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    08-10-2026:वन्यजीव सप्ताह 2026 के समापन समारोह में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अक्टूबर 8, 2026

    जय हिन्द!

    मंचासीन सम्मानित अतिथिगण, वन्यजीव विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारीगण, हमारे वन प्रहरी, वनकर्मी, प्रकृति प्रेमी नागरिक, स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधिगण, मेरे प्यारे बच्चों और युवा साथियों!

    भारत की धरती पर प्रकृति केवल हमारे जीवन का आधार नहीं रही, बल्कि हमारी चेतना और हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है। हमारे ऋषियों ने आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी में उसी विराट चेतना का अनुभव किया, जिसका अनुभव हम अपने भीतर करते हैं। यही कारण है कि भारत में नदी माँ बनी, पर्वत देवभूमि बने, वृक्ष पूजनीय हुए और पशु-पक्षियों के प्रति करुणा हमारी जीवन-परंपरा का हिस्सा बनी।

    हमारी प्रार्थना रही है-

    “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”

    यह भावना केवल मनुष्य के कल्याण तक सीमित नहीं है। भारतीय दर्शन में ‘सर्वे’ का भाव व्यापक है- समस्त जीव-जगत के कल्याण का भाव। यही व्यापक कल्याण की भावना हमारी जीवन-दृष्टि में अहिंसा, करुणा और सह-अस्तित्व का आधार बनी।

    इसीलिए हमारे ऋषियों ने कहा- “अहिंसा परमो धर्मः।”

    आज वन्यजीव सप्ताह 2026 के समापन अवसर पर हम इसी सनातन विचार को आधुनिक विज्ञान और विकास की नई दृष्टि से जोड़ने का संकल्प लेने के लिए एकत्र हुए हैं।

    मुझे प्रसन्नता है कि इस वर्ष की थीम है- “कनेक्टिंग हैबिटैट्स, थ्राइविंग वाइल्डलाइफ” अर्थात “जुड़े हुए आवास, समृद्ध वन्यजीवन।” यह केवल एक विषय नहीं, बल्कि संरक्षण की पूरी सोच को दिशा देने वाला संदेश है।

    वन्यजीवों को केवल संरक्षित क्षेत्र की सीमा के भीतर सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है। बाघ को स्वस्थ जंगल चाहिए, हाथी को अपने पारंपरिक मार्ग चाहिए, पक्षियों को सुरक्षित आकाश चाहिए, वन्यजीवों को स्वच्छ जल चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, उन्हें अपने प्राकृतिक आवागमन के लिए जुड़े हुए आवास और सुरक्षित गलियारे चाहिए।

    यदि आवास टूटेंगे, तो गलियारे टूटेंगे। यदि गलियारे टूटेंगे, तो वन्यजीवों का प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित होगा। और जब प्राकृतिक संतुलन टूटेगा, तो उसका प्रभाव अंततः मनुष्य पर भी पड़ेगा। इसलिए वन्यजीव संरक्षण केवल वन्यजीवों का संरक्षण नहीं है; यह मनुष्य के भविष्य का संरक्षण भी है।

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर निरंतर बल दिया है। उनका स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है कि इकोनॉमी और इकोलॉजी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथ-साथ आगे बढ़ने वाले विषय हैं। आज उत्तराखण्ड इस संतुलन की एक जीवंत प्रयोगशाला बन सकता है।

    हमारे सामने दिल्ली-देहरादून ग्रीन एक्सप्रेसवे का उदाहरण है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अध्ययन के अनुसार राजाजी टाइगर रिजर्व और शिवालिक वन प्रभाग के निकट एलिवेटेड ग्रीन कॉरिडोर में अनेक प्रकार के वन्यजीवों का आवागमन बिना बाधा जारी रहा। यह उदाहरण बताता है कि यदि विकास की परियोजनाएँ प्रकृति को समझकर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ बनाई जाएँ, तो विकास और वन्यजीव संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।

    इसी प्रकार मोतीचूर, तीनपानी और लालतप्पड़ जैसे हाथी गलियारे केवल नक्शे पर बनी रेखाएँ नहीं हैं। ये हाथियों की पीढ़ियों से चली आ रही प्राकृतिक यात्राओं के मार्ग हैं। इन्हें सुरक्षित और सुदृढ़ बनाना हमारी महत्वपूर्ण प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील विषय है- मानव-वन्यजीव संघर्ष।

    उत्तराखण्ड सरकार द्वारा मानव-वन्यजीव संघर्ष को आपदा के रूप में स्वीकार करना और 25 सितम्बर को जिला स्तर पर मानव-वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण एवं प्रबंधन समितियों का गठन करना महत्वपूर्ण कदम है। विभिन्न विभागों के समन्वय से संकट की स्थिति में त्वरित सहायता, प्रभावित परिवारों को समय पर राहत और मुआवजा तथा भविष्य में संघर्ष की रोकथाम को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

    हमारा उद्देश्य न तो वन्यजीवों के प्रति नकारात्मक दृष्टि बनाना है और न उस ग्रामीण परिवार की पीड़ा को अनदेखा करना है, जिसने संघर्ष की कीमत चुकाई है। हमारा लक्ष्य ऐसा संतुलन बनाना है, जिसमें मनुष्य भी सुरक्षित रहे और वन्यजीव भी।

    मुझे प्रसन्नता है कि वन्यजीव संघर्ष के दौरान साहस और संवेदनशीलता का परिचय देने वाले 18 नागरिकों और बच्चों को सम्मानित किया गया है। मुख्यमंत्री जी द्वारा इन साहसी नागरिकों को सम्मानित करना पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। यह हमें याद दिलाता है कि वन्यजीव संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    आज विज्ञान भी हमारी इस यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नंदा देवी क्षेत्र के चौथे दशकवार जैव विविधता सर्वेक्षण में लगभग 4,200 मीटर की ऊँचाई पर दुर्लभ जीव-जंतुओं की उपस्थिति के प्रमाण और दुर्लभ लाइकेन प्रजातियों की समृद्ध विविधता सामने आना हमारे हिमालय की अद्भुत जैव संपदा का प्रमाण है।

    कैमरा ट्रैप, रिमोट सेंसिंग, जियोस्पेशियल मैपिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकें वन्यजीवों के व्यवहार, आवागमन और आवास को समझने में हमारी सहायता कर सकती हैं।

    लेकिन यहाँ एक बात विशेष रूप से कहना चाहता हूँ- टेक्नोलॉजी हमें प्रकृति को समझने में सहायता कर सकती है, लेकिन प्रकृति के प्रति संवेदना हमें अपने संस्कारों से प्राप्त होती है। संरक्षण की सबसे बड़ी शक्ति मशीन नहीं, मानवीय संवेदना है।

    इस अवसर पर रेलवे के उन लोको पायलटों का सम्मान किया गया है, जिन्होंने अपनी सतर्कता से वन्यजीवों का जीवन बचाया। विद्युत विभाग द्वारा वन क्षेत्रों में इंसुलेटेड कवर कंडक्टर का उपयोग पक्षियों और वन्यजीवों को विद्युत दुर्घटनाओं से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

    जब प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और समाज एक साथ आते हैं, तभी संरक्षण जन-आंदोलन बनता है। वन्यजीव सप्ताह के दौरान फोटो प्रदर्शनी, स्वच्छता अभियान, बाइक और साइकिल रैलियाँ तथा ई-प्लेज जैसी गतिविधियों ने इसी जनभागीदारी की भावना को मजबूत किया है। मैं चाहता हूँ कि यह भावना केवल वन्यजीव सप्ताह तक सीमित न रहे। वन्यजीव संरक्षण एक सप्ताह का अभियान नहीं, जीवन जीने की संस्कृति बने।

    मेरे युवा साथियों,

    आप केवल देश का भविष्य नहीं हैं, आप प्रकृति के वर्तमान प्रहरी भी हैं। अपने विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय से यह संकल्प लेकर निकलें कि जलस्रोतों को प्रदूषित नहीं करेंगे, जंगलों का सम्मान करेंगे, वन्यजीवों को परेशान नहीं करेंगे और अपने आसपास के लोगों को भी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाएँगे।

    प्रकृति के प्रहरी बनने के साथ मैं आपसे यह भी अपेक्षा करता हूँ कि आप नशे से दूर रहकर स्वस्थ और सकारात्मक जीवन का उदाहरण बनें तथा अपने साथियों को भी नशामुक्त जीवन के लिए प्रेरित करें। स्वस्थ युवा ही स्वस्थ समाज और स्वस्थ पर्यावरण का निर्माण कर सकता है।

    हमें यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन, वनाग्नि, बदलता मौसम, जलस्रोतों पर दबाव और अनियोजित मानवीय गतिविधियाँ केवल पर्यावरण की समस्याएँ नहीं हैं। ये हमारे अस्तित्व से जुड़ी चुनौतियाँ हैं।

    इसलिए हमारा लक्ष्य केवल बाघ बचाना नहीं होना चाहिए।

    हमें बाघ का जंगल बचाना है। हाथी का गलियारा बचाना है। पक्षियों का आकाश बचाना है। नदियों का प्रवाह बचाना है। हिमालय की जैव विविधता बचानी है। और अंततः हमें मनुष्य और प्रकृति के बीच वह विश्वास बचाना है, जो हमारी सभ्यता की पहचान रहा है।

    आज के इस अवसर पर प्रधानमंत्री जी द्वारा विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर साझा किया गया यह संस्कृत सुभाषित विशेष रूप से प्रासंगिक है-

    “निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्।
    तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥”

    अर्थात्, वन के बिना बाघ नष्ट होता है और बाघ के बिना वन नष्ट होने लगता है। इसलिए बाघ वन की रक्षा करता है और वन बाघ की रक्षा करता है। यह केवल बाघ और जंगल की कहानी नहीं है। यह पूरी पृथ्वी की कहानी है। प्रकृति हमें पालती है और हमें प्रकृति को पालना है।

    आज वन्यजीव सप्ताह के समापन पर हम संकल्प लें कि इस सप्ताह को कैलेंडर की एक तारीख बनाकर नहीं छोड़ेंगे, बल्कि इसे अपने जीवन की एक संस्कृति बनाएँगे।

    प्रकृति सुरक्षित होगी, तो वन्यजीव सुरक्षित होंगे।
    वन्यजीव सुरक्षित होंगे, तो हिमालय सुरक्षित होगा।
    हिमालय सुरक्षित होगा, तो हमारी नदियाँ सुरक्षित होंगी।
    और नदियाँ सुरक्षित होंगी, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा।

    उत्तराखण्ड को हमें ऐसा राज्य बनाना है जहाँ विकास की सड़कें आगे बढ़ें, लेकिन वन्यजीवों के रास्ते बंद न हों; जहाँ पर्यटन बढ़े, लेकिन प्रकृति पर अनावश्यक बोझ न बढ़े; जहाँ शहर विकसित हों, लेकिन जंगलों की साँस न रुके; और जहाँ मानव समृद्ध हो, लेकिन उसके साथ समस्त जीव-जगत भी फलता-फूलता रहे। यही हमारी भारतीय जीवन-दृष्टि है। यही “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना है। और यही देवभूमि उत्तराखण्ड का संकल्प होना चाहिए।

    मैं वन्यजीव सप्ताह 2026 के सफल आयोजन के लिए वन विभाग, सभी संबंधित विभागों, वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, वनकर्मियों, स्थानीय समुदायों, स्वयंसेवी संस्थाओं, बच्चों और युवाओं को हृदय से बधाई देता हूँ।

    आइए! हम ऐसा उत्तराखण्ड बनाएं, जहाँ विकास और प्रकृति एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयात्री हों। जंगल बचाएँ। जल बचाएँ। जैव विविधता बचाएँ। वन्यजीव बचाएँ। और प्रकृति के साथ अपना रिश्ता बचाएँ। इसी भावना के साथ आप सभी को वन्यजीव सप्ताह 2026 की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    जय हिन्द!
    जय उत्तराखण्ड!
    वन्दे मातरम्!