05-09-2026 : शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार समारोह 2025-26 के अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का संबोधन
जय हिन्द!
माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी, माननीय शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत जी, शिक्षा विभाग के अधिकारीगण, शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार से सम्मानित होने वाले शिक्षक साथी तथा उपस्थित सभी महानुभाव! आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आज इस पावन अवसर पर मैं देश के महान शिक्षाविद्, दार्शनिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ। उनका जीवन और उनका चिंतन हमें यह स्मरण कराता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विवेक, संस्कार और जीवन-मूल्यों का विकास करना है।
शिक्षक को हमारे समाज में केवल एक पेशे के रूप में नहीं, बल्कि पीढ़ियों को दिशा देने वाले और राष्ट्र के भविष्य को गढ़ने वाले मार्गदर्शक के रूप में सम्मान दिया गया है। वास्तव में, शिक्षक वह व्यक्तित्व है, जो ज्ञान के साथ संस्कार देता है, प्रतिभा को पहचानता है और विद्यार्थी को उसके जीवन की सही दिशा दिखाता है।
आज का यह अवसर इसलिए भी विशेष है कि हम उन शिक्षकों का सम्मान कर रहे हैं, जिन्होंने अपने ज्ञान, परिश्रम, नवाचार और समर्पण से शिक्षा को नई दिशा दी है। हजारों शिक्षकों के बीच यह सम्मान प्राप्त करना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। इस अवसर पर सम्मानित होने वाले सभी शिक्षक साथियों को मैं हृदय से बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ।
सम्मानित शिक्षक साथियों,
उत्तराखण्ड जैसे देवभूमि और वीरभूमि के इस पर्वतीय अंचल में आपकी भूमिका केवल एक शिक्षक की नहीं है, आप यहाँ ‘ऋषि’ की भूमिका में हैं! हमारी भौगोलिक परिस्थितियाँ कठिन हैं। कई जगह विद्यालय तक पहुँचना भी अपने आप में एक कड़ा इम्तिहान है। लेकिन विषम परिस्थितियों के बीच भी आपका समर्पण अटूट है। आपकी इसी निष्ठा से पहाड़ों के दूरस्थ गाँवों में शिक्षा का दीप जलता है, बच्चों की आँखों में सपने जगते हैं और शिक्षा उन घरों तक पहुँचती है, जहाँ इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
मैं लोक भवन के इस मंच से उत्तराखण्ड के उस अंतिम छोर पर बैठे शिक्षक के जज्बे को नमन करता हूँ, जो केवल ककहरा नहीं सिखा रहा, बल्कि पहाड़ों की ढलानों पर देश का भविष्य गढ़ रहा है। जब आप किसी पहाड़ी बच्चे का हाथ थामकर उसमें आगे बढ़ने का विश्वास जगाते हैं, तो वह विश्वास उसके आत्मविश्वास में बदलता है और उसके जीवन की दिशा बदल देता है।
याद रखिए! एक शिक्षक की असली सफलता इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसकी कक्षा के कितने बच्चों के सौ में से सौ अंक आए। उसकी सबसे बड़ी सफलता तो उस दिन होगी, जब पहाड़ की किसी सुदूर पगडंडी से निकलकर कोई साधारण-सा बच्चा देश की बागडोर संभाले और गर्व से कहे-
“आज मैं जहाँ भी हूँ, अपने उस गुरुजी की बदौलत हूँ, जिन्होंने मुझे पहली बार सपने देखना सिखाया था!”
यही शिक्षक का सबसे बड़ा योगदान है- बच्चे के भीतर छिपी संभावना को पहचानना, उसके मन में विश्वास जगाना और उसे आगे बढ़ने का साहस देना।
हिन्दी साहित्य के संवेदनशील कथाकार शैलेश मटियानी जी ने पहाड़ के इसी सामान्य जन के संघर्ष को अपनी लेखनी से पहचान दिलाई थी। उन्होंने पहाड़ के जीवन, संघर्ष और संवेदनाओं को साहित्य में सशक्त स्वर दिया। उनके नाम पर दिया जाने वाला यह पुरस्कार आपके इसी संघर्ष, संवेदनशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदारी का सार्वजनिक अभिनंदन है।
साथियों,
हम शिक्षा के एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सीखने की पूरी प्रक्रिया को नए अवसर दे रही हैं। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ज्ञान तक पहुँच को आसान और शिक्षा को अधिक प्रभावी बना सकती हैं। हमें इनका स्वागत करना चाहिए और इनका उपयोग शिक्षा की गुणवत्ता, पहुँच और सीखने के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए करना चाहिए। विशेष रूप से हमारे दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों के बच्चों के लिए यह तकनीक ज्ञान और अवसरों की नई दुनिया से जुड़ने का माध्यम बन सकती है।
लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल अधिक जानकारी उपलब्ध कराना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चे के भीतर सोचने, समझने, प्रश्न करने और सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है। विद्यार्थी की जिज्ञासा को पहचानना, उसकी कठिनाइयों को समझना, उसकी प्रतिभा को दिशा देना और उसके भीतर आगे बढ़ने का विश्वास जगाना- यही शिक्षा को मानवीय बनाता है।
इसलिए भविष्य की शिक्षा में हमें तकनीक की शक्ति और शिक्षक की संवेदना का ऐसा समन्वय करना होगा, जहाँ तकनीक सीखने के नए द्वार खोले और शिक्षक विद्यार्थी को उन द्वारों से आगे बढ़ने की सही दिशा दे। आने वाले समय में सीखने के तरीके बदलेंगे, नए साधन आएँगे, लेकिन बच्चे को समझने और प्रेरित करने वाला शिक्षक शिक्षा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बना रहेगा।
महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी इसका प्रेरक उदाहरण हैं। उनके शिक्षक शिवसुब्रमण्यम अय्यर ने उनके भीतर विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और कुछ नया करने का विश्वास जगाया। एक शिक्षक ने एक बालक की जिज्ञासा को पहचाना और उसे आगे बढ़ने का विश्वास दिया। वही बालक आगे चलकर भारत का महान वैज्ञानिक और राष्ट्रपति बना। इसलिए किसी शिक्षक को कभी यह नहीं भूलना चाहिए कि उसकी कक्षा में बैठा कोई बच्चा भी कल देश की पहचान बन सकता है।
विद्वान साथियों,
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा है कि “21वीं सदी का तीसरा दशक उत्तराखण्ड का दशक है।” यह केवल एक विश्वास नहीं, बल्कि हमारे लिए एक संकल्प है। और इस संकल्प की पहली नींव हमारे विद्यालयों और हमारी कक्षाओं में रखी जा रही है। आज कक्षा में बैठा एक छोटा-सा बालक ही कल देश की दिशा तय करने वाला वैज्ञानिक, सैनिक, चिकित्सक, शिक्षक, उद्यमी, प्रशासक या राष्ट्र-निर्माता बनेगा।
उसके मन में आज जो ज्ञान की ज्योति, संस्कारों की शक्ति और राष्ट्र के प्रति समर्पण जगाया जाएगा, वही आने वाले भारत की पहचान बनेगा। आपके द्वारा पढ़ाया गया एक पाठ शायद बच्चे को एक परीक्षा में सफलता दिलाए, लेकिन आपके द्वारा दिया गया एक संस्कार उसके पूरे जीवन को दिशा दे सकता है।
हमारे शिक्षकों का एक और महत्वपूर्ण दायित्व है- अपने बच्चों को आधुनिक ज्ञान के साथ अपनी जड़ों से जोड़ना। हमारी लोकभाषाएँ, लोकसंस्कृति, लोकज्ञान, पर्यावरण, परंपराएँ और हिमालयी जीवन-पद्धति हमारी अमूल्य विरासत हैं। आधुनिक शिक्षा और हमारी सांस्कृतिक चेतना का सुंदर समन्वय हमारे बच्चों को आत्मविश्वासी, संवेदनशील और संतुलित व्यक्तित्व प्रदान कर सकता है।
साथियों,
हमारा विद्यालय ऐसा स्थान बने, जहाँ बच्चा भय से नहीं, उत्साह से आए। जहाँ प्रश्न पूछना कमजोरी नहीं, सीखने की शुरुआत माना जाए। जहाँ हर बच्चे को आगे बढ़ने का समान अवसर मिले। और सबसे महत्वपूर्ण- हम अपने बच्चों को बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का साहस दें।
हमारे शास्त्रों की प्रार्थना है- “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” अर्थात्-हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
एक सच्चा शिक्षक इसी प्रार्थना को अपने कर्म से साकार करता है। वह अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है। वह निराश बच्चे में आशा जगाता है, कमजोर विद्यार्थी में आत्मविश्वास पैदा करता है और साधारण परिस्थितियों में छिपी असाधारण प्रतिभा को पहचानता है।
आज इस अवसर पर मैं उत्तराखण्ड के सभी शिक्षकों से एक ही आग्रह करना चाहता हूँ- अपने विद्यार्थियों को विषयों के साथ जीवन जीने की कला सिखाइए, ज्ञान के साथ संस्कार दीजिए, सफलता के साथ संवेदनशीलता का महत्व समझाइए और उनके भीतर “राष्ट्र सर्वाेपरि” का भाव जागृत कीजिए।
क्योंकि शिक्षक केवल एक विद्यार्थी का जीवन नहीं सँवारता, वह आने वाले राष्ट्र का चरित्र गढ़ता है।
आज सम्मानित होने वाले सभी शैलेश मटियानी राज्य शैक्षिक पुरस्कार विजेताओं के प्रति मैं पुनः सम्मान और शुभकामनाएँ व्यक्त करता हूँ। याद रखिए- यह पुरस्कार कोई मेडल या प्रमाण-पत्र मात्र नहीं है। यह उत्तराखण्ड की सवा करोड़ जनता की ओर से आपके प्रति आभार का एक छोटा-सा प्रतीक है।
आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि तो उस बच्चे की मुस्कान है, जिसे आपने अक्षरों की रोशनी दी। आपकी सच्ची सफलता वह विद्यार्थी है, जिसे आपने अपने ऊपर विश्वास करना सिखाया। यह पुरस्कार आपकी यात्रा का पड़ाव है, पूर्णविराम नहीं। इसकी असली चमक आपके विद्यार्थियों के उज्ज्वल जीवन में दिखाई देगी।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि उत्तराखण्ड के हमारे शिक्षक अपनी प्रतिभा, अनुभव और समर्पण से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक ले जाएंगे।
आइए! हम सब मिलकर एक ऐसा शैक्षिक वातावरण बनाएँ- जहाँ हर बच्चा बिना किसी डर के सीखे, प्रश्न पूछे, आगे बढ़े और अपने सपनों को साकार करने का साहस पाए। यही हमारे बच्चों के प्रति हमारी जिम्मेदारी होगी और यही विकसित उत्तराखण्ड से विकसित भारत की यात्रा में हमारा अमूल्य योगदान होगा।
इसी संकल्प के साथ आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ और सम्मानित सभी शिक्षक साथियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामना करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वंदे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!