11-09-2026 : साइबर सुरक्षा और डिजिटल फॉरेंसिक्स में प्रगति पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन “ICACSDF&2026” में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का संबोधन
जय हिन्द!
साइबर सुरक्षा और डिजिटल फॉरेंसिक्स में प्रगति जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक विषय पर आयोजित इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए मुझे विशेष प्रसन्नता हो रही है।
मैं न्च्म्ै और सम्मेलन के सभी आयोजकों को हार्दिक बधाई देता हूँ कि उन्होंने ऐसे विषय को चर्चा के केंद्र में रखा है, जिसका सीधा संबंध भारत की तकनीकी प्रगति, आर्थिक सुरक्षा, नागरिकों के विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा से है।
आज हम ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहाँ हमारे जीवन का लगभग हर क्षेत्र डिजिटल तकनीक से जुड़ गया है। बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और शासन से लेकर उद्योग, ऊर्जा, परिवहन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे तक-हमारी निर्भरता डिजिटल प्रणालियों पर लगातार बढ़ रही है।
इसलिए आज एक बात पूरी स्पष्टता से समझनी होगी- डिजिटल भारत हमारी शक्ति है, लेकिन सुरक्षित डिजिटल भारत हमारी आवश्यकता है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने डिजिटल परिवर्तन को व्यापक जन-आंदोलन का स्वरूप दिया है। डिजिटल इंडिया ने शासन, वित्तीय समावेशन, नागरिक सेवाओं और जन-सुविधाओं को नई गति दी है। आज भारत की डिजिटल क्षमता दुनिया में हमारी नई पहचान और हमारी नई शक्ति बन रही है।
लेकिन डिजिटल विस्तार के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी हमारे सामने है-हमारी डिजिटल व्यवस्था कितनी सुरक्षित है?
मेरा स्पष्ट मानना है कि तकनीक की गति के साथ सुरक्षा की क्षमता भी बढ़नी चाहिए। नवाचार जितना तेज हो, हमारी साइबर सुरक्षा उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। डिजिटल व्यवस्था में विश्वास तभी कायम रहेगा, जब नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका डेटा, उनकी पहचान, उनकी मेहनत की कमाई और देश की महत्वपूर्ण प्रणालियाँ सुरक्षित हैं।
आज साइबर सुरक्षा केवल तकनीकी विशेषज्ञों का विषय नहीं है। यह राष्ट्र की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था की सुरक्षा और नागरिकों के विश्वास की सुरक्षा का विषय है।
मैंने अपने सैन्य जीवन में देश की भौतिक सीमाओं की सुरक्षा को सर्वाेच्च दायित्व के रूप में देखा है। सैनिक सीमा पर खड़ा होकर राष्ट्र की रक्षा करता है। डिजिटल युग में हमारी एक और सीमा है-डिजिटल सीमा। इस सीमा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
यहाँ हमारी सुरक्षा की पहली पंक्ति में साइबर विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ, उद्योग और विश्वविद्यालय हैं। लेकिन इस सुरक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हमारा जागरूक नागरिक भी है।
आज साइबर अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, फर्जी वेबसाइट और संदेश, सामाजिक माध्यमों के माध्यम से ठगी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग-ये सभी नई चुनौतियाँ हमारे सामने हैं।
इनमें ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के नाम पर होने वाली ठगी विशेष रूप से चिंताजनक है। अपराधी पुलिस अधिकारी, जांच अधिकारी, न्यायालय या किसी सरकारी संस्था का अधिकारी बनकर नागरिकों में भय पैदा करते हैं और उन्हें तुरंत धन भेजने या निजी जानकारी साझा करने के लिए मजबूर करते हैं।
मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ-फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से कोई वास्तविक ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ नहीं होती। साइबर अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार केवल तकनीक नहीं है। उनका सबसे बड़ा हथियार है-भय, भ्रम और जल्दबाजी। इसलिए साइबर सुरक्षा के लिए जागरूकता जरूरी है।
भारत सरकार ने नागरिकों की सहायता के लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की त्वरित रिपोर्टिंग के लिए 1930 हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएँ विकसित की हैं। लेकिन किसी भी व्यवस्था की सफलता तभी संभव है, जब नागरिक स्वयं सजग और जिम्मेदार हों।
मैं सभी नागरिकों से आग्रह करता हूँ-अनजान लिंक पर क्लिक न करें। ओटीपी और पासवर्ड किसी के साथ साझा न करें। बैंकिंग संबंधी जानकारी अनजान व्यक्ति को न दें। यदि साइबर धोखाधड़ी हो जाए, तो घबराएँ नहीं और बिना देर किए 1930 पर संपर्क करें।
साथियों,
साइबर सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है-डिजिटल फॉरेंसिक्स। अपराध का स्वरूप बदल रहा है, इसलिए अपराध की जांच की पद्धति भी बदलनी होगी। आज मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सर्वर, नेटवर्क और अन्य डिजिटल माध्यमों में महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद होते हैं। इन साक्ष्यों की पहचान, संरक्षण, विश्लेषण और वैज्ञानिक जांच न्याय व्यवस्था तथा कानून-प्रवर्तन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।
हमें ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी, जहाँ साइबर अपराधी तकनीक की आड़ में छिप न सकें और डिजिटल साक्ष्य अपराध की सच्चाई सामने लाने तथा न्याय तक पहुँचने का मजबूत माध्यम बनें।
यहीं विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से हमें ऐसे समाधान विकसित करने होंगे, जो बदलते साइबर खतरों से एक कदम आगे हों।
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।” अर्थात् केवल इच्छा से नहीं, निरंतर प्रयास से कार्य सिद्ध होते हैं।
मुझे विश्वास है कि इस सम्मेलन में होने वाला ज्ञान-विमर्श, शोध और अनुभवों का आदान-प्रदान भारत को साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में और अधिक सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
साथियों,
उत्तराखण्ड की अपनी विशिष्ट परिस्थितियाँ हैं। यह देवभूमि है, वीरभूमि है और एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती पर्वतीय राज्य भी है। हमारी भौगोलिक परिस्थितियाँ, सीमावर्ती क्षेत्र, प्राकृतिक आपदाएँ, पर्यटन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा हमारे लिए विशेष महत्व रखते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में आधुनिक तकनीक हमारे लिए बड़ी शक्ति बन सकती है। ड्रोन, सेंसर आधारित प्रणालियाँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सुरक्षित डिजिटल नेटवर्क आपदा प्रबंधन, सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी, स्वास्थ्य सेवाओं और दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों तक सुविधाएँ पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन हमें हमेशा यह ध्यान रखना होगा कि जिस तकनीक से हम अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं, वही तकनीक हमारी कमजोरी न बन जाए। इसलिए तकनीक के विकास के साथ सुरक्षा, विश्वसनीयता और जिम्मेदारी को शुरुआत से ही उसका अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।
मेरे प्रिय युवा साथियों,
आप भारत के डिजिटल भविष्य के निर्माता हैं। आज आपके सामने केवल नौकरी पाने का नहीं, बल्कि नई संभावनाएँ बनाने का अवसर है। साइबर सुरक्षा, डिजिटल फॉरेंसिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीक के क्षेत्र में भारत को विश्व का नेतृत्व करने वाले युवाओं की आवश्यकता है।
अपने आप से एक प्रश्न पूछिए- “मैं देश के लिए क्या बना सकता हूँ?”
क्या आप ऐसी तकनीक बना सकते हैं, जो किसी नागरिक को साइबर अपराध से बचा सके? क्या आप ऐसा समाधान विकसित कर सकते हैं, जो धोखाधड़ी को होने से पहले पहचान सके? क्या आप ऐसी सुरक्षा प्रणाली बना सकते हैं, जो हमारे अस्पतालों, विद्युत व्यवस्था, परिवहन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को साइबर हमलों से सुरक्षित रख सके?
यही आपके ज्ञान की वास्तविक शक्ति है। यही आपकी प्रतिभा की राष्ट्रसेवा है।
आज भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। साइबर सुरक्षा में आत्मनिर्भरता का अर्थ है-अपनी तकनीक, अपने विशेषज्ञ, अपने समाधान और अपनी सुरक्षा क्षमता विकसित करना।
इसके लिए सरकार, विश्वविद्यालय, उद्योग, सुरक्षा एजेंसियाँ और समाज-सभी को मिलकर काम करना होगा। विश्वविद्यालय शोध और नवाचार के केंद्र बनें। उद्योग सुरक्षित और विश्वसनीय तकनीक विकसित करे।
कानून-प्रवर्तन एजेंसियाँ आधुनिक कौशल से सशक्त हों और प्रत्येक नागरिक जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार अपनाए। साइबर सुरक्षा सरकार की अकेली जिम्मेदारी नहीं है। यह पूरे समाज का साझा संकल्प है।
प्रिय विद्यार्थियों,
नई तकनीक सीखिए, लेकिन उसके पीछे छिपे जोखिमों को भी समझिए। अपने परिवार और मित्रों को साइबर ठगी के प्रति जागरूक कीजिए। सुरक्षित डिजिटल व्यवहार को अपने जीवन का हिस्सा बनाइए।
डिजिटल दुनिया में एक छोटी-सी लापरवाही बड़ा नुकसान कर सकती है, लेकिन एक छोटी-सी जागरूकता किसी व्यक्ति की जीवनभर की बचत बचा सकती है।
मेरे युवा साथियों,
आपकी प्रतिभा भारत की शक्ति है। आपका ज्ञान भारत की संपत्ति है। आपका चरित्र भारत का विश्वास है। और आपका संकल्प भारत के भविष्य की दिशा तय करेगा।
मुझे विश्वास है कि प्ब्।ब्ैक्थ्-2026 केवल एक सम्मेलन बनकर नहीं रहेगा। यह नए विचारों, शोध, सहयोग और नवाचार का ऐसा मंच बनेगा, जो भारत की डिजिटल सुरक्षा को नई दिशा देगा।
हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए-
सुरक्षित डिजिटल भारत। विश्वसनीय डिजिटल भारत। आत्मनिर्भर डिजिटल भारत।
आइए! हम संकल्प लें- तकनीक को राष्ट्रशक्ति बनाएँगे। ज्ञान को नवाचार में बदलेंगे। नवाचार को राष्ट्रसेवा से जोड़ेंगे। और डिजिटल भारत को सुरक्षित भारत बनाएँगे।
आइए! हम मिलकर ऐसा भारत बनाएँ, जो तकनीकी रूप से सक्षम, आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से जागरूक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करने वाला राष्ट्र हो।
वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!