03-09-2026 : “इको-एआई फॉर अमृत काल-आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फॉर सस्टेनेबल हिमालयन फ्यूचर” विषय पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन
जय हिन्द!
सम्माननीय अतिथिगण, उत्तराखण्ड के समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतिगण एवं निदेशकगण, देश-प्रदेश के प्रख्यात वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं एवं विशेषज्ञों, वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर डॉ. तृप्ता ठाकुर जी एवं विश्वविद्यालय परिवार, भ्म्ैब्व् के संस्थापक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी जी, वैज्ञानिक एवं शोध संस्थानों के प्रतिनिधिगण, मेरे प्रिय विद्यार्थियों, युवा शोधार्थियों एवं नवोन्मेषकों तथा देवभूमि उत्तराखण्ड के सभी सम्मानित नागरिकों।
आज “इको-एआई फॉर अमृत काल-आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फॉर सस्टेनेबल हिमालयन फ्यूचर” जैसे दूरदर्शी और समयानुकूल विषय पर आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए मैं वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भ्म्ैब्व् और न्ब्व्ैज् को हार्दिक बधाई देता हूँ। यह सम्मेलन ।प् को हिमालय की पारिस्थितिकी, मानवीय आवश्यकताओं और सतत विकास के बीच एक प्रभावी सेतु के रूप में देखने की सार्थक पहल है।
साथियों,
हिमालय हमारे लिए केवल पर्वतों की श्रृंखला नहीं है। यह हमारी जीवनधारा, संस्कृति, आस्था और सभ्यता की आधारभूमि है। इसकी गोद से निकलने वाली नदियाँ करोड़ों लोगों को जीवन देती हैं। इसके वन जल-स्रोतों, जैव-विविधता और पर्वतीय समाज की आजीविका के आधार हैं।
महाकवि कालिदास ने हिमालय को देवस्वरूप पर्वतराज के रूप में कहा-
“अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।”
हजारों वर्ष पहले कही गई यह पंक्ति आज भी हिमालय की विराटता और गरिमा का बोध कराती है। लेकिन आज हमारे सामने प्रश्न है-हम हिमालय को कितना समझते हैं और उसके भविष्य की रक्षा के लिए कितने तैयार हैं?
आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी मानव जीवन को अभूतपूर्व गति से बदल रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण शक्ति है। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि एआई क्या कर सकती है? बड़ा प्रश्न यह है कि एआई हमारे समाज, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या कर सकती है?
उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है। भूस्खलन, अतिवृष्टि, अचानक आने वाली बाढ़, ग्लेशियर झीलों से जुड़े खतरे, जंगलों की आग, बदलती जलवायु और जल-स्रोतों पर बढ़ता दबाव हमारे सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं।
हाल ही में नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा ने भी हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता और आपदा-प्रबंधन की तैयारियों को और गंभीरता से समझने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
एआई हमें प्रतिक्रिया से पूर्व-तैयारी की ओर ले जा सकती है। उपग्रह चित्रों, वर्षा के आंकड़ों, भू-भाग, मिट्टी की नमी और पुराने आपदा रिकॉर्ड का विश्लेषण कर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है। सेंसर और समय पर प्राप्त आंकड़ों के माध्यम से चेतावनी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
आपदा को पूरी तरह रोकना हमेशा संभव नहीं होगा, लेकिन उससे होने वाली क्षति को कम करना अवश्य संभव है। कई बार कुछ घंटे पहले मिली सही चेतावनी किसी गाँव या क्षेत्र को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने में निर्णायक हो सकती है।
भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष क्षमता भी इस दिशा में महत्वपूर्ण आधार देती है। उपग्रहों से प्राप्त पृथ्वी संबंधी जानकारी का उपयोग कृषि, जल-संसाधन, वन, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन में किया जा रहा है। जब उपग्रह जानकारी, दूरस्थ संवेदन, जमीन पर लगे सेंसर और एआई एक साथ आते हैं, तो आंकड़े केवल सूचना नहीं रहते, वे सही समय पर सही निर्णय का आधार बन जाते हैं।
साथियों,
उत्तराखण्ड के लिए जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, हमारी पहचान और जिम्मेदारी भी है। हमारी ज्ञान-परंपरा ने प्रकृति को कभी केवल उपयोग की वस्तु नहीं माना। अथर्ववेद का संदेश है-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” अर्थात् पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।
आज विज्ञान और एआई इस संवेदना को नई क्षमता दे सकते हैं। ग्लेशियरों, नदियों और जल-स्रोतों में हो रहे परिवर्तनों की निगरानी, जल की गुणवत्ता का आकलन और भविष्य की जल-योजना को अधिक वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।
हमारे वन केवल कार्बन को रोकने वाले क्षेत्र नहीं हैं। वे जल-स्रोतों की रक्षा करते हैं, मिट्टी को बचाते हैं, जैव-विविधता को आश्रय देते हैं और पर्वतीय समाज के जीवन से जुड़े हैं। उपग्रह चित्रों, सेंसर और कैमरा ट्रैप के साथ एआई का उपयोग वन और वन्यजीवों की निगरानी को अधिक प्रभावी बना सकता है।
लेकिन यह बात स्पष्ट रहनी चाहिए-तकनीक जंगल का विकल्प नहीं है; तकनीक जंगल की रक्षा में हमारी सहयोगी है।
हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को अनुभव और परंपरा से समझा। आज मशीनें आंकड़ों के माध्यम से प्रकृति के बदलते स्वरूप को समझ रही हैं। हमारी वास्तविक सफलता तब होगी, जब स्थानीय ज्ञान, वैज्ञानिक शोध, सामुदायिक अनुभव और एआई एक साथ आएँगे।
कृषि में भी एआई नई संभावनाएँ खोल सकती है। स्थानीय मौसम, मिट्टी और फसल की स्थिति के आधार पर किसानों को समय पर वैज्ञानिक सलाह दी जा सकती है। पर तकनीक को किसान के ऊपर नहीं, किसान के साथ रखना होगा। पहाड़ के किसानों के पास पीढ़ियों से संचित स्थानीय ज्ञान हमारी अमूल्य संपदा है।
उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था और संस्कृति में पर्यटन एवं तीर्थाटन का विशेष स्थान है। चारधाम यात्रा और अन्य प्रमुख स्थलों पर बढ़ते यात्री दबाव के बीच विकास और हिमालय की वहन क्षमता में संतुलन आवश्यक है। एआई के माध्यम से यात्री संख्या, यातायात, मौसम और उपलब्ध सुविधाओं का विश्लेषण कर ऐसा पर्यटन विकसित किया जा सकता है, जो सुरक्षित हो, स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति दे और हिमालय की पारिस्थितिकी का सम्मान करे।
एक और महत्वपूर्ण विषय है-तकनीक की पहुँच को पहाड़ के अंतिम गाँव तक सुनिश्चित करना। दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल सुविधाओं की सीमाओं को देखते हुए एज एआई जैसी तकनीक उपयोगी हो सकती है, जिससे आवश्यक विश्लेषण स्थानीय स्तर पर भी संभव हो सके। डिजिटल परिवर्तन की वास्तविक सफलता तभी होगी, जब तकनीक पहाड़ के अंतिम गाँव तक पहुँचे और वहाँ के लोगों के जीवन को अधिक सरल, सुरक्षित और सक्षम बनाए।
साथियों,
इस पूरे प्रयास में विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखण्ड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सामने अवसर है कि वह हिमालयी तकनीक और नवाचार का एक सशक्त केंद्र बने। एआई, जल-सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, जलवायु विज्ञान, जैव-विविधता, अक्षय ऊर्जा और सतत आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में बहु-विषयक शोध को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
मेरी अपेक्षा है कि हमारी यात्रा-कक्षा से प्रयोगशाला, प्रयोगशाला से धरातल और शोध-पत्र से वास्तविक समाधान तक पहुँचे।
विश्वविद्यालय की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने विद्यार्थी स्नातक हुए। यह भी देखना होगा कि क्या किसी विद्यार्थी का शोध भूस्खलन का जोखिम समझने में मदद कर रहा है? क्या कोई परियोजना जल-स्रोत बचा रही है? क्या कोई नवाचार जंगल की आग की समय पर पहचान कर रहा है? क्या कोई स्टार्टअप पहाड़ में सम्मानजनक रोजगार पैदा कर रहा है?
मेरे युवा साथियों,
आपके सामने अवसर बहुत बड़ा है। एआई सीखिए, लेकिन जिम्मेदारी के साथ सीखिए। ऐसा शोध कीजिए जो किसी आपदा का जोखिम पहले पहचान सके। ऐसी तकनीक बनाइए जो जल बचा सके। ऐसा नवाचार कीजिए जो किसान और गाँव के काम आए।
अपने आप से पूछिए-क्या मेरा ज्ञान किसी का जीवन बेहतर बना रहा है? क्या मेरा शोध हिमालय को सुरक्षित बना रहा है? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि एआई कितनी बुद्धिमान हो सकती है; प्रश्न यह है कि हमारी बुद्धिमत्ता से समाज कितना बेहतर हो सकता है।
एआई की शक्ति के साथ उसकी मर्यादा और जिम्मेदारी को भी समझना होगा। मशीन हमें आंकड़े दे सकती है, लेकिन निर्णय में मानवीय संवेदना हमें ही रखनी होगी। तकनीक हमें गति दे सकती है, लेकिन दिशा हमें तय करनी होगी। उत्तरदायी एआई का अर्थ है-नवाचार के साथ नैतिकता, दक्षता के साथ जवाबदेही और बुद्धिमत्ता के साथ संवेदना।
हम विकसित भारत 2047 की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। विकसित भारत की यात्रा एक विकसित, सुरक्षित और टिकाऊ हिमालय की यात्रा के बिना पूरी नहीं हो सकती। उत्तराखण्ड दुनिया के सामने ऐसा मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, जहाँ प्रकृति, संस्कृति और प्रगति एक-दूसरे के पूरक बनें। हम हिमालय को समझें, विज्ञान को अपनाएँ, एआई का विवेकपूर्ण उपयोग करें और विकास को मानवता तथा पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी बनाएँ।
हिमालय हमें ऊँचाई देता है। नदियाँ हमें जीवन देती हैं। वन हमें श्वास देते हैं। पृथ्वी हमें आश्रय देती है। विज्ञान हमें समझने की शक्ति देता है। और एआई हमें नई संभावनाएँ देती है। अब हमारी जिम्मेदारी है कि इन शक्तियों को मानव कल्याण और हिमालय के संरक्षण के लिए एक साथ जोड़ें।
ऐसा भविष्य हो जहाँ एआई की गति और हिमालय का धैर्य साथ चलें, विज्ञान की शक्ति और प्रकृति की मर्यादा साथ रहें तथा विकास की आकांक्षा और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार सुरक्षित रहें। क्योंकि विकास की सच्ची कसौटी यही है कि वह वर्तमान को समृद्ध करे और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखे।
यही अमृत काल की पुकार है। यही हिमालय का संदेश है। और यही हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को केवल विकसित भारत नहीं, बल्कि सुरक्षित, समृद्ध और जीवंत हिमालय भी सौंपकर जाएँ।
जय हिन्द!