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    12-04-2026:उत्तराखण्ड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित नॉर्थ रीजन के रीजनल कॉन्फ्रेंस में “न्याय तक पहुँच को आसान बनाना” विषय पर माननीय राज्यपाल का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अप्रैल 12, 2026

    जय हिन्द!

    भारत के सर्वाेच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश- जस्टिस सूर्यकांत जी, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री- श्री पुष्कर सिंह धामी जी, सर्वाेच्च न्यायालय के न्यायाधीश- जस्टिस विक्रम नाथ जी, भारत सरकार में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)- श्री अर्जुन राम मेघवाल जी, उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश- जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता जी, उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश- जस्टिस मनोज कुमार तिवारी जी, सर्वाेच्च न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों के सभी आदरणीय न्यायाधीशगण, विशिष्ट प्रतिनिधिगण, विधि विशेषज्ञ तथा उपस्थित सभी महानुभाव!

    आज नॉर्थ रीजन के इस महत्वपूर्ण रीजनल कॉन्फ्रेंस में उपस्थित सभी महानुभावों को मैं हार्दिक बधाई देता हूँ। साधारण पृष्ठभूमि से सर्वाेच्च न्यायिक पद पर कार्यरत भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस सूर्यकांत जी का मैं देवभूमि उत्तराखण्ड में हार्दिक स्वागत करता हूँ, जिनका विधिक कौशल और न्याय के प्रति समर्पण हमारी न्यायिक व्यवस्था को निरंतर शक्ति प्रदान कर रहा है।

    हिमालय की दिव्य, शांत और तपोमयी छाया में आयोजित इस महत्वपूर्ण सम्मेलन को संबोधित करना मेरे लिए अत्यंत गौरव का विषय है। आज हम एक महत्वपूर्ण विषय “न्याय तक पहुँच को आसान बनाना” पर विचार-विमर्श के लिए एकत्रित हुए हैं, जो केवल विधिक व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा, हमारी संवैधानिक प्रतिबद्धता और हमारी सामाजिक संवेदनशीलता का मूल आधार है।

    न्याय, अपने वास्तविक और व्यापक अर्थों में, केवल न्यायालयों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। यह एक जीवंत और गतिशील विचार है, जो व्यक्ति को सम्मान, समाज को संतुलन और राष्ट्र को स्थिरता प्रदान करती है।

    हमारे प्राचीन भारतीय चिंतन में न्याय केवल विधिक अवधारणा नहीं, बल्कि धर्म, करुणा और समरसता का प्रतीक रहा है। “धर्मों रक्षति रक्षितः” का शाश्वत सिद्धांत हमें यह स्मरण कराता है कि जब हम न्याय की रक्षा करते हैं, तो न्याय भी हमारी रक्षा करता है। इसलिए न्याय केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत विश्वास है, जिस पर समाज की नींव टिकी होती है।

    किन्तु हमें यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि जब न्याय दूर हो, विलंबित हो या महँगा हो, तो वह अपने वास्तविक स्वरूप को खो देता है। ऐसी स्थिति, न्याय के उद्देश्य को ही बेअसर कर देती है और कई बार यह अन्याय के समान प्रतीत होती है। इसी चुनौती का समाधान खोजने के लिए हम आज यहाँ एकत्रित हुए हैं, ताकि हम न्याय और नागरिक के बीच की दूरी को समाप्त कर सकें।

    हमारा संविधान यह भी सुनिश्चित करता है कि अनुच्छेद 39। तथा 14, 19 और 21 के तहत न्याय प्रत्येक नागरिक का सुलभ और मौलिक अधिकार है, जिससे किसी को भी आर्थिक या सामाजिक कारणों से वंचित नहीं किया जा सकता। यह संवैधानिक प्रावधान के साथ ही एक राष्ट्रीय संकल्प है, जिसे हमें व्यवहार में उतारना होगा।

    उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्य के लिए यह विषय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यहाँ न्याय तक पहुँच की चुनौती केवल कानूनी नहीं, बल्कि भौगोलिक और सामाजिक भी है। पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में न्याय तक पहुँचना आज भी चुनौतीपूर्ण है।

    पलायन के कारण अनेक गाँवों में बुजुर्ग अकेले रह गए हैं, जिन्हें अपने अधिकारों की रक्षा और न्याय तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है कि क्या हमारा न्याय तंत्र वास्तव में उन तक पहुँच पा रहा है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

    इसके साथ ही, उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील राज्य है। केदारनाथ और चमोली जैसी घटनाओं ने हमें यह सिखाया है कि आपदा के बाद केवल राहत और पुनर्वास ही पर्याप्त नहीं है। प्रभावित परिवारों को समयबद्ध मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास मिलना चाहिए- यह भी न्याय का ही एक स्वरूप है।

    हमारे सामने न्याय के अनेक मानवीय आयाम भी हैं। विचाराधीन कैदियों के संबंध में हमें न्याय को केवल दंडात्मक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखना होगा। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में हो, अपने मौलिक अधिकारों का अधिकारी है। इसी प्रकार, एसिड अटैक के पीड़ितों, महिलाओं और बच्चों के मामलों में हमें न्याय के साथ-साथ पुनर्वास, गरिमा और सम्मान को भी सुनिश्चित करना होगा।

    आज के इस सम्मेलन में जिन विषयों पर चर्चा हो रही है- वन अधिकार, महिलाओं की सुरक्षा, बाल संरक्षण और सामाजिक न्याय- वे इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि न्याय केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक आयाम से जुड़ा हुआ है। हमें एक ऐसी न्याय प्रणाली का निर्माण करना होगा, जो संवेदनशील, समावेशी और मानवीय हो।

    ऐसे परिदृश्य में, उत्तराखण्ड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का कार्य सराहनीय रहा है। यह संस्था अब केवल एक कानूनी तंत्र नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की एक सशक्त शक्ति बन चुकी है। 1,842 गाँवों में ‘मुकदमेबाजी-मुक्त ग्राम’ पहल और 15 हजार स्वयंसेवकों के माध्यम से ‘एक गाँव-एक निःशुल्क विधि सेवा’ अभियान ने न्याय को जन-जन तक पहुँचाया है।

    “नई रोशनी” जैसे अभियान यह सिद्ध करते हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था केवल औपचारिक नहीं, बल्कि मानवीय और संवेदनशील भी है। यह प्रयास इस बात के प्रमाण हैं कि जब इच्छाशक्ति और संवेदनशीलता का समन्वय होता है, तो न्याय वास्तव में जन-जन तक पहुँच सकता है।

    इस दिशा में टेक्नोलॉजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। “न्याय-मित्र पोर्टल” का शुभारंभ इस बात का प्रतीक है कि हम न्याय को डिजिटल माध्यम से अधिक सुलभ बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के “डिजिटल इंडिया” के विजन के अनुरूप हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि टेक्नोलॉजी न्याय का सेतु बने, बाधा नहीं। डिजिटल समाधान की सफलता तभी है, जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचकर उसे सशक्त बनाएं।

    इसके साथ ही, लोक अदालत प्रणाली को और अधिक सुदृढ़ करना समय की आवश्यकता है। लोक अदालत न्याय को सरल, त्वरित और सुलभ बनाती है। यह न्यायिक प्रक्रिया को गति देकर समाज में आपसी समझ और समरसता को भी बढ़ावा देती है। यह वास्तव में न्याय के मानवीय स्वरूप का सशक्त उदाहरण है।

    अंततः न्याय तक पहुँच बढ़ाना न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और समाज सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें एक ऐसी समन्वित व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें प्रत्येक संस्था अपनी भूमिका को समझते हुए न्याय को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हो।

    आइए! हम ऐसी न्याय व्यवस्था का निर्माण करें, जहाँ न्याय केवल उपलब्ध नहीं, बल्कि सुलभ, और समयबद्ध हो, जहाँ वह कागजों से निकलकर जन-जन के जीवन में साकार हो, जहाँ दूरी अधिकारों में बाधा न बने, और न्याय केवल निर्णय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के विश्वास की सबसे सशक्त नींव बने।

    मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श भारत की न्याय प्रणाली को और अधिक सशक्त, पारदर्शी और समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। इन्हीं शब्दों के साथ, मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदेमातरम! भारत माता की जय! जय हिन्द!