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    15-07-2026:लोक संवर्धन पर्व-2026 के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 15, 2026

    जय हिन्द!

    आज ‘लोक संवर्धन पर्व’ के इस गरिमामय आयोजन में आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता एवं आत्मीय संतोष का अनुभव हो रहा है। मैं इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए सभी आयोजकों को हार्दिक बधाई देता हूँ तथा अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। आज का यह आयोजन हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता का जीवंत उत्सव है।

    भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित होती आई एक महान सांस्कृतिक सभ्यता है। हमारी पहचान हमारी लोक परम्पराओं, लोककलाओं, लोकभाषाओं और सांस्कृतिक विरासत से निर्मित हुई है। यही लोक चेतना हमारी राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है। जब हम अपनी लोक संस्कृति का संरक्षण करते हैं, तब वस्तुतः हम अपनी सभ्यता, अपने संस्कार और अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा करते हैं। अतः लोक संस्कृति का संरक्षण राष्ट्र निर्माण का अनिवार्य आधार है।

    हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व उद्घोष किया था- ‘‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।’’
    अर्थात् सत्य एक है, उसकी अभिव्यक्तियाँ अनेक हो सकती हैं। यही भावना आगे चलकर ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ के रूप में सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की प्रेरणा देती है। भारत की यही सांस्कृतिक दृष्टि हमारी लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का आधार है। विविधता हमारे लिए विभाजन का कारण नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

    ‘लोक’ केवल जनसमूह का नाम नहीं है। लोक हमारी सामूहिक स्मृति है। हमारी भाषा, हमारे पर्व, हमारे गीत, हमारी परम्पराएँ, हमारी जीवन शैली और हमारे संस्कार-इन सबका समग्र स्वरूप ही लोक है। इसी लोक में समाज की आत्मा और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का वास है। इसलिए लोक का संरक्षण अतीत का सम्मान ही नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक सुरक्षा का भी संकल्प है।

    देवभूमि उत्तराखण्ड इस सांस्कृतिक विरासत का गौरवशाली प्रतिनिधि है। यह हिमालय के साथ समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकसंगीत, लोकभाषाओं और लोकजीवन की भी पावन भूमि है। यहाँ की लोकधुनों में हिमालय की आत्मा बोलती है, लोकगीतों में जनमानस की संवेदनाएँ गूँजती हैं और लोकनृत्यों में हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहती हैं।

    उत्तराखण्ड की पहचान उसकी सांस्कृतिक विविधता से भी है। जौनसार की परम्पराएँ, गढ़वाल की लोकगाथाएँ, कुमाऊँ की सांस्कृतिक धरोहर, भोटिया समाज की जीवन शैली मिलकर उत्तराखण्ड को सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध बनाती हैं। इस विरासत का संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का नैतिक उत्तरदायित्व है।

    लोक संस्कृति केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होती। वह समाज की सामूहिक चेतना का दर्पण होती है। वह हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है, हमारी पहचान को सुरक्षित रखती है और आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास एवं संस्कारों से परिचित कराती है। लोक परम्पराओं से कटा हुआ समाज धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक पहचान भी खो देता है।

    आज वैश्वीकरण और तीव्र तकनीकी परिवर्तन के इस युग में हमारी जिम्मेदारी है कि आधुनिकता और परम्परा के मध्य संतुलन बनाए रखें। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत डिजिटल क्रान्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी नई ऊर्जा दे रहा है। आधुनिक तकनीक हमारी लोकभाषाओं, लोककलाओं, लोकगीतों और पारम्परिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने तथा वैश्विक पहचान दिलाने का प्रभावी माध्यम बन रही है।

    हमारे लोक कलाकार, शिल्पकार और पारम्परिक कारीगर हमारी सांस्कृतिक धरोहर के वास्तविक संवाहक हैं। वे केवल कला का प्रदर्शन नहीं करते, बल्कि पीढ़ियों से संचित अनुभव, जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखते हैं। उनका सम्मान वस्तुतः हमारी सांस्कृतिक आत्मा का सम्मान है। ऐसे कलाकारों और शिल्पकारों का सम्मान हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है।

    हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार, समान अवसर और समान गरिमा प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति भी हमें यही शिक्षा देती है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र की समान शक्ति है। जब संविधान की भावना और हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ साथ-साथ चलती हैं, तभी सामाजिक न्याय, समरसता और राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होती है।

    भारत की सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। हमारी भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं, हमारे लोकगीत, वेशभूषाएँ और परम्पराएँ अलग-अलग हो सकती हैं, किन्तु हमारी राष्ट्रीय चेतना एक है। यही भावना ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की आधारशिला है। जब हम एक-दूसरे की संस्कृति का सम्मान करते हैं, एक-दूसरे के पर्वों में सहभागी बनते हैं और एक-दूसरे की परम्पराओं को आत्मीयता से अपनाते हैं, तभी राष्ट्रीय एकता और अधिक सुदृढ़ होती है। विविधताओं का सम्मान ही भारत की लोकतांत्रिक एवं सांस्कृतिक शक्ति का वास्तविक स्वरूप है।

    लोक संवर्धन पर्व जैसे आयोजन इसी राष्ट्रीय भावना को सशक्त बनाते हैं। ऐसे आयोजन विभिन्न समुदायों के मध्य संवाद, विश्वास, सहयोग और आत्मीयता के सेतु का कार्य करते हैं। जब कलाकार, शिल्पकार, साहित्यकार, युवा और समाज के विभिन्न वर्ग एक मंच पर आते हैं, तब केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ ही नहीं होतीं, बल्कि परस्पर सम्मान, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकात्मता की भावना भी सुदृढ़ होती है। यही लोक संस्कृति का वास्तविक उद्देश्य है- समाज को जोड़ना, संस्कारों को जीवित रखना और राष्ट्र को सशक्त बनाना।

    मुझे प्रसन्नता है कि उत्तराखण्ड सरकार तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग समाज के प्रत्येक वर्ग को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से अनेक प्रभावी जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन कर रहे हैं। छात्रवृत्ति, बालिका प्रोत्साहन, कौशल विकास, स्वरोजगार, शिक्षा ऋण तथा अन्य विकास योजनाएँ समाज के वंचित एवं जरूरतमंद वर्गों को सशक्त बनाने का प्रभावी माध्यम बन रही हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक आगे बढ़ने का अवसर उपलब्ध कराना है।

    मुझे विशेष संतोष है कि इन प्रयासों का केन्द्र शिक्षा, कौशल, आत्मनिर्भरता और सशक्तीकरण है। शिक्षा अवसरों के द्वार खोलती है, कौशल आत्मविश्वास देता है और आत्मनिर्भरता व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन प्रदान करती है। जब समाज का प्रत्येक वर्ग शिक्षित, कुशल और आत्मविश्वासी होगा, तभी समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त होगा।

    आज आवश्यकता केवल योजनाएँ बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने की भी है। शासन की सफलता तभी है जब समाज का अंतिम व्यक्ति विकास की मुख्यधारा से जुड़े और प्रत्येक नागरिक यह अनुभव करे कि राष्ट्र की प्रगति में उसकी भी समान भागीदारी है।

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ‘‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’’ के मंत्र के साथ विकसित भारत- 2047 के अमृत लक्ष्य की ओर अग्रसर है। विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक समृद्धि, शिक्षा, नवाचार, कौशल विकास और जनभागीदारी से होगा। विकसित उत्तराखण्ड भी इसी राष्ट्रीय संकल्प का अभिन्न अंग है।

    मैं विशेष रूप से अपने युवा साथियों से आग्रह करता हूँ कि वे आधुनिक तकनीक अपनाएँ, नवाचार करें, स्टार्टअप एवं उद्यमिता को बढ़ावा दें तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों का सकारात्मक उपयोग करें। साथ ही अपनी मातृभाषा, लोकसंस्कृति, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें।
    हमारी मातृशक्ति सदैव समाज परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति रही है। महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता जितनी सुदृढ़ होगी, हमारा समाज उतना ही अधिक समृद्ध, संस्कारित और संवेदनशील बनेगा। स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमिता के माध्यम से उत्तराखण्ड की महिलाएँ विकास की नई गाथा लिख रही हैं। यह हम सभी के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है।

    संस्कृति किसी राष्ट्र की आत्मा होती है। जिस समाज की संस्कृति सशक्त होती है, उसका वर्तमान भी सुरक्षित होता है और उसका भविष्य भी उज्ज्वल होता है। इसलिए हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल स्मृतियों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने परिवार, व्यवहार और जीवन का अभिन्न अंग बनाएँ। सामाजिक समरसता को अपने आचरण का संस्कार बनाएँ, शिक्षा और कौशल को प्रगति का आधार बनाएँ तथा समाज के प्रत्येक वर्ग के सम्मान, सहभागिता और उत्थान के लिए निरंतर कार्य करें।

    यही लोक संवर्धन का वास्तविक उद्देश्य है, यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना है, यही भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना का सार है और यही विकसित उत्तराखण्ड तथा विकसित भारत की सुदृढ़ आधारशिला है।

    मुझे पूर्ण विश्वास है कि लोक संवर्धन पर्व जैसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा देंगे, विभिन्न समुदायों के मध्य संवाद, विश्वास और आत्मीयता को और अधिक सुदृढ़ करेंगे तथा हमारी साझा विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

    ऋग्वेद का यह प्रेरक मंत्र हम सभी के जीवन का मार्गदर्शक बने-

    संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
    देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥

    अर्थात्- आइए, हम सब साथ चलें, साथ विचार करें, हमारे मन एक हों और हम सामूहिक भावना से समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्याण के लिए निरंतर कार्य करें।

    इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!