14-03-2025:परमार्थ निकेतन ऋषिकेश में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द! नमो गंगे!
जब भी कोई साधक हिमालय की गोद में, माँ गंगा के पावन तट पर स्थित इस दिव्य भूमि ऋषिकेश में आता है, तो उसे केवल एक स्थान का अनुभव नहीं होता, बल्कि वह एक ऐसी आध्यात्मिक चेतना से जुड़ता है जिसने हजारों वर्षों से सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन किया है।
देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन भूमि पर, माँ गंगा के निर्मल तट और हिमालय की दिव्य गोद में स्थित परमार्थ निकेतन में आयोजित इस भव्य अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव में विश्व के 80 से अधिक देशों से आए साधकों, योगाचार्यों, राजदूतों और युवा विद्यार्थियों को एक साथ देखकर मन अत्यंत प्रसन्न और भाव-विभोर है। मैं इस वैश्विक समागम में आप सभी योगियों का प्रफुल्लित हृदय से स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ।
आज का यह दृश्य अत्यंत प्रेरणादायी है। विभिन्न संस्कृतियों और देशों के लोग इस पावन गंगा तट पर एकत्र होकर योग और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से मानवता के कल्याण का संदेश दे रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि योग किसी सीमा में बंधा नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की साझा धरोहर है।
भारत की सनातन संस्कृति का मूल संदेश सदैव यही रहा है- “वसुधैव कुटुम्बकम्।” अर्थात सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है। योग इसी महान विचार का साकार रूप है। योग मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है, समाज को समाज से जोड़ता है और अंततः सम्पूर्ण मानवता को परम चेतना से जोड़ता है। यह वह वैश्विक ‘‘कनेक्टिविटी’’ है जो सीमाओं को मिटाकर आत्माओं को जोड़ती है। योग केवल भारत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण मानवता की आवश्यकता है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- “योगः कर्मसु कौशलम्।” अर्थात योग जीवन के प्रत्येक कर्म को संतुलन और उत्कृष्टता के साथ करने की कला है।
महर्षि पतंजलि ने योग की परिभाषा देते हुए कहा है- “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।” अर्थात योग वह साधना है जिसके माध्यम से मन की चंचल वृत्तियों को शांत किया जाता है और मनुष्य आत्मिक शांति का अनुभव करता है।
उत्तराखण्ड केवल एक राज्य नहीं, यह ‘तपःस्थली’ है। यहाँ की मिट्टी के कण-कण में योग और ध्यान रचा-बसा है। भगवान शिव, जो ‘आदियोगी’ हैं, उनकी यह साधना स्थली हमें सिखाती है कि विषमताओं के बीच भी कैसे शांत और अडिग रहा जाता है। एक सैनिक के रूप में मैंने सीमाओं पर जो धैर्य और साहस सीखा, उसका मूल भी कहीं न कहीं योग की उसी एकाग्रता में निहित है।
यह वही हिमालय है जहाँ महर्षि व्यास ने वेदों और पुराणों का संकलन किया, जहाँ आदि शंकराचार्य ने सनातन परम्परा को पुनर्जीवित किया और जहाँ असंख्य ऋषियों ने मानवता के कल्याण के लिए तपस्या की। आज इस पावन गंगा तट पर विश्व के विभिन्न देशों से आए साधकों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हिमालय की वह प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा आज भी सम्पूर्ण मानवता को मार्गदर्शन दे रही हो।
आज का युग अत्यंत तीव्र गति से बदल रहा है। विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को नई सुविधाएँ प्रदान की हैं, लेकिन इसके साथ ही तनाव, चिंता और जीवनशैली से जुड़ी अनेक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। ऐसे समय में योग मानवता के लिए आशा और संतुलन का मार्ग बनकर उभरा है।
योग हमें यह सिखाता है कि बाहरी प्रगति के साथ-साथ आंतरिक संतुलन भी उतना ही आवश्यक है। योग शरीर को स्वस्थ, मन को शांत और आत्मा को जाग्रत करता है। आज विश्व के करोड़ों लोग योग को अपने जीवन का हिस्सा बना रहे हैं।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रेरक प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में घोषित किया। यह भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा के प्रति वैश्विक सम्मान का अद्भुत उदाहरण है।
आज विश्व के लगभग प्रत्येक देश में योग का अभ्यास किया जा रहा है और यह मानवता के लिए स्वास्थ्य और शांति का संदेश दे रहा है। परमार्थ निकेतन में आयोजित यह अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव उसी वैश्विक चेतना का एक प्रेरणादायी उत्सव है।
परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने इस तट को न केवल उत्तराखण्ड का गौरव बनाया है, बल्कि इसे एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ के रूप में स्थापित किया है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति केवल योग का अभ्यास ही नहीं करता, बल्कि वह भारत की आध्यात्मिक परम्पराओं और मानवता के सार्वभौमिक मूल्यों का अनुभव भी करता है।
यहाँ की गंगा आरती और यहाँ का अनुशासित आध्यात्मिक वातावरण साक्षात दिव्यता का अनुभव कराता है। स्वामी जी का विजनकृ ‘‘ग्लोबल योगा फॉर ग्लोबल पीस’’- आज समय की सबसे बड़ी मांग है। स्वामी जी, आपके मार्गदर्शन में परमार्थ निकेतन ने ‘सेवा’ और ‘साधना’ का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।
माँ गंगा केवल एक नदी नहीं है, बल्कि वह हमारी संस्कृति, आस्था और जीवन की जीवनरेखा है। गंगा का यह पावन तट हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही मानव जीवन की पूर्णता संभव है। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहा है, तब योग हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है।
आज दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (।प्) की बात कर रही है, लेकिन भारत हजारों वर्षों से ‘आंतरिक इंटेलिजेंस’ अर्थात योग का संदेश देता आया है। यह तकनीकी युग जहाँ ।प् के माध्यम से बाहरी दुनिया को सरल बना रहा है, वहीं योग हमारी आंतरिक चेतना को संतुलित और जाग्रत करता है। जिस प्रकार किसी कंप्यूटर को श्रेष्ठ सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक श्रेष्ठ और संतुलित जीवन के लिए योग सबसे उत्तम ‘सॉफ्टवेयर’ है।
योग को अक्सर केवल ‘वेलनेस’ तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि वास्तव में यह आत्म-साक्षात्कार की यात्रा है। कठोपनिषद् में कहा गया है कि जब इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि पूर्ण संतुलन में स्थिर हो जाते हैं, वही योग की परम अवस्था मानी गई है।
जब मनुष्य स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, तब उसके लिए संसार की कोई भी चुनौती बड़ी नहीं रह जाती। एक सैनिक की विजय बाहरी शत्रु पर होती है। लेकिन एक योगी की विजय अपने भीतर के विकारों पर होती है।
मुझे यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि इस महोत्सव में विश्व के अनेक देशों से आए युवा विद्यार्थी भी भाग ले रहे हैं। युवा पीढ़ी किसी भी राष्ट्र और समाज का भविष्य होती है। यदि युवा योग, अनुशासन और संतुलित जीवनशैली को अपनाते हैं, तो वे न केवल स्वयं स्वस्थ बनते हैं बल्कि समाज को भी सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं।
यहाँ उपस्थित अनेक देशों के युवा विद्यार्थियों से मैं कहना चाहता हूँ- आप भविष्य के निर्माता हैं। भारत 2047 तक एक ‘विकसित राष्ट्र’ और ‘विश्व गुरु’ बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में योग हमारा सबसे बड़ा संबल होगा। एक स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
आज विश्व अनेक संघर्षों, मानसिक तनावों, सामाजिक असंतुलन, पर्यावरणीय संकट और अलगाववाद से जूझ रहा है। ऐसे में योग हमें सह-अस्तित्व, करुणा और समरसता का मार्ग दिखाता है। जब हम प्राणायाम करते हैं, तो हम उसी वायु को ग्रहण करते हैं जो दूसरा व्यक्ति छोड़ता है। यह इस बात का प्रमाण है कि हम सब एक ही ऊर्जा से जुड़े हैं।
आज इस गंगा तट पर विश्व के विभिन्न देशों से आए राजदूतों, योगाचार्यों और साधकों का एकत्र होना यह दर्शाता है कि आध्यात्मिकता की कोई सीमाएँ नहीं होतीं। आध्यात्मिक चेतना मनुष्य को सीमाओं से ऊपर उठाकर मानवता के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ती है।
देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव अपनी “अतिथि देवो भवः” की परम्परा के साथ विश्व का स्वागत करता आया है। यहाँ आने वाला प्रत्येक अतिथि हमारे लिए देवतुल्य होता है और हमारे परिवार का सदस्य बन जाता है।
यहां उपस्थित सभी योगी, योग के ‘ब्रांड एंबेसडर’ हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि विश्व के कोने-कोने से आए सभी राजदूत और साधक जब आप यहाँ से अपने देश वापस जाएँगे, तो केवल यादें लेकर नहीं जाएँगे, बल्कि माँ गंगा की पवित्रता, योग और अध्यात्म की ऊर्जा तथा हिमालय की दिव्यता का अनुभव भी अपने हृदय में लेकर जाएंगे।
आइए! हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम योग के इस दिव्य संदेश को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाएँगे। हम शांति के लिए योग, मानवता के लिए योग और विश्व कल्याण के लिए योग को अपने जीवन का आधार बनाएँगे।
अंत में, मैं इस अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव के सफल आयोजन के लिए परमार्थ निकेतन परिवार, परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी, पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी तथा आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों को हार्दिक बधाई देता हूँ।
उत्तराखण्ड सदैव आपका स्वागत करने के लिए तत्पर है। यहाँ की पहाड़ियाँ, यहाँ की नदियाँ और यहाँ की दिव्य चेतना आपको सदैव पुकारेगी। मेरा दृढ़ विश्वास है कि आप सभी अपने-अपने देशों में लौटकर योग, शांति और मानवता के इस दिव्य संदेश को और अधिक व्यापक रूप से फैलाएँगे और सम्पूर्ण विश्व में सद्भाव और समरसता के दूत बनेंगे। मैं महायोगी भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना करता हूँ कि आप सभी का यहाँ का प्रवास सुखद, प्रेरणादायी और आध्यात्मिक अनुभवों से परिपूर्ण हो।
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्॥
सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का मंगल हो और कोई भी दुखी न रहे। ‘लोक कल्याण’ यही तो योग का अंतिम लक्ष्य है और यही योग का संदेश है, यही भारत की आत्मा है।
विश्व में शांति हो, सद्भाव हो, समरसता हो और सम्पूर्ण मानवता सुखी एवं स्वस्थ रहे, इसी मंगलकामना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
जय हिन्द!