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    07-10-2026:आरटीआई अधिनियम की 21वीं वर्षगांठ एवं युवा संवाद कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अक्टूबर 7, 2026

    सूचना का अधिकार: जागरूक नागरिक से सशक्त लोकतंत्र तक

    आरटीआई अधिनियम की 21वीं वर्षगांठ एवं युवा संवाद कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    (तिथिः 07 अक्टूबर, 2026)

    जय हिन्द!

    मंचासीन आदरणीय अतिथिगण, उत्तराखण्ड सूचना आयोग के सम्मानित पदाधिकारीगण, शिक्षकगण, अभिभावकगण, प्रिय विद्यार्थियों और मेरे युवा साथियों!

    सर्वप्रथम आप सभी को सूचना का अधिकार अधिनियम की 21वीं वर्षगांठ पर हार्दिक शुभकामनाएँ।

    आज इस मंच पर मुझे केवल रंग और शब्द दिखाई नहीं दे रहे, बल्कि रंगों में सपने, शब्दों में संवेदनाएँ और सबसे बढ़कर, इन नन्हे मनों में भारत के उज्ज्वल भविष्य के विचार दिखाई दे रहे हैं।

    हमारे बच्चों ने रंगों के माध्यम से अपने मन की कल्पना और समाज की अपनी समझ को अभिव्यक्ति दी है। विद्यार्थियों ने अपने निबंधों में सूचना के अधिकार को नागरिक जीवन और लोकतंत्र से जोड़कर देखा है। हमारे युवा साथियों ने वाद-विवाद के माध्यम से अपने विचारों को तर्क के साथ सामने रखा है। इन सबमें मुझे भारत के लोकतंत्र का एक सुंदर और आशावान चेहरा दिखाई देता है।

    मैं चित्रकला, निबंध और वाद-विवाद में भाग लेने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को हृदय से बधाई देता हूँ। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल संस्थाओं में नहीं, जागरूक नागरिकों में होती है।

    हमारे उपनिषदों का अत्यंत सुंदर मंत्र है-

    “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” अर्थात् हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

    मेरा मानना है कि सूचना का अधिकार भी इसी प्रकाश की यात्रा है। जहाँ सही सूचना का अभाव होता है, वहाँ भ्रम और अविश्वास बढ़ता है; जहाँ विश्वसनीय सूचना उपलब्ध होती है, वहाँ जागरूकता, सहभागिता और विश्वास मजबूत होता है।

    इसीलिए सूचना का अधिकार केवल किसी कार्यालय से जानकारी प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। यह नागरिक को शासन को समझने, प्रश्न पूछने और व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने का अवसर देता है। यह पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सशक्तीकरण का महत्वपूर्ण आधार है।

    आज हम सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की 21 वर्षों की उस यात्रा का स्मरण कर रहे हैं, जिसने नागरिक और शासन के बीच संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही को नई दिशा दी है। इन वर्षों में सूचना के अधिकार ने नागरिक और शासन के बीच संवाद को नई दिशा दी है। यह यात्रा हमें बताती है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; लोकतंत्र निरंतर संवाद, प्रश्न, उत्तर और विश्वास से मजबूत होता है।

    मुझे प्रसन्नता है कि उत्तराखण्ड सूचना आयोग ने आरटीआई जागरूकता को केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाने का प्रयास किया है। आज की यह पहल इसी सोच का प्रमाण है।

    मैं अक्सर कहता हूँ कि विद्यालय केवल ज्ञान देने का स्थान नहीं है; विद्यालय नागरिक बनाने का स्थान भी है।

    जब एक बच्चा घर जाकर पूछता है कि हमारे गाँव में कौन-सा विकास कार्य हो रहा है? किसी सरकारी योजना का लाभ किसे मिल रहा है? हमारे क्षेत्र के लिए कौन-सी सुविधा स्वीकृत हुई है? उसके बारे में जानकारी कहाँ मिलेगी? तो वह केवल एक प्रश्न नहीं पूछ रहा होता। वह अपने परिवार में जागरूकता का बीज बो रहा होता है। यही बीज आगे चलकर समाज में नागरिक चेतना का वृक्ष बनता है।

    इस दृष्टि से बच्चों के माध्यम से आरटीआई की जानकारी घर और समाज तक पहुँचाने का यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    चित्रकला हमें बताती है कि विचारों की कोई एक भाषा नहीं होती। निबंध हमें सिखाता है कि विचारों को शब्द और तर्क कैसे दिया जाए। और वाद-विवाद हमें सिखाता है कि हम अपने विचार दृढ़ता से रखें, लेकिन दूसरे के विचार को सुनने और उसका सम्मान करने का लोकतांत्रिक संस्कार भी विकसित करें। यही लोकतंत्र है।

    लोकतंत्र का अर्थ केवल अपनी बात कहना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है- अपनी बात कहना, दूसरे की बात सुनना और असहमति के बीच भी संवाद बनाए रखना।

    आज के युवा के पास सूचना के साधन पहले से कहीं अधिक हैं। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने दुनिया को हमारी हथेली पर ला दिया है। लेकिन यहाँ हमें एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा- सूचना और ज्ञान एक नहीं हैं।

    हर सूचना सही हो, यह आवश्यक नहीं है। इसलिए जानकारी प्राप्त करना जितना महत्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसकी सत्यता की जाँच करना, उसके स्रोत को समझना और उसका जिम्मेदारी से उपयोग करना।

    आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में प्रवेश कर चुके हैं। चैटजीपीटी, जेमिनी, कोपायलट जैसे उपकरण हमें कुछ ही क्षणों में जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। लेकिन तकनीक हमें सूचना दे सकती है, सत्य को पहचानने का विवेक हमें स्वयं विकसित करना होगा।

    इसलिए मेरे युवा साथियों, डिजिटल युग में आपकी सबसे बड़ी शक्ति केवल तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि आपकी विवेकशीलता और सत्यापन की क्षमता होगी। स्रोत को देखिए, तथ्य को परखिए और फिर विश्वास कीजिए।

    इसी के साथ मैं अपने युवा साथियों से एक और महत्वपूर्ण आग्रह करना चाहता हूँ। नशे से स्वयं दूर रहें और अपने मित्रों को भी नशे से दूर रखने का प्रयास करें। अपनी ऊर्जा को नशे में नहीं, बल्कि शिक्षा, खेल, नवाचार, सेवा और राष्ट्र निर्माण में लगाएँ। माता-पिता, शिक्षक और समाज भी मिलकर ऐसा वातावरण बनाएँ, जहाँ हमारे युवा अपनी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ सकें।

    सूचना का अधिकार नागरिक के अधिकार के साथ-साथ शासन की जवाबदेही की भी कसौटी है। जितनी अधिक आवश्यक जानकारी सरकार और संस्थाएँ स्वेच्छा से और समय पर सार्वजनिक करेंगी, उतनी ही कम आवश्यकता नागरिकों को बार-बार सूचना माँगने की होगी।

    वास्तव में आरटीआई की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि नागरिक कितनी सूचनाएँ माँगते हैं; इसकी वास्तविक सफलता तब होगी, जब शासन आवश्यक सूचनाएँ स्वतः, सरल भाषा में और समय पर सार्वजनिक करे, ताकि नागरिक को सूचना प्राप्त करने के लिए बार-बार आवेदन करने की आवश्यकता ही न पड़े।

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी पारदर्शिता और जवाबदेही को सुशासन की महत्वपूर्ण आधारशिला बताते हुए नागरिकों की शासन में सक्रिय भागीदारी पर बल दिया है। आज सुशासन का अर्थ केवल योजनाएँ बनाना नहीं है, बल्कि नागरिकों को समय पर सही सूचना देना, उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना और शासन में विश्वास को निरंतर मजबूत करना भी है।

    टेक्नोलॉजी ने इस दिशा में नई संभावनाएँ खोली हैं। ऑनलाइन सेवाएँ और हाइब्रिड सुनवाई जैसी व्यवस्थाएँ नागरिकों के समय, श्रम और संसाधनों की बचत करती हैं। उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में इनका महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि दूरस्थ क्षेत्रों के नागरिकों के लिए प्रत्येक यात्रा समय और खर्च से जुड़ी होती है। सूचना आयोग द्वारा जनवरी 2024 से हाइब्रिड सुनवाई की व्यवस्था इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

    सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए नागरिक जागरूकता के साथ प्रशासनिक तंत्र की क्षमता बढ़ाना भी आवश्यक है। वर्ष 2025-26 में आयोग द्वारा 21 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर 897 अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया गया। यह प्रयास बताता है कि पारदर्शिता केवल कानून से नहीं, बल्कि कानून के प्रति संवेदनशील और सक्षम कार्यसंस्कृति से भी आती है।

    आज मैं पुरस्कार प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई देता हूँ। लेकिन जो विद्यार्थी आज पुरस्कार प्राप्त नहीं कर सके, उनसे भी मैं कहना चाहता हूँ- प्रतियोगिता का परिणाम आपकी प्रतिभा का अंतिम निर्णय नहीं है।

    आपने प्रतियोगिता में भाग लिया, सोचा, लिखा, चित्र बनाया, तर्क दिया और अपने विचार व्यक्त किए- यही आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। जीवन में सफलता केवल पुरस्कार पाने से नहीं मिलती; सफलता उस जिज्ञासा को जीवित रखने से मिलती है, जो हमें लगातार सीखने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

    हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत होगी, जब अधिकारों के साथ कर्तव्यों की समझ भी मजबूत होगी। जागरूक नागरिक वह है जो प्रश्न पूछता है, लेकिन तथ्यों को भी समझता है; अपने अधिकार जानता है, लेकिन अपनी जिम्मेदारियाँ भी निभाता है; सूचना प्राप्त करता है, लेकिन उसका उपयोग समाज और राष्ट्र के हित में करता है।

    आज की यह युवा संवाद यात्रा हमें एक स्पष्ट संदेश देती है- सूचना केवल जानने की शक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनने की शक्ति है।

    सूचना से जागरूकता, जागरूकता से सहभागिता, सहभागिता से जवाबदेही और जवाबदेही से सुशासन मजबूत होता है- यही सशक्त लोकतंत्र की आधारशिला है।

    आइए, आज हम संकल्प लें कि पारदर्शिता को शासन की संस्कृति, जवाबदेही को कार्यसंस्कृति और नागरिक सहभागिता को लोकतंत्र की शक्ति बनाएँगे। जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों की यही शक्ति आत्मनिर्भर भारत, समृद्ध भारत और विकसित भारत की मजबूत आधारशिला बनेगी।

    मुझे विश्वास है कि हमारे युवा केवल लोकतंत्र के दर्शक नहीं, बल्कि उसके जागरूक, जिम्मेदार और सक्रिय सहभागी बनेंगे। यही युवा शक्ति, यही नागरिक चेतना और यही लोकतांत्रिक संस्कार एक सशक्त उत्तराखण्ड और विकसित भारत के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

    जागरूक नागरिक ही सशक्त लोकतंत्र की पहचान है और सशक्त लोकतंत्र ही विकसित उत्तराखण्ड तथा विकसित भारत की सबसे मजबूत आधारशिला है।

    इसी विश्वास और संकल्प के साथ आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!