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    15-02-2026 : संजय सिंह स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : फ़रवरी 15, 2026

    जय हिन्द!

    आज इस गंभीर, भावपूर्ण और प्रेरणादायी अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होना मेरे लिए गहन आत्मिक अनुभूति का विषय है। हम आज यहाँ केवल एक स्मृति व्याख्यान के लिए एकत्र नहीं हुए हैं-अपितु हम उस कर्तव्यबोध, साहस और बलिदान को नमन करने आए हैं, जो स्वर्गीय संजय सिंह जैसे अधिकारियों के जीवन का मूल स्वर था।

    वे भारतीय वन सेवा के उन जांबाज अधिकारियों में से थे, जिन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए सर्वाेच्च बलिदान दिया। उनका जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि लोकसेवा केवल पद नहीं-यह तपस्या है। और जब यह तपस्या सत्यनिष्ठा, निर्भीकता और राष्ट्रभाव से जुड़ जाती है, तब इतिहास रचा जाता है। उनका जीवन विशेष रूप से आप जैसे युवा अधिकारियों के लिए प्रेरणाप्रद है, जो अपने व्यावसायिक जीवन के प्रथम चरण में हैं।

    प्रिय प्रशिक्षु अधिकारियों,

    वन सेवा का अर्थ केवल वृक्षों की रक्षा नहीं है-यह जल, जमीन, जंगल और जनजीवन-इन चारों के संतुलन की जिम्मेदारी है। यह वह सेवा है, जहाँ आपको कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सामाजिक जटिलताओं और प्रशासनिक दबावों के बीच निर्णय लेने होते हैं। ऐसे समय में चरित्र ही आपका सबसे बड़ा कवच बनता है।

    मैं आप सभी को विशेष रूप से यह कहना चाहता हूँ-भ्रष्टाचार से सदैव सावधान रहिए। कोई भी समझौता, चाहे वह छोटा क्यों न लगे, अंततः सेवा की आत्मा को कमजोर करता है। आपकी वर्दी और आपका पद नहीं-आपका आचरण आपको पहचान देता है। याद रखिए, एक अधिकारी की साख वर्षों में बनती है, पर एक गलत निर्णय में टूट सकती है।

    आज भारत विकसित भारत की दिशा में दृढ़ संकल्प के साथ अग्रसर है। यह यात्रा केवल आर्थिक आँकड़ों की नहीं, यह आत्मविश्वास, नवाचार और सुशासन की यात्रा है। आधारभूत संरचना से लेकर डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं तक, स्टार्ट-अप संस्कृति से लेकर अंतरिक्ष उपलब्धियों तक-भारत ने कम समय में असाधारण प्रगति की है।

    यह परिवर्तन तभी स्थायी होगा, जब जमीन पर ईमानदार क्रियान्वयन हो-और यही भूमिका आपकी है। वन अधिकारी के रूप में आप जल सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई, जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के माध्यम से सीधे राष्ट्र-निर्माण के सहभागी हैं। आपका हर फील्ड निर्णय भारत के भविष्य की नींव को मजबूत करता है।

    मुझे पर्वतीय क्षेत्रों, कश्मीर की घाटियों और उत्तर-पूर्व के वनांचलों में कार्य करने का अवसर मिला है। इन अनुभवों के आधार पर मैं दृढ़ता से कह सकता हूँ कि पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र हमारे देश की जीवन रेखा हैं। ये क्षेत्र केवल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नहीं-वे जल सुरक्षा, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता के स्तंभ हैं।

    हमारा भारत केवल एक भूभाग नहीं, यह प्रकृति, संस्कृति और चेतना की जीवंत भूमि है। यहाँ के वन नदियों को जीवन देते हैं, मैदानों की प्यास बुझाते हैं और करोड़ों नागरिकों के लिए पारिस्थितिक सुरक्षा कवच बनते हैं। ऐसे में आप जैसे युवा अधिकारियों की भूमिका राष्ट्रव्यापी और निर्णायक है-देश के हर कोने में आपको संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास के संतुलन के साथ इस अमूल्य प्राकृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाना है।

    हमारे शास्त्र प्रकृति को माता मानते हैंकृ “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” यह भाव हमें सिखाता है कि हम धरती के स्वामी नहीं, उसकी संतान हैं। जब यह दृष्टि आपके निर्णयों में उतरेगी, तब प्रशासन मानवीय भी होगा और दूरदर्शी भी।

    प्रिय प्रशिक्षु अधिकारियों,

    जनभागीदारी के बिना संरक्षण संभव नहीं है। स्थानीय समुदायों को साथ लिए बिना वनों का पुनर्जनन, संरक्षण और प्रबंधन अधूरा रह जाता है। वाटरशेड विकास, मृदा एवं जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, औषधीय पौधों का संवर्धन-ये सभी प्रयास तभी सफल होंगे, जब वन-आश्रित समुदाय आर्थिक रूप से सक्षम और पारिस्थितिक रूप से जागरूक बनेंगे। याद रखिए-जब लोग समाधान का हिस्सा बनते हैं, तब संघर्ष सहयोग में बदल जाता है।

    आज हमारे सामने कई चुनौतियाँ हैं-अवैध खनन, अतिक्रमण, वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष। इन जटिल समस्याओं के समाधान के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं-इसके लिए प्रशासनिक संतुलन, व्यावसायिक दक्षता और नैतिक साहस चाहिए। तकनीक का उपयोग कीजिए, पर संवेदना को केंद्र में रखिए। डेटा जरूरी है, पर दर्द को समझना उससे भी जरूरी है।

    आप सभी भविष्य के फील्ड ऑफिसर हैं। आपको विकासात्मक आकांक्षाओं और संरक्षण आवश्यकताओं के बीच संतुलन साधना होगा। यह संतुलन केवल तकनीकी ज्ञान से नहीं-संवेदनशीलता, धैर्य और विवेकपूर्ण निर्णय क्षमता से संभव है।

    मैं आपको चार सरल लेकिन अत्यंत प्रभावी सूत्र देना चाहता हूँ-
    पहला, सहानुभूति के साथ संवाद करें। जब लोग सुने जाते हैं, वे सहयोगी बनते हैं। दूसरा, अनुशासन और सतत परिश्रम को जीवन का हिस्सा बनाइए-लोकसेवा निरंतर प्रतिबद्धता की मांग करती है। तीसरा, धैर्य रखें-प्रकृति और समाज दोनों शांत प्रयासों से ही सुदृढ़ होते हैं। चौथा, नवाचार को अपनाएँ-तकनीक को संवेदना से जोड़िए।

    आप सभी को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आप केवल प्रशासक नहीं-आप प्रभावी संप्रेषक और विश्वास के वाहक हैं। इसी संदर्भ में भगवद्गीता हमें मार्ग दिखाती है- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”, अर्थात् आपका अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। निष्काम भाव से किया गया कर्तव्य ही सच्ची सेवा है।

    प्रिय युवा साथियों,

    आज जिन पाँच प्रशिक्षु अधिकारियों को सम्मानित किया जा रहा है-यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस अनुशासन, परिश्रम और मूल्य-आधारित आचरण की पहचान है, जिसकी अपेक्षा इस सेवा से की जाती है। मैं सभी सम्मानित प्रशिक्षुओं को बधाई देता हूँ और शेष साथियों से कहता हूँ-इसे प्रेरणा बनाइए। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा अपनाइए, पर सहयोग की भावना बनाए रखिए। आपकी सफलता सामूहिक उत्कृष्टता में निहित है।

    एक वनाग्नि से बचाया गया छोटा पक्षी शायद आपको धन्यवाद न दे सके, पर वही पक्षी आने वाले समय में जैव विविधता, कृषि और जीवन-समृद्धि का आधार बनेगा। यही सेवा का सौंदर्य हैकृनिस्वार्थ, मौन और दूरगामी।

    प्रिय प्रशिक्षु अधिकारियों,

    भ्रष्टाचार से दूर रहकर, संवेदनशीलता के साथ कार्य करते हुए और नवाचार को अपनाकर आप न केवल वनों के संरक्षक बनेंगे, बल्कि विकसित भारत के सशक्त शिल्पकार भी होंगे। याद रखिए-आपका हर ईमानदार निर्णय भारत के उज्ज्वल भविष्य की नींव मजबूत करता है।

    मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि स्वर्गीय संजय सिंह के बलिदान को केवल स्मृति नहीं-जीवन-मूल्य बनाइए। निष्पक्षता के साथ विधि का पालन करें, हमारी प्राकृतिक धरोहर की रक्षा करें और सत्यनिष्ठा के साथ जनसेवा करें।

    अंत में मैं यही कहूँगा- आप केवल अधिकारी नहीं हैं। आप प्रकृति के प्रहरी हैं। आप राष्ट्र के विश्वासवाहक हैं। आप विकसित भारत के शिल्पकार हैं। जब आप जंगल की पगडंडियों पर चलें-तो राष्ट्र का स्वप्न आपके साथ चले। जब आप निर्णय लें, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य आपके सामने हो। और जब आप थकें-तो यह स्मरण रहे कि आपकी सेवा करोड़ों जीवनों को स्पर्श करती है।

    मैं कामना करता हूँ कि यह स्मृति व्याख्यान आप सभी प्रशिक्षु अधिकारियों को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हुए साहस, करुणा और संतुलन के साथ अपने दायित्वों के निर्वहन हेतु प्रेरित करे, और स्वर्गीय संजय सिंह की गौरवपूर्ण विरासत आपकी सेवा के माध्यम से निरंतर जीवंत रहे।

    जय हिन्द!