों एवं अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से भविष्य की कृषि के लिए सशक्त नवाचार तंत्र विकसित किया जा रहा है। यह प्रयास विकसित भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप कृषि शिक्षा की नई दिशा का परिचायक है।

    मुझे विशेष संतोष है कि इस अवसर पर हरेला को वृक्षारोपण, कार्बन क्रेडिट और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व जैसे आधुनिक आयामों से जोड़ा जा रहा है। यह हमारी लोक परम्पराओं की समकालीन प्रासंगिकता का प्रमाण है। संस्कृति और विज्ञान का यही समन्वय सतत विकास की आधारशिला है।

    आज लगाए जाने वाले हजारों पौधे भविष्य की हरित प्रतिज्ञाएँ हैं। पौधारोपण तभी सार्थक है, जब उसके साथ संरक्षण का संस्कार भी जुड़ा हो। कृषि विविधीकरण, प्राकृतिक खेती और नवाचार किसानों की समृद्धि के नए द्वार खोल रहे हैं। इस अवसर पर सम्मानित प्रगतिशील किसान हम सभी के लिए प्रेरणा हैं।

    आज आवश्यकता इस बात की है कि वैज्ञानिक, शिक्षक, विद्यार्थी, किसान, उद्योग जगत और पूर्व छात्र-सभी एक साझा कृषि नवाचार परिवार के रूप में कार्य करें। जब ज्ञान, अनुसंधान, अनुभव और जनभागीदारी एक साथ जुड़ते हैं, तभी कृषि आत्मनिर्भर बनती है, किसान समृद्ध होता है और विकसित भारत का संकल्प सशक्त होता है।

    प्रिय भाइयों एवं बहनों,

    आज सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण तथा जैव विविधता पर बढ़ते संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। हिमालयी राज्य होने के कारण उत्तराखण्ड इन परिवर्तनों को और अधिक निकटता से अनुभव कर रहा है। हमारे हिमनद, नदियाँ, वन और जैव विविधता केवल हमारी प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि और आजीविका का आधार हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण हमारे लिए केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय कर्तव्य है।

    देवभूमि उत्तराखण्ड ने सदैव प्रकृति को अपनी संस्कृति और जीवन का अभिन्न अंग माना है। चिपको आन्दोलन ने वृक्षों को जीवन का आधार मानने का संदेश दिया, मैती आन्दोलन ने पौधारोपण को सामाजिक संस्कार बनाया, वन पंचायतों ने सामुदायिक सहभागिता की सशक्त परम्परा विकसित की और आज सीड बॉल जैसे नवाचार इस हरित चेतना को नई गति प्रदान कर रहे हैं। इन सभी प्रयासों का मूल संदेश एक ही है-प्रकृति का संरक्षण शासन का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का साझा दायित्व है।

    मुझे प्रसन्नता है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा प्रारम्भ किया गया ‘‘एक पेड़ माँ के नाम’’ अभियान पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी का राष्ट्रीय अभियान बना रहा है। भारतीय संस्कृति में माँ जीवन, संरक्षण और सृजन की प्रतीक है। अपनी माता के सम्मान में लगाया गया प्रत्येक वृक्ष मातृभूमि, मातृप्रकृति और भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी कृतज्ञता की सजीव अभिव्यक्ति है। यह अभियान हमारी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक पर्यावरणीय चेतना का उत्कृष्ट समन्वय है।

    आज आवश्यकता केवल वृक्ष लगाने की नहीं, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित करने की है। यदि प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक ग्राम पंचायत, प्रत्येक कृषि संस्थान और प्रत्येक परिवार एक-एक पौधे के संरक्षण का संकल्प ले, तो हरेला केवल एक पर्व नहीं रहेगा, बल्कि प्रकृति संरक्षण का व्यापक जनआन्दोलन बन जाएगा।

    प्रिय युवा साथियों,

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ‘‘विकसित भारत-2047’’ के अमृत संकल्प की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। विकसित भारत का मार्ग विकसित कृषि, वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय संतुलन से होकर जाता है। विकसित उत्तराखण्ड का स्वप्न भी तभी साकार होगा, जब हमारे किसान समृद्ध होंगे, हमारे वैज्ञानिक नवाचार करेंगे, हमारे युवा तकनीक, स्टार्टअप और उद्यमिता को अपनाएँगे तथा हमारी विकास यात्रा प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखेगी।

    मैं विशेष रूप से पंतनगर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और युवा वैज्ञानिकों से आग्रह करता हूँ कि वे केवल ज्ञान अर्जित करने तक सीमित न रहें, बल्कि ज्ञान का सृजन करें। अनुसंधान को प्रयोगशालाओं से खेतों तक पहुँचाएँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीकों को किसानों के हित से जोड़ें तथा जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा दें। यही इस महान विश्वविद्यालय की गौरवशाली परम्परा और राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

    मैं हमारे वैज्ञानिकों से भी अपेक्षा करता हूँ कि उनका प्रत्येक अनुसंधान किसान की समृद्धि, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग में योगदान दे। कृषि विज्ञान तभी सार्थक है, जब उसका लाभ सीधे किसान तक पहुँचे और उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए।

    हमारी मातृशक्ति सदैव कृषि संस्कृति और प्रकृति संरक्षण की सबसे बड़ी संवाहक रही है। हरेला जैसे लोकपर्वों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने में हमारी माताओं और बहनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्वयं सहायता समूहों, महिला मंगल दलों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से ही पर्यावरण संरक्षण का अभियान जनआन्दोलन का स्वरूप ग्रहण करेगा।

    आज आवश्यकता इस बात की भी है कि हम प्रकृति संरक्षण को केवल पर्वों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने दैनिक जीवन का संस्कार बनाएँ। जल संरक्षण, मृदा संरक्षण, जैव विविधता का संवर्धन, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग-ये केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि विकसित भारत की अनिवार्य आवश्यकताएँ भी हैं।

    आइए, हरेला के इस पावन अवसर पर हम सब यह संकल्प लें कि हम प्रकृति संरक्षण को अपने जीवन का संस्कार बनाएँ, एक पौधा लगाकर उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित करें, विज्ञान और विकास को पर्यावरण के संरक्षण से जोड़ें, तथा ऐसा उत्तराखण्ड निर्मित करें जहाँ परम्परा और प्रौद्योगिकी, कृषि और नवाचार, पर्यावरण और विकास एक-दूसरे के पूरक बनकर आगे बढ़ें। यही हरेला का संदेश है, यही पंतनगर की पहचान है और यही विकसित उत्तराखण्ड तथा विकसित भारत की सुदृढ़ आधारशिला है।

    ऋग्वेद का यह प्रेरक मंत्र हम सभी के जीवन का पथ-प्रदर्शक बने-
    संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
    देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
    अर्थात्-आइए, हम सब साथ चलें, साथ विचार करें, हमारे मन एक हों और समाज, राष्ट्र तथा मानवता के कल्याण के लिए सामूहिक भावना से निरंतर कार्य करें।

    इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ हरेला पर्व की शुभकामनाएं देते हुए मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!