05-03-2025 :उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा आयोजित साहित्य महोत्सव के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन
उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा आयोजित साहित्य महोत्सव के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन
(दिनांकः 04 मार्च, 2025)
जय हिन्द!
साहित्य के इस उत्सव में देश एवं प्रदेश के विद्वान साहित्यकारों, शिक्षाविदों, कवियों, लेखकों, शोधकर्ताओं और भाषा प्रेमियों के मध्य आकर मुझे अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। मेरा विश्वास है कि साहित्य महोत्सव का यह आयोजन राज्य की भाषाओं को जीवित रखने और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
आज का यह अवसर केवल एक साहित्यिक आयोजन का समापन नहीं है, बल्कि यह एक गहन विचार-यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा आयोजित यह वार्षिक साहित्य उत्सव हमारी भाषाई, सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपराओं को मजबूत बनाने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल है। इस समारोह में हुई चर्चाएं, प्रस्तुत किए गए विचार और सम्मानित किए गए साहित्यकार हमें यह याद दिलाते हैं कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि यह हमारी पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत दस्तावेज भी है।
प्रबुद्ध जनों,
हम सब जानते हैं कि भाषा अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। भाषा की सहायता से ही किसी समाज विशेष या देश के लोग अपने मन के भाव अथवा विचार एक-दूसरे से प्रकट करते हैं। हर व्यक्ति बचपन से ही अपनी मातृभाषा या देश की भाषा से तो परिचित होता है।
भाषा के महत्व को मनुष्य ने लाखों साल पहले पहचानकर उसका निरंतर विकास किया है। मनुष्य को सभ्य और पूर्ण बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है और सभी प्रकार की शिक्षा का माध्यम भाषा ही है। जीवन के सभी क्षेत्रों में किताबी शिक्षा हो या व्यावहारिक शिक्षा, यह भाषा के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।
भाषा के बिना लिखित साहित्य का अस्तित्व ही संभव नहीं है। वेद, पुराण, उपनिषद् से लेकर तुलसीदास आदि का साहित्य भाषा के कारण इतने सालों तक सुरक्षित रहकर आज तक भी हमें अध्ययन के लिए प्रेरित करता है। साहित्यकार ऐसी भाषा को आधार बनाते हैं, जो उनके पाठकों व श्रोताओं की संवेदनाओं के साथ एकाकार करने में समर्थ हों।
तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुं ओर। वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।
अर्थात मीठे वचन बोलने से चारों ओर खुशिया फैल जाती है। यह एक ऐसा अचूक मंत्र है जो सबको अपनी ओर सम्मोहित करता हैं।
गोस्वामी तुलसीदास की ये पंक्तियां भाषा के महत्व को समझाने के लिए काफी हैं। भाषा से ही संस्कार जुड़े होते हैं। वर्तमान पीढ़ी अपनी भाषा से दूर होने के साथ ही संस्कारों से भी दूरी बना रही है, जिससे पाश्चात्य संस्कृति का बोलबाला बढ़ रहा है, जो सभी के लिए चिंतन का विषय है।
हम जिस भाषा को महत्व देते हैं उसी भाषा की संस्कृति सीखते-समझते हैं। इसलिए हमें बच्चों को अपनी मातृ भाषा के महत्व को समझाना होगा। हमें अपनी परंपरा का वास्तविक चित्र उन्हें दिखाना होगा।
साहित्य ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों को ताकत दी। देश के कोने-कोने में अनेक लेखकों ने स्वतंत्रता एवं पुनर्जागरण के आदर्शों को अभिव्यक्ति दी। भारतीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता संग्राम के काल में लिखे गए उपन्यास, कहानियां, कविताएं और नाटक आज भी लोकप्रिय हैं और इनका हमारे मन पर गहरा प्रभाव है।
आज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे विश्व में, हमें विभिन्न संस्कृतियों और मान्यताओं के लोगों के बीच बेहतर समझ बनाने के प्रभावी तरीके खोजने होंगे। इस प्रयास में कहानीकारों और कवियों की केंद्रीय भूमिका है क्योंकि साहित्य में हमारे अनुभवों को जोड़ने और मतभेदों को दूर करने की अद्वितीय क्षमता है। हमें अपनी साझी नियति को उजागर करने और अपने वैश्विक समुदाय को मजबूत करने के लिए साहित्य की क्षमता का उपयोग करना चाहिए।
साथियों,
हम सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का उत्तराखण्ड के प्रति विशेष लगाव रहा है। उन्होंने राज्य स्थापना दिवस पर अपने संदेश में हम सभी उत्तराखण्ड वासियों को बोली-भाषा संरक्षण, के प्रति आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आपकी गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी सहित सभी बोलियां बेहद समृद्ध हैं, इनका संरक्षण बेहद जरूरी है।
हमारे प्रदेश में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाएं हमारी समृद्ध और विविधतापूर्ण संस्कृति की पहचान हैं। हमें इन भाषाओं के संरक्षण की दिशा में संकल्प के साथ काम करना होगा। इसलिए उत्तराखण्ड के लोग आने वाली पीढ़ियों को अपनी बोली भाषा जरूर सिखाएं, उत्तराखण्ड की पहचान के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य है।
उत्तराखण्ड केवल पर्वतों, नदियों और तीर्थ स्थलों की भूमि नहीं है, बल्कि यह साहित्य, संगीत, कला और लोक संस्कृति की भी धरती है। इस पवित्र भूमि ने अनेक महान साहित्यकारों को जन्म दिया है, जिनकी लेखनी से हिन्दी साहित्य और लोक भाषाएं समृद्ध हुई हैं।
हमें प्रसन्नता है कि प्रदेश सरकार और उत्तराखण्ड भाषा संस्थान इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध होकर कार्य कर रहे हैं। संस्थान द्वारा इन साहित्यिक विभूतियों की अप्रकाशित और दुर्लभ रचनाओं को संकलित करने की दिशा में कार्ययोजना तैयार की जा रही है। यह एक महत्वपूर्ण पहल है, जिससे हमारी युवा पीढ़ी अपने साहित्यिक पूर्वजों की विरासत से परिचित हो सकेगी।
उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय भाषाओं और साहित्य के संरक्षण के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए है। उत्तराखण्ड विभिन्न भाषाओं और बोलियों का संगम है। यहां कुमाऊँनी, गढ़वाली, जौनसारी, बुक्सा, थारू, वाल्टी, कौरवी जैसी कई बोलियां और भाषाएं बोली जाती है। इनमें से कुछ भाषाएं संकटग्रस्त हो चुकी हैं। भाषा संस्थान ने इन भाषाओं के संरक्षण और दस्तावेजीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम आने वाले दिनों में देखने को मिलेंगे।
उत्तराखण्ड की लोककथाओं, कहावतों, गाथागीतों और पहेलियों को संकलित और प्रकाशित करने का भाषा संस्थान का कार्य भी प्रशंसनीय है। यह केवल भाषाओं का संरक्षण नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने का प्रयास भी है।
राज्य की भाषाओं में किताबों का प्रकाशन और फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार के प्रयास सराहनीय हैं। राज्य सरकार नई फिल्म नीति भी लाई है, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं को प्रमुखता दी गई है।
साथियों,
एक समृद्ध समाज की पहचान उसकी साहित्यिक चेतना से होती है। सरकार ने भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। संस्थान की जरूरत के अनुसार पदों का सृजन करना भी एक सराहनीय पहल है। भाषा संस्थान द्वारा इस वर्ष 21 साहित्यकारों को उत्तराखण्ड साहित्य गौरव सम्मान प्रदान किया गया है। ये सभी हमारे साहित्यिक राजदूत हैं।
हमारी मातृ भाषाएं और हिंदी केवल संप्रेषण के साधन नहीं हैं, बल्कि ये विचार, भावनाओं और संस्कृति की संवाहक भी हैं। प्रदेश में युवा पीढ़ी को भाषा और साहित्य से जोड़ने के लिए बोर्ड टॉपर्स को हर साल सम्मानित किया जा रहा है। भाषाई प्रतियोगिताओं का आयोजन कर छात्रों को अपनी मातृभाषा और हिंदी के प्रति आकर्षित किया जा रहा है।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि उत्तराखण्ड में दो साहित्य ग्राम स्थापित किए जा रहे हैं। यह एक अनूठी पहल है, जो उत्तराखण्ड को साहित्यिक पर्यटन का एक प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। मेरा विश्वास है कि राज्य सरकार और भाषा संस्थान के तमाम सार्थक प्रयास राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में सफल होंगे।
संस्थान का समृद्ध पुस्तकालय शोधार्थियों और साहित्यकारों के लिए निःशुल्क उपलब्ध है। मैं सभी साहित्यकारों और शोधकर्ताओं से अनुरोध करता हूँ कि इस सुविधा का अधिकतम लाभ उठाएं। साथ ही, युवाओं में पढ़ने के प्रति रुचि जगाने का प्रयास करें।
मैं सभी साहित्यकारों, विद्वानों और भाषा प्रेमियों, से अनुरोध करता हूँ कि इस साहित्य उत्सव में हुई चर्चाएं और प्रस्तुत किए गए विचार केवल साहित्यिक विमर्श तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि हमें इन्हें सकारात्मक कार्यों में बदलना होगा। भाषाओं और साहित्य का संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं है, बल्कि यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
साथियों,
उत्तराखण्ड का रजत जयंती वर्ष शुरू हो चुका है, अब हमें उत्तराखण्ड के उज्ज्वल भविष्य के लिए अगले 25 वर्ष की यात्रा शुरू करनी है। यह सुखद संयोग है कि देश भी 25 वर्षों के लिए अमृत काल में है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हम सभी के सामूहिक प्रयासों से विकसित भारत के लिए विकसित उत्तराखण्ड के संकल्प को हम इसी कालखण्ड में पूरा होते देखेंगे।
हम सबको मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी मातृ भाषाएं जीवंत रहें। साहित्यिक धरोहरें अगली पीढ़ी तक पहुंचे। युवाओं को भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति प्रेरित किया जाए।
उत्तराखण्ड भाषा संस्थान को इस सफल आयोजन के लिए मैं हार्दिक बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि यह संस्थान भविष्य में भी इसी उत्साह के साथ कार्य करता रहेगा। आप सभी को यानि साहित्य सुधि समाज को हृदय से शुभकामनाएँ देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!