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    07-03-2026:“हिमालय की गूँजः संगीतमय बैंड सिम्फनी” कार्यक्रम के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन

    प्रकाशित तिथि : मार्च 7, 2026

    (तिथिः 07 मार्च, 2026)

    जय हिन्द!

    देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन, प्रेरणादायी और वीरता से ओतप्रोत धरती पर आयोजित “हिमालय की गूँजः संगीतमय बैंड सिम्फनी” कार्यक्रम में आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे आनंद और आत्मिक संतोष की अनुभूति हो रही है।

    आज हम सभी के लिए यह सौभाग्य का विषय है कि हमें तीन विशिष्ट सैन्य बैंडों की मनमोहक प्रस्तुतियों को सुनने और देखने का अवसर प्राप्त हुआ। यह केवल संगीत की प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा, अनुशासन, शौर्य और रेजिमेंटल विरासत का सजीव प्रतिबिंब थी। बिगुल की ऊर्जावान ध्वनि, पीतल के वाद्ययंत्रों की गूंज और ड्रम की लयबद्ध ताल मानो हमें यह स्मरण करा रही थी कि सैनिक का जीवन केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पित एक तपस्या है।

    संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सैनिकों के मनोबल और मानसिक शक्ति को भी सुदृढ़ करता है। देशभक्ति की धुनें सुनकर हर सैनिक के मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण और गर्व की भावना और अधिक प्रबल हो जाती है।

    सैन्य बैंड हमारी सेना की गौरवशाली रेजिमेंटल परंपरा का अभिन्न अंग हैं। युद्धभूमि से लेकर परेड मैदान तक, इनकी स्वर लहरियाँ सैनिकों के साहस और मनोबल को नई ऊर्जा प्रदान करती हैं। जब बैंड की ध्वनि के साथ सैनिक कदमताल करते हैं, तब वह दृश्य केवल एक औपचारिक परेड नहीं होता, वह राष्ट्र की एकता, शक्ति और अनुशासन का जीवंत प्रतीक बन जाता है।

    प्रिय साथियों,

    इस कार्यक्रम का शीर्षक “हिमालय की गूँज” अत्यंत सार्थक और प्रेरणादायी है। हिमालय केवल पर्वतों की श्रृंखला नहीं है, वह भारत की आत्मा का प्रतीक है। वह धैर्य, साहस, स्थिरता और अडिग संकल्प का जीवंत प्रतीक है।

    जिस प्रकार हिमालय अपनी अटल ऊँचाइयों के साथ भारत की रक्षा करता हुआ प्रतीत होता है, उसी प्रकार हमारे सैनिक भी राष्ट्र की सीमाओं के अडिग प्रहरी बनकर खड़े रहते हैं। और आज यहाँ गूंजती हुई यह बैंड सिम्फनी मानो उसी हिमालयी आत्मा की प्रतिध्वनि बनकर हम सबके हृदय में देशभक्ति की भावना को और प्रबल कर रही है।

    देवभूमि उत्तराखण्ड का भारतीय सेना के साथ एक अत्यंत गहरा और गौरवपूर्ण संबंध रहा है। यह भूमि केवल आध्यात्मिक चेतना की भूमि नहीं है, बल्कि यह वीरता और बलिदान की भूमि भी है। इसीलिए उत्तराखण्ड को “देवभूमि” के साथ-साथ “वीरभूमि” भी कहा जाता है।

    उत्तराखण्ड की वीर प्रसूता माताएँ अपने पुत्रों को बचपन से ही यह संस्कार देती हैं कि राष्ट्र सेवा सबसे बड़ा धर्म है और देश की रक्षा सर्वाेच्च कर्तव्य। उत्तराखण्ड के वीर सपूतों ने भारतीय सेना के इतिहास में असाधारण साहस और बलिदान की अनेक अमर गाथाएँ लिखी हैं।

    जब हम भारतीय सेना के शौर्य की चर्चा करते हैं, तो उसमें उत्तराखण्ड के हजारों वीर सैनिकों का योगदान गर्व के साथ स्मरण किया जाता है। यह हमारे लिए अत्यंत गर्व का विषय है कि इस छोटे से राज्य ने राष्ट्र की रक्षा के लिए अनगिनत वीर सपूतों को जन्म दिया है।

    साथियों,

    भारतीय सेना केवल शक्ति का प्रतीक नहीं है, वह अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रभक्ति की सर्वाेच्च परंपरा का प्रतीक है। भारतीय सैनिक हमें यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा कैसे बनाए रखी जाती है। सीमाओं पर तैनात हमारे जवान केवल भूभाग की रक्षा नहीं करते, वे भारत की अस्मिता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।

    आपदा के समय सैनिक केवल एक रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि मानवता के सच्चे सेवक के रूप में सामने आते हैं। उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य में हमने अनेक बार देखा है कि जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तब सेना के जवान अपनी जान की परवाह किए बिना राहत और बचाव कार्यों में जुट जाते हैं। सैनिक केवल सीमा के प्रहरी नहीं होते, वे मानवता के भी रक्षक होते हैं।

    प्रिय साथियों,

    आज भारत जिस आत्मविश्वास और सामथ्र्य के साथ विश्व मंच पर आगे बढ़ रहा है, उसमें हमारी सशस्त्र सेनाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले वर्षों में भारत ने रक्षा क्षेत्र में जो परिवर्तन और प्रगति देखी है, वह ऐतिहासिक है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का संकल्प केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता का ही नहीं, बल्कि सामरिक आत्मनिर्भरता का भी संकल्प है। आज भारत स्वदेशी रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

    आधुनिक तकनीक, अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों और रणनीतिक क्षमताओं के विकास के माध्यम से हमारी सेनाओं को और अधिक सशक्त बनाया जा रहा है। सीमाओं की सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने के लिए निरंतर आधुनिक उपकरणों और उन्नत तकनीकों को शामिल किया जा रहा है। इसके साथ ही हमारे सैनिकों के लिए बेहतर सुविधाएं, आधुनिक प्रशिक्षण और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जा रही है। इन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप आज भारतीय सेना पहले से कहीं अधिक मजबूत, सक्षम और आत्मविश्वासी बनी है।

    साथियों,

    संगीत में एक अद्भुत शक्ति होती है। संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, यह मन को प्रेरित करता है, आत्मा को स्पर्श करता है और सामूहिकता की भावना को प्रबल बनाता है। सैन्य बैंड का संगीत अनुशासन, समर्पण और सामंजस्य का प्रतीक होता है। जब सैनिक एक साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ते हैं और उनके साथ यह संगीत गूंजता है, तब वह दृश्य राष्ट्र की शक्ति और एकता का अद्भुत प्रतीक बन जाता है।

    आज का यह कार्यक्रम हमें यह भी स्मरण कराता है कि राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि केवल सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी नागरिकों की भी साझा जिम्मेदारी है। हमें अपने सैनिकों के त्याग और समर्पण से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में भी अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र प्रथम की भावना को अपनाना चाहिए, जो हमारे सैनिकों के जीवन का आधार है।

    जब हर नागरिक अपने कर्तव्य को ईमानदारी और निष्ठा के साथ निभाएगा, तब भारत को विकसित, शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता। अंत में, मैं भारतीय सशस्त्र सेनाओं के सभी वीर सैनिकों, अधिकारियों और उनके परिवारों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करता हूँ, उनका त्याग, उनका साहस और उनका समर्पण हमारे राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है।

    मैं इस प्रेरणादायी कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए सेना के सभी अधिकारियों, जवानों और आयोजकों को हार्दिक बधाई देता हूँ। आज यहाँ गूंजती हुई यह बैंड सिम्फनी हम सभी के हृदय में राष्ट्रभक्ति की भावना को और अधिक प्रबल करेगी।

    हमारे सैनिकों का साहस, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। अंत में, मैं कहना चाहूँगा- “जब सैनिक सीमा पर जागता है, तभी राष्ट्र निश्चिंत होकर सो पाता है, और जब राष्ट्र अपने सैनिकों के प्रति कृतज्ञ रहता है, तभी उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है।”

    आइए! हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम सदैव राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे, अपने सैनिकों के त्याग व समर्पण को सदैव स्मरण रखेंगे, और भारत को और अधिक शक्तिशाली, समृद्ध और गौरवशाली राष्ट्र बनाने में अपना योगदान देंगे।

    इसी आशा, विश्वास और आत्मिक भावना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदेमातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!