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    09-10-2026:टीबी पर राष्ट्रीय सम्मेलन एवं नीति संवाद में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अक्टूबर 9, 2026

    जय हिन्द!

    आज देवभूमि उत्तराखण्ड की पावन धरती और माँ गंगा के निर्मल तट पर बसे ऋषिकेश में, देशभर से आए चिकित्सा, विज्ञान और स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ मानव जीवन और समाज के स्वस्थ भविष्य से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर संवाद का अवसर मिलना मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता का विषय है।

    सर्वप्रथम, आप सभी का सप्रेम अभिवादन और देवभूमि उत्तराखण्ड में हार्दिक स्वागत करता हूँ।

    ऋषिकेश केवल योग और अध्यात्म की वैश्विक भूमि ही नहीं, बल्कि आरोग्य, आत्मचिंतन और मानव कल्याण की हमारी सनातन परंपरा का भी जीवंत केंद्र है। हमारी भारतीय जीवन-दृष्टि में स्वास्थ्य को केवल रोग की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के संतुलन के रूप में देखा गया है।

    हमारी प्रार्थना में भी समूची मानवता के निरोग और सुखी रहने की कामना की गई है-

    “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”

    अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोग हों और कोई भी दुःख का भागी न बने।

    मेरा विश्वास है कि आज के इस राष्ट्रीय संवाद की मूल भावना भी यही है- विज्ञान की शक्ति, तकनीक की क्षमता और समाज की संवेदना को साथ लेकर ऐसा भारत बनाना, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ जीवन का अधिकार और अवसर मिले।

    साथियों,

    टीबी अर्थात् क्षय रोग केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं है। यह एक मानवीय, सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी है। इसका प्रभाव केवल रोगी के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार, उसकी आजीविका, उसके आत्मविश्वास और उसके सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है।

    इसीलिए टीबी के विरुद्ध हमारी लड़ाई केवल दवाइयों और जाँच तक सीमित नहीं हो सकती। यह लड़ाई जागरूकता, समय पर पहचान, सही उपचार, पोषण, निरंतर निगरानी और समाज के सहयोग से ही निर्णायक रूप से जीती जा सकती है।

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने टीबी उन्मूलन के लिए जनभागीदारी की भावना को रेखांकित करते हुए कहा है- “टीबी के खिलाफ हमारा अभियान, सबके प्रयास से ही सफल होगा।” यही भावना टीबी-मुक्त भारत के संकल्प की सबसे बड़ी शक्ति है।

    प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान, निक्षय पोषण योजना, निक्षय मित्र पहल और टीबी मुक्त पंचायत जैसे प्रयासों ने इस अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उत्तराखण्ड में भी निक्षय मित्रों की सक्रिय भागीदारी और जन-जागरूकता के प्रयास इस दिशा में सकारात्मक संदेश देते हैं।

    लेकिन आज का यह सम्मेलन हमें एक और महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करता है- क्या हम टीबी की पहचान को और अधिक तेज, सटीक और प्रभावी बना सकते हैं? मेरा स्पष्ट उत्तर है-हाँ। और यहीं से फीनोटाइपिक जाँच से जीनोमिक जाँच की ओर बढ़ने का महत्व सामने आता है।

    फीनोटाइपिक जाँच से दवाओं के प्रति रोगाणु की संवेदनशीलता का आकलन करने में सहायता मिलती है। वहीं, जीनोमिक जाँच दवा-प्रतिरोध से जुड़े आनुवंशिक संकेतों की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेष रूप से दवा-प्रतिरोधी टीबी की पहचान में ऐसी तकनीक उपचार की दिशा तय करने में अत्यंत उपयोगी हो सकती है।

    मेरे लिए इसका महत्व केवल विज्ञान की दृष्टि से नहीं, बल्कि निर्णय की दृष्टि से भी है। मैं अपने सैन्य जीवन के अनुभव से एक बात अवश्य कहना चाहूँगा- सही समय पर सही सूचना, सही निर्णय की आधारशिला होती है। सीमाओं पर किसी चुनौती का सामना करते समय यदि सूचना देर से मिले, तो उसका मूल्य कम हो जाता है।

    स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यही सिद्धांत लागू होता है। रोग की पहचान जितनी जल्दी और सटीक होगी, उपचार का निर्णय उतनी ही शीघ्रता और प्रभावशीलता से लिया जा सकेगा। इसलिए जीनोमिक जाँच को केवल एक नई तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि समय पर सही उपचार तक पहुँचने के माध्यम के रूप में देखना चाहिए।

    और यहाँ मैं एक बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा- तकनीक की वास्तविक सफलता उसकी जटिलता में नहीं, बल्कि उसके द्वारा बचाए गए जीवन में होती है।

    हमारे सामने हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड की अपनी विशिष्ट भौगोलिक चुनौतियाँ हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में दूरी, दुर्गम मार्ग, मौसम और परिवहन की कठिनाइयाँ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन मैं मानता हूँ- जहाँ भूगोल बाधा बने, वहाँ तकनीक से रास्ता बनाया जाए।

    एम्स ऋषिकेश द्वारा दूरस्थ क्षेत्रों में टीबी की दवाएँ पहुँचाने के लिए ड्रोन तकनीक का प्रयोग इसी सोच का एक प्रेरक उदाहरण है। यह हमें बताता है कि यदि चिकित्सा विज्ञान, तकनीक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति एक साथ आएँ, तो कठिन भूगोल भी समाधान के रास्ते में स्थायी बाधा नहीं बन सकता।

    आज के इस संवाद से मेरी कुछ स्पष्ट अपेक्षाएँ हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि एम्स ऋषिकेश जैसे संस्थान में जीनोमिक जाँच की क्षमता को और सुदृढ़ किया जाए, ताकि यह हिमालयी क्षेत्र में स्वास्थ्य नवाचार के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य कर सके। इसके साथ ही, दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों से नमूने शीघ्रता से परीक्षण केंद्रों तक पहुँचाने के लिए ड्रोन तथा अन्य आधुनिक साधनों की संभावनाओं पर गंभीरता से कार्य किया जाए।

    इसी क्रम में, हमें उन समुदायों और समूहों पर विशेष ध्यान देना होगा, जहाँ टीबी की पहचान में देरी होने की संभावना अधिक रहती है। जाँच की प्रक्रिया को निक्षय और अन्य डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों से बेहतर ढंग से जोड़कर जाँच से लेकर उपचार और उसकी निगरानी तक की पूरी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके लिए चिकित्सकों, प्रयोगशाला विशेषज्ञों, तकनीकी कर्मियों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की क्षमता को भी निरंतर सुदृढ़ करना आवश्यक है।

    लेकिन इन सभी प्रयासों की सफलता का वास्तविक पैमाना मशीनों की संख्या या किए गए परीक्षणों की संख्या नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह होना चाहिए कि रोगी का सही निदान कितनी जल्दी हो सका, सही उपचार कितनी जल्दी शुरू हुआ और उससे कितने जीवन बेहतर हुए।

    यही वह दृष्टि है, जो तकनीक को व्यवस्था से और व्यवस्था को मानवीय परिणामों से जोड़ती है।

    साथियों,

    मैं विशेष रूप से हमारे स्वास्थ्य कर्मियों का उल्लेख करना चाहता हूँ। टीबी के विरुद्ध इस अभियान में डॉक्टर और विशेषज्ञ जितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका उन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भी है, जो गाँव-गाँव, घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करते हैं, जाँच के लिए प्रेरित करते हैं और उपचार की निरंतरता बनाए रखने में सहायता करते हैं। ये हमारे स्वास्थ्य तंत्र के अग्रिम मोर्चे के योद्धा हैं।

    इसी प्रकार निक्षय मित्र और टीबी चैंपियन इस अभियान को मानवीय संवेदना प्रदान करते हैं। समाज को यह समझना होगा कि टीबी से पीड़ित व्यक्ति से दूरी बनाना समाधान नहीं है।

    टीबी का रोगी दया का नहीं, सम्मान का अधिकारी है। उसे दूरी नहीं, सहयोग चाहिए। उसे भय नहीं, विश्वास चाहिए।

    हमें टीबी से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों और कलंक को भी समाप्त करना होगा। रोग से लड़ने के साथ-साथ हमें उस मानसिकता से भी लड़ना होगा, जो रोगी को समाज से अलग करती है।

    आज आवश्यकता है कि सरकार से लेकर चिकित्सा संस्थानों तक, वैज्ञानिक समुदाय से लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं तक और पंचायतों से लेकर सामान्य नागरिकों तक-सभी एक साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ें।

    मैं इस राष्ट्रीय संवाद को केवल विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि नीति और परिणाम के बीच सेतु के रूप में देखता हूँ। हमारी दिशा स्पष्ट होनी चाहिए-

    चर्चा से निर्णय निकले। निर्णय से कार्ययोजना बने। कार्ययोजना से पायलट परियोजना बने। पायलट से प्रमाण मिले। और प्रमाण के आधार पर ऐसी नीति बने, जो देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

    यदि हम ऐसा कर सकें, तो आज का यह सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम नहीं रहेगा, बल्कि स्वास्थ्य नीति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में याद किया जाएगा।

    मेरा विश्वास है कि एम्स ऋषिकेश इस दिशा में नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। ऋषिकेश से निकला कोई प्रभावी स्वास्थ्य मॉडल केवल उत्तराखण्ड के लिए नहीं, बल्कि देश के अन्य पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

    हमें यह भी याद रखना होगा कि विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव स्वस्थ भारत है। और स्वस्थ भारत का सपना तभी पूरा होगा, जब देश के प्रत्येक नागरिक तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा, समय पर जाँच और सही उपचार की पहुँच सुनिश्चित होगी।

    आइए, हम केवल टीबी के विरुद्ध संकल्प न लें, बल्कि एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्माण का संकल्प लें, जिसमें विज्ञान हो, संवेदना हो, तकनीक हो और सबसे बढ़कर-हर जीवन के प्रति सम्मान हो।

    हम मिलकर ऐसा उत्तराखण्ड बनाएँ, जहाँ पर्वतों की ऊँचाई स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच की सीमा न बने। ऐसा भारत बनाएँ, जहाँ तकनीक का अंतिम उद्देश्य मशीनों की क्षमता नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा हो।

    हम सामूहिक प्रयासों से उत्तराखण्ड को टीबी-मुक्त बनाते हुए ‘स्वस्थ उत्तराखण्ड-समृद्ध उत्तराखण्ड’ की दिशा में आगे बढ़ें और टीबी-मुक्त भारत का संकल्प साकार करते हुए ‘स्वस्थ भारत-सशक्त भारत’ के लक्ष्य की प्राप्ति करें। इस आह्वान और संकल्प के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वन्दे मातरम्!
    जय हिन्द!