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    13-02-2026 : भारत हिमालयन इंटरनेशनल स्ट्रैटेजिक मंच – भीष्म (BHISM) लोगों एवं वेबसाइट शुभारंभ अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन

    प्रकाशित तिथि : फ़रवरी 13, 2026

    जय हिन्द!

    आज देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पुण्य भूमि पर भारत हिमालयन इंटरनेशनल स्ट्रैटेजिक मंच “भीष्म” के शुभारंभ के अवसर पर आप सभी के मध्य उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत गौरव, आत्मसंतोष और गहन राष्ट्रीय दायित्व-बोध का विषय है।

    आज का यह क्षण केवल एक संस्थान के आरंभ का अवसर नहीं है, यह भारत की रणनीतिक चेतना, सभ्यतागत आत्मविश्वास और दीर्घकालिक राष्ट्रीय संकल्प के एक नए अध्याय का उद्घोष है।

    मैं इस गरिमामय अवसर पर उपस्थित चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान जी, सम्मानित सैन्य अधिकारियों, नीति विशेषज्ञों, शिक्षाविदों तथा सभी प्रबुद्धजनों का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ।

    देहरादून केवल एक नगर नहीं है – यह राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला है। यहीं लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी देश के भावी प्रशासकों को गढ़ती है। यहीं वन अनुसंधान संस्थान प्रकृति संरक्षण की दिशा तय करता है। यहीं भारतीय वन्यजीव संस्थान जैव विविधता की रक्षा करता है। और यहीं वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान हिमालय की वैज्ञानिक चेतना को समझने का कार्य करता है।

    इन सभी प्रतिष्ठित संस्थानों की विशेषज्ञता और ज्ञान के भंडार को एक सूत्र में पिरोकर “भीष्म” एक ऐसे बौद्धिक छत्र के रूप में उभरेगा, जो भारत की रणनीतिक क्षमता को नई ऊँचाई प्रदान करेगा।

    “भीष्म” केवल नाम नहीं, यह एक प्रतिज्ञा है।

    महाभारत के भीष्म पितामह ने जीवन भर एक ही व्रत निभाया – राष्ट्र सर्वाेपरि। आज यह संस्थान भी वही प्रतिज्ञा ले रहा है, बौद्धिक ईमानदारी की, निर्भीक सत्य की और राष्ट्रहित की। मैं मानता हूँ कि भारत को आज केवल ताकतवर नहीं, बल्कि विचारवान भी होना चाहिए। भीष्म इसी विचारशील शक्ति का केंद्र बनेगा।

    भगवान शिव के त्रिशुल की भांति यह संस्थान तीन ऐसे वज्र-स्तंभों बौद्धिक कठोरता, समावेशी संवाद, प्रगतिशील कार्रवाई पर टिका होगा, जो इसे विश्वस्तरीय पहचान देंगे। यहाँ होने वाला शोध कठोर तथ्यों, गहन डेटा और जमीनी सच्चाइयों की कसौटी पर कसा हुआ होगा। यह एक ऐसा साझा मंच होगा जहाँ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के अनुभव, वैज्ञानिकों के नवाचार और युवाओं की ताजा सोच के बीच एक जीवंत विमर्श होगा। और नीतियों को ‘सिद्धांत’ से निकालकर ‘समाधान’ तक ले जाने वाला एक ‘ब्रिज’ बनेगा।

    साथियों,

    हिमालय वास्तव में, भारत की ‘प्राणवायु’ और ‘आत्मा’ है। यह हमारी सभ्यता का उद्गम भी है और हमारे अस्तित्व का रक्षक भी। यही हमारी जल सुरक्षा का आधार, जैव विविधता का भंडार और जलवायु संतुलन का प्रहरी भी है। और सबसे महत्वपूर्ण यह भारत की Northern Strategic Architecture है।

    आज जब वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है, जब सीमाएँ साइबर, अंतरिक्ष और सूचना युद्ध तक फैल चुकी हैं – तब हिमालय केवल प्राकृतिक ढाल नहीं, बल्कि भारत की सामरिक रीढ़ है।

    मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ, भारत की रणनीतिक गहराई जितनी महासागरों में है, उतनी ही हिमालय की इन ऊँचाइयों में भी। सप्लाई चेन, जल संसाधन, ऊर्जा सुरक्षा, सीमा स्थिरता ये सभी हिमालय से जुड़े हैं। निश्चित ही भीष्म इस हिमालयी क्षेत्र को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाएगा।

    आज भारत ‘अमृतकाल’ के उस स्वर्णिम पथ पर है, जहाँ हमारी दृष्टि केवल अगले कुछ वर्षों पर नहीं, बल्कि ‘विकसित भारत 2047’ के विराट लक्ष्य पर टिकी है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के यशस्वी नेतृत्व में नया भारत उपभोक्ता नहीं बल्कि नवप्रवर्तक बन रहा है। अनुयायी नहीं बल्कि पथ-प्रदर्शक बन रहा है।

    यह मंच हमारी घरेलू और विदेश नीतियों को केवल पश्चिमी चश्मे से नहीं, बल्कि हमारे अपने ‘सभ्यतागत मूल्यों’ और चाणक्य जैसी कूटनीतिक विरासत के प्रकाश में देखेगा। हम दुनिया को यह दिखाएंगे कि रणनीतिक स्पष्टता का अर्थ केवल शक्ति का संचय नहीं, बल्कि ‘धर्म’ और ‘न्याय’ आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण है।

    आज हमारी सेना का पराक्रम केवल पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है। आज सैनिक सीमाओं पर ही नहीं, साइबर स्पेस, अंतरिक्ष और सूचना तंत्र में भी राष्ट्र की रक्षा कर रहे हैं। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, संयुक्त कमान संरचना और सैन्य-नागरिक एकीकरण। यह नए भारत की पहचान है।

    यह मंच केवल पारंपरिक युद्ध नीतियों पर चर्चा नहीं करेगा, बल्कि यह समग्र सुरक्षा के सभी आयामों का अध्ययन करेगा। यहाँ होने वाला मंथन यह सुनिश्चित करेगा कि भारत एक अभेद्य और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर अपनी पहचान और मजबूत करे।

    मेरे युवा साथियों,

    आप केवल वर्तमान के साक्षी नहीं, बल्कि विकसित भारत के भाग्य-विधाता हैं। उत्तराखण्ड की इस वीरभूमि ने अपनी रगों में बहने वाले साहस से भारतीय सेना और प्रशासन को हमेशा नेतृत्व दिया है। लेकिन अब समय है अपनी ऊर्जा को ‘बौद्धिक रणक्षेत्र’ में उतारने का। आप नीतियों के अनुयायी नहीं, नीति निर्माता बनें।

    यह मंच एक ऐसा सेतु बनेगा जहाँ आपकी मौलिक सोच को नीति-निर्माण के अनुभव के साथ जोड़ा जाएगा। यह मंच आपको राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए तैयार करेगा, ताकि आप दुनिया की आँखों में आँखें डालकर भारत का पक्ष रख सकें। आपकी रणनीतिक मेधा ही भारत को एक Thinking Power बनाएगी।

    हिमालय की गोद में बसे उत्तराखण्ड के लिए आपदा प्रबंधन केवल कागजी योजना नहीं, बल्कि हमारी अस्तित्व की सुरक्षा का संकल्प है। भूस्खलन, बादल फटना और भूकंप जैसी प्राकृतिक चुनौतियाँ हमें चेताते हैं कि विकास और पर्यावरण में संतुलन अनिवार्य है। हमें ‘इकोनॉमी’ और ‘इकोलॉजी’ के बीच एक अटूट संतुलन बनाना होगा।

    यह मंच इस दिशा में एक वैज्ञानिक और रणनीतिक संबल प्रदान करेगा। यह केवल संकट के बाद की प्रतिक्रिया पर नहीं, बल्कि शोध-आधारित रोकथाम और ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ पर ध्यान केंद्रित करेगा। यहाँ होने वाला शोध हमें सिखाएगा कि कैसे आधुनिक तकनीक और स्थानीय ज्ञान के मेल से हम एक ‘आपदा-सहनशील’ उत्तराखण्ड का निर्माण कर सकते हैं।

    मित्रों,

    आज विश्व भारत की ओर केवल इसलिए नहीं देख रहा कि हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं, बल्कि इसलिए कि हमारे पास वैश्विक समस्याओं के लिए ‘भारतीय समाधान’ हैं। नया भारत वैश्विक नियमों का अनुसरण नहीं करता बल्कि नरेटिव सेटर की भूमिका में है। चाहे इंटरनेशनल सोलर अलायंस हो, UPI हो या वसुधैव कुटुम्बकम्। अपना नया भारत अब दुनिया का एजेंडा तय कर रहा है।

    अंत में, मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ, देवभूमि से प्रज्वलित यह रणनीतिक ज्योति भारत के भविष्य को आलोकित करेगी। अब भारत केवल सुरक्षित नहीं रहेगा, भारत निर्णायक भी बनेगा। भारत केवल विकसित नहीं होगा, भारत विश्व को दिशा भी देगा।

    आइए! संकल्प लें – हिमालय की दृढ़ता के साथ, राष्ट्र प्रथम के भाव से, भारत माता के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ, हम विकसित भारत 2047 की यात्रा को सशक्त बनाएँगे। इस आह्वान, विश्वास और मंगल कामना के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!