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    05-02-2026:उत्तरायणी महोत्सव के शुभारम्भ अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : फ़रवरी 6, 2026

    जय हिन्द!

    देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन धरा पर, जहाँ कण-कण में संस्कृति बसती है, जहाँ परम्परा जीवन का स्वाभाविक संस्कार है और जहाँ जन-जन के हृदय में राष्ट्रभाव सदा जाग्रत रहता है, ऐसी पुण्य भूमि पर सेवा संकल्प (धारिणी) फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस भव्य उत्तरायणी महोत्सव के शुभारम्भ अवसर पर, यहाँ उपस्थित समस्त जन समुदाय का मैं हृदय से अभिनन्दन और वंदन करता हूँ।

    आज यह मंच केवल एक उत्सव का साक्षी नहीं है, बल्कि यह उत्तराखण्ड की आत्मा के उद्घोष का मंच है। यहाँ लोकधारा बह रही है, परम्परा बोल रही है और संस्कृति अपने गौरव के साथ खड़ी है। ऐसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अवसर पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे विशेष गर्व और आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है।

    उत्तरायणी कोई साधारण पर्व नहीं है। यह सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव मात्र नहीं, बल्कि यह जीवन में प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जैसे सूर्य अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होता है, वैसे ही समाज भी निराशा से संकल्प की ओर, और जड़ता से प्रगति की ओर बढ़ता है।

    उत्तरायणी हमारी ऋतु चक्र आधारित जीवन-दृष्टि, वैज्ञानिक चेतना और प्रकृति के साथ सामंजस्य का सजीव उदाहरण है। यही कारण है कि यह लोकपर्व सदियों से उत्तराखण्ड के जनजीवन को जोड़ता आया है और आज भी हमारी सामूहिक चेतना को जाग्रत कर रहा है।

    साथियों,

    उत्तराखण्ड के कौथिक (मेले) परम्परा हमारे लोकजीवन की धड़कन है। कौथिक केवल मेले नहीं होते, बल्कि ये हमारी सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता और लोक स्मृति के जीवंत केंद्र होते हैं। पर्वतीय जीवन की कठिन परिस्थितियों के बीच, कौथिकों ने समाज को जोड़ने, भाईचारे को मजबूत करने और पीढ़ी-दर-पीढ़ी परम्पराओं को आगे बढ़ाने का कार्य किया है।

    कौथिकों में गूँजते लोकगीत, थिरकते लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा और हस्तशिल्प यह उद्घोष करते हैं कि उत्तराखण्ड की संस्कृति जीवित है, जाग्रत है और गौरव के साथ आगे बढ़ रही है। उत्तरायणी कौथिक इसी परम्परा की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले उत्तराखण्ड वासी आज भी अपनी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं, और उत्तरायणी जैसे पर्वांे के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़कर अपनी सांस्कृतिक एकता को मजबूत कर रहे हैं।

    मैं सेवा संकल्प (धारिणी) फाउंडेशन को इस प्रेरक पहल के लिए साधुवाद देता हूँ, जिसने लोकपर्व को केवल आयोजन नहीं, बल्कि लोक-चेतना का आंदोलन बनाया है। ऐसे प्रयास ही समाज को उसकी जड़ों से जोड़ते हैं और संस्कृति को भविष्य की ओर अग्रसर करते हैं।

    साथियों,

    उत्तराखण्ड केवल प्राकृतिक सौंदर्य की भूमि नहीं है, यह राष्ट्र प्रथम की भावना से अनुप्राणित भूमि है। यह वही धरती है, जहाँ से निकले अनगिनत वीर सपूतों ने देश की सीमाओं की रक्षा में अपना सर्वस्व न्योछावर किया। उत्तराखण्ड की संस्कृति में राष्ट्र सर्वाेपरि का भाव शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में दिखाई देता है। जब भी राष्ट्र ने पुकारा, देवभूमि के बेटे और बेटियाँ सबसे आगे खड़े मिले।

    आज जब अपना देश विकसित भारत 2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, इस ऐतिहासिक लक्ष्य की प्राप्ति में उत्तराखण्ड की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग, आयुष, शिक्षा, पर्यटन, जल-स्रोत संरक्षण, जैव विविधता, रक्षा सेवाएँ और मानव संसाधन, हर क्षेत्र में उत्तराखण्ड देश को दिशा देने की क्षमता रखता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि देवभूमि का प्रत्येक नागरिक यदि अपने कर्तव्य को राष्ट्र निर्माण से जोड़ ले, तो उत्तराखण्ड विकसित भारत की प्रेरक भूमि बन सकता है।

    साथियों,

    उत्तराखण्ड के लोगों की सबसे बड़ी पहचान उनकी ईमानदारी, सादगी और कर्मठता है। यहाँ का जनमानस कठिन परिस्थितियों में भी परिश्रम से कभी पीछे नहीं हटा। चाहे सैनिक सेवा हो, प्रशासन हो, शिक्षा हो या श्रम, उत्तराखण्ड के लोग जहाँ भी गए, उन्होंने अपने कार्य से विश्वास अर्जित किया। यही नैतिक शक्ति उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी पूँजी है।

    यह देवभूमि महान व्यक्तित्वों और वीर विभूतियों की जननी रही है। स्वामी रामतीर्थ और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे नायकों ने राष्ट्र और समाज को दिशा दी, तो तीलू रौतेली, गौरा देवी और बछेंद्री पाल ने नारी शक्ति, साहस और संकल्प की अमिट पहचान स्थापित की। राइफलमैन जसवंत सिंह रावत और जनरल बिपिन रावत जैसे सैन्य नायकों ने राष्ट्ररक्षा में देवभूमि की वीर परंपरा को गौरवान्वित किया। इन सभी का जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण और महान उद्देश्य साधारण व्यक्ति को भी इतिहास निर्माता बना देते हैं।

    साथियों,

    आज यहाँ पारंपरिक लोक परिधानों में उपस्थित माताएँ-बहनें और युवा साथी इस बात का प्रमाण हैं कि उत्तराखण्ड की आत्मा आज भी जीवंत है। हम चाहे देश-दुनिया के किसी भी कोने में रहें, हमारी बोली, हमारी संस्कृति और हमारे संस्कार हमारे साथ चलते है। यही हमारी पहचान है, यही हमारी शक्ति है।

    इस 4 दिवसीय महोत्सव में प्रस्तुत किए जाने वाले लोकगीत, लोकसंगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि इतिहास की जीवित कथाएँ हैं। झोड़ा, छपेली, चांचरी, पांडव नृत्य, जागर, छोलिया और देउड़ा- ये सभी हमारी वीरता, हमारी साधना और हमारे सामूहिक जीवन-मूल्यों की गाथाएँ हैं। इनमें हमारे पूर्वजों का संघर्ष भी है और उनका स्वाभिमान भी।

    यह उत्तरायणी महोत्सव हमारे हस्तशिल्प और कुटीर उद्योगों को भी नई पहचान देता है। यहाँ प्रदर्शित ऊनी वस्त्र, पारंपरिक आभूषण, लकड़ी और तांबे के बर्तन- ये केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि हमारे कारीगरों की साधना, श्रम और आत्म-सम्मान का प्रतीक हैं।

    यह महोत्सव माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को धरातल पर साकार करता है। जब लोक का सम्मान होता है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है। ऐसे आयोजन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी बल देते हैं और आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड की नींव को सुदृढ़ करते हैं।

    उत्तराखण्ड का पारंपरिक खान-पान भी हमारी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। मंडुए की रोटी, झंगोरे की खीर, भट्ट की चुड़कानी, गहत की दाल, आलू के गुटके, काफली, कंडाली (बिच्छू घास) का साग और भांग की चटनी- ये व्यंजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, संतुलन और आत्मनिर्भर जीवनशैली का दर्शन हैं।

    यह आयोजन हमारी युवा पीढ़ी के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है। आज का युवा तकनीक और आधुनिकता में आगे बढ़ रहा है, जो आज के दौर में आवश्यक भी है। किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहे। उत्तरायणी जैसे पर्व युवाओं को बताते हैं कि आधुनिकता और परम्परा साथ-साथ चल सकती हैं।

    मुझे यह जानकर विशेष प्रसन्नता होती है कि सेवा संकल्प (धारिणी) फाउंडेशन शिक्षा, स्वास्थ्य, नशा मुक्ति, बाल संरक्षण और रोजगार के क्षेत्र में भी निरंतर कार्य कर रही है। संस्कृति तब ही जीवित रहती है, जब वह सेवा, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ी हो।

    मेरे युवा साथियों,

    आप उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी शक्ति हैं। नशा और अन्य व्यसन इस शक्ति को कमजोर करते हैं। मैं आप सबसे आग्रह करता हूँ कि नशे से दूर रहें, खेल, शिक्षा, कौशल और सेवा को अपनाएँ। स्वस्थ युवा ही सशक्त उत्तराखण्ड और सशक्त भारत का निर्माण कर सकते हैं।

    उत्तराखण्ड की संस्कृति सादगी, परिश्रम, आत्मसम्मान और अतिथि देवो भवः की भावना पर आधारित है। हमारी पहचान हमारे लोक जीवन से है। आज वैश्वीकरण के इस दौर में, जब कई समाज अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, तब उत्तरायणी जैसे महोत्सव हमें सिखाते हैं कि समाज तभी मजबूत होता है, जब उसकी संस्कृति जीवित रहती है, और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढती है।

    आइए! इस उत्तरायणी महोत्सव के पावन अवसर पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें- कि राष्ट्र प्रथम हमारा जीवन-मंत्र होगा, ईमानदारी और परिश्रम हमारी पहचान बनेगी, भ्रष्टाचार और नशे को समाज में स्थान नहीं देंगे, और उत्तराखण्ड को भारत का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाने में अपना योगदान सुनिश्चित करेंगे।

    हम सब मिलकर यह भी संकल्प लें कि- हम अपनी भाषा नहीं भूलेंगे, हम अपनी परम्पराएँ नहीं छोड़ेंगे, और अपनी सांस्कृतिक धरोहर को पूरे गर्व के साथ आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँगे।

    अंत में, एक बार पुनः आप सभी को उत्तरायणी महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ। यह महोत्सव उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय गौरव को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करे, इसी मंगलकामना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    जय हिन्द!
    जय उत्तराखण्ड!