02-03-2025 : राष्ट्रीय संस्थागत नेतृत्व समागम 2025 के समापन समारोह में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
माननीय उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत जी, विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय सचिव प्रो. नरेन्द्र तनेजा जी, यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत जी, दून विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल जी, देश के प्रतिष्ठित शिक्षण, अनुसंधान एवं नियामक संस्थानों के गणमान्य प्रमुख, शिक्षकगण, मीडिया जगत के मित्रों, इस महत्वपूर्ण आयोजन की समर्पित टीम, प्रिय छात्र-छात्राओं एवं उपस्थित देवियों और सज्जनों।
राष्ट्रीय संस्थागत नेतृत्व समागम 2025 के इस ऐतिहासिक अवसर पर आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ। यह समागम केवल एक विचार मंच नहीं, बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के भविष्य को दिशा देने वाली एक सशक्त पहल है। यह वह क्षण है जहाँ हम इतिहास से सीखते हुए वर्तमान को समृद्ध बना रहे हैं और भविष्य की एक उज्ज्वल रूपरेखा गढ़ने हेतु प्रतिबद्ध हैं।
साथियों,
आज जब हम ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में बढ़ रहे हैं, तब हमें यह स्मरण रखना होगा कि सशक्त संस्थाएँ ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला होती हैं। शिक्षण संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे नेतृत्व निर्माण की प्रयोगशालाएँ हैं। वे व्यक्तित्व गढ़ते हैं, सोच को दिशा देते हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनते हैं। ऐसे में, यह आवश्यक है कि हम शिक्षा को केवल औपचारिक डिग्री प्राप्त करने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे एक व्यापक बौद्धिक और नैतिक जागरण के रूप में देखें।
हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी विचारधारा को मूर्त रूप देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। यह नीति न केवल बहु-विषयक शिक्षण प्रणाली को बढ़ावा देती है, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समावेश से एक समग्र शिक्षण प्रणाली की नींव भी रखती है। हमें अपने शैक्षणिक संस्थानों को मात्र शिक्षा के केंद्रों के रूप में नहीं, बल्कि नवाचार, अनुसंधान और नेतृत्व विकास के उत्कृष्ट केंद्रों के रूप में विकसित करना होगा।
साथियों,
भारत का नेतृत्व दर्शन सदा से ही अधिकार से अधिक कर्तव्य पर आधारित रहा है। हमारे प्राचीन गुरुकुलों से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, शिक्षा ने हमें केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि चरित्र, अनुशासन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध भी कराया है। नेतृत्व केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, आत्म-अनुशासन और सतत सीखने की प्रवृत्ति का परिणाम है। यही कारण है कि हमें अपने संस्थानों को ऐसे नेतृत्व केंद्रों में परिवर्तित करना चाहिए जहाँ छात्र न केवल नौकरी की तलाश करें, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प भी लें।
एक राष्ट्र की मजबूती उसकी संस्थाओं पर निर्भर करती है और संस्थाएँ उतनी ही मजबूत होती हैं, जितना मजबूत और दूरदर्शी उनका नेतृत्व होता है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की विकसित भारत की कल्पना को मूर्तरूप देने के लिए हमारे नेतृत्व को शिक्षण, अनुसंधान, प्रशासन और शासन की मौजूदा धारणाओं से ऊपर उठना होगा। हमें अपनी सदियों से चली आ रही ज्ञान परंपराओं के भण्डार से प्रेरणा लेकर ऐसी संस्थाएं बनानी हैं जो न केवल कार्यात्मक हों, बल्कि परिवर्तनकारी भी हों।
साथियों,
भारत की शिक्षा प्रणाली सदैव ज्ञान, संस्कृति और मूल्यों का अद्भुत संगम रही है। आज जब हमारा देश आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है, तब हमें अपनी प्राचीन शिक्षा परंपरा को आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के साथ समाहित करते हुए नवाचार युक्त सोच को अपनाना होगा। हमें अपने शिक्षण संस्थानों को केवल रोजगारपरक शिक्षा तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि उन्हें ऐसे विचार मंच में परिवर्तित करना है जो छात्रों में नवाचार, शोध और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करें। 21वीं सदी के इस दौर में हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भविष्य की ओर कदम बढ़ाने होंगे, जिससे भारत न केवल ज्ञान-विज्ञान का केंद्र बने, बल्कि विश्व गुरु के रूप में अपनी ऐतिहासिक पहचान पुनः स्थापित कर सके।
हमें इस दृष्टिकोण को पुनः प्राप्त करना चाहिए कि ज्ञान को अलग-अलग विषयों में विभाजित नहीं किया जाए, बल्कि परस्पर जुड़े हुए जाल (ॅम्ठ) के रूप में समझा जाए। हमारे संस्थानों को विद्या के आदर्शों पर लौटना चाहिए- ऐसी शिक्षा जो केवल लेन-देन वाली न हो बल्कि परिवर्तनकारी हो, जहाँ सीखना केवल कौशल अधिग्रहण के बारे में न हो बल्कि मन, शरीर और आत्मा को आकार देने के बारे में हो। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना है जहाँ केवल सीखना केंद्र में न हो बल्कि ज्ञान अर्जित करना केंद्र में हो, जहाँ छात्र सिर्फ नौकरी की तलाश न करें बल्कि उद्देश्य की तलाश करें, जहाँ ज्ञान सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सकारात्मक, सामाजिक बदलाव की ओर ले कर जाए।
साथियों,
नेतृत्व केवल प्रशासन का विषय नहीं है, यह एक दायित्व है- एक संकल्प है समाज, राष्ट्र और विश्व के उत्थान का। शिक्षण संस्थानों का नेतृत्व तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक उसमें समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा और अवसर पहुंचाने की प्रतिबद्धता न हो। एक सशक्त राष्ट्र की नींव उसके शिक्षण संस्थानों में रखी जाती है, जहाँ शिक्षक केवल ज्ञान का संचार नहीं करते, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला भी रखते हैं। हमें अपने छात्रों को सिर्फ परीक्षाओं तक सीमित नहीं करना, बल्कि उनमें एक ऐसी दृष्टि विकसित करनी होगी जो उन्हें समस्याओं के समाधानकर्ता और नवाचार के वाहक के रूप में स्थापित करे। यही वह सोच है जो हमें एक सशक्त और विकसित भारत की ओर ले जाएगी।
मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि इस समागम में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष प्रो. एम. जगदीश कुमार, नैक चेयरमैन प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे, नैक निदेशक प्रो. जी. कन्नबिरन, एआइसीटीई चेयरमैन प्रो. टी.जी. सीताराम समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार साझा किए। निश्चित रूप से उनके विचारों से हमारे शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और छात्रों को अमूल्य मार्गदर्शन प्राप्त हुआ होगा। यह सम्मेलन केवल एक विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि नवाचार, अनुसंधान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रमाण भी है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस समागम में हुई चर्चाएं, शोध एवं संवाद शैक्षणिक नेतृत्व को सशक्त बनाएंगे और हमारे संस्थानों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी एवं प्रभावशाली बनाएंगे। इस अवसर पर मैं ‘‘देहरादून घोषणा पत्र’’ की महत्ता को रेखांकित करना चाहूँगा, जो देशभर के शिक्षण संस्थानों में नेतृत्व और गुणवत्ता सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक दस्तावेज साबित होगा।
मुझे गर्व है कि उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के रजत जयंती वर्ष में, जब राष्ट्र ‘‘अमृत काल’’ में प्रवेश कर रहा है, तब यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थागत नेतृत्व समागम 2025 हमारे राज्य में आयोजित किया गया है। मैं उत्तराखण्ड राज्य की ओर से विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान, उच्च शिक्षा विभाग, उत्तराखण्ड, दून विश्वविद्यालय एवं उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।
आइए, हम सब मिलकर अपने शिक्षण संस्थानों को नए भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप ढालने के लिए संकल्पबद्ध हों।
जय हिन्द!