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    01-03-2026:वसंतोत्सव-2026 के समापन समारोह में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : मार्च 1, 2026

    जय हिन्द!

    देवभूमि की इस पावन धरा के रक्षक बाबा केदार और बद्री विशाल के चरणों में नमन करते हुए, लोक भवन के इस पुष्पित प्रांगण में वसंतोत्सव के समापन समारोह में, मैं उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों, कर्मठ पुष्प उत्पादकों, अन्नदाताओं, विभिन्न जनपदों से आए काश्तकारों, देवतुल्य मातृशक्ति, ऊर्जावान युवाओं, नन्हे बच्चों और मीडिया के साथियों का हृदय की अतल गहराइयों से स्वागत, अभिनंदन और वंदन करता हूँ।

    आज हृदय अत्यंत प्रफुल्लित है। इन तीन दिनों में ‘लोक भवन’ का यह प्रांगण केवल फूलों की एक प्रदर्शनी मात्र नहीं रहा, बल्कि यह प्रकृति, संस्कृति, प्रगति और अध्यात्म का एक ऐसा त्रिवेणी संगम बन गया है, जिसने साक्षात ‘फूलों की घाटी’ को देहरादून की वादियों में उतार दिया है। आज वसंतोत्सव-2026 के समापन के इस अवसर पर, मैं यहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की आँखों में जो चमक देख रहा हूँ, वही मेरे विकसित और ‘सर्वश्रेष्ठ उत्तराखण्ड’ का प्रतिबिंब है।

    मेरे भाइयों और बहनों,

    वसंत केवल एक ऋतु का परिवर्तन नहीं है, यह जड़ता से चेतनता की ओर गमन है। यह ‘स्व’ से ‘सर्वस्व’ की यात्रा है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में उद्घोष किया है- ‘‘ऋतूनां कुसुमाकरः’’ अर्थात ऋतुओं में, मैं वसंत हूँ। जब स्वयं ईश्वर ने वसंत को अपनी विभूति बताया हो, तो आप कल्पना कीजिए कि इस उत्सव की पवित्रता कितनी अगाध होगी।

    उत्तराखण्ड की इस धरा पर, जहाँ के कण-कण में शिव का वास है और क्षण-क्षण में शक्ति का आभास है, वहाँ वसंतोत्सव का अर्थ ‘पुनर्जन्म’ है। जैसे शीत ऋतु की कठोरता के बाद एक नन्हीं कोपल पत्थर का सीना चीरकर बाहर आती है, वैसे ही यह उत्सव हमारे भीतर दबे हुए संकल्पों को नई ऊर्जा देने का महापर्व है। यह हमारी ‘ईगास-बग्वाल’ और ‘फूलदेई’ की उस महान परंपरा का आधुनिक विस्तार है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और आसमान छूने का साहस देती है।

    उत्तराखण्ड केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक ‘स्पिरिचुअल वाइब्रेशन’ है। यह ऋषियों की तपोभूमि है और वीरों की कर्मभूमि है। एक सैनिक के नाते, जब मैं इस धरती को देखता हूँ, तो मुझे यहाँ के फूलों की कोमलता में भी एक अजेय संकल्प दिखाई देता है। इस भूमि की सेवा करना मैं गौरव की अनुभूति के साथ अपना सौभाग्य मानता हूँ।

    जैसे एक सैनिक शून्य से नीचे के तापमान में भी देश की सीमा पर अडिग खड़ा रहता है, ठीक वैसे ही हमारा किसान भाई पहाड़ों की दुर्गम ऊँचाइयों पर अपनी मेहनत से केसर, ट्यूलिप और गुलाब खिलाता है। यह तपस्या है! यह साधना है! आज इस मंच से मैं उन सभी किसान भाइयों और बहनों का विशेष रूप से आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने अपनी पसीने की बूंदों से इन फूलों को सींचा है। आपकी मेहनत से ही आज हमारा राज्य न केवल देश में, बल्कि वैश्विक मानचित्र पर ‘पुष्प प्रदेश’ के रूप में अपनी पहचान सशक्त कर रहा है।

    भाइयों और बहनों,

    हमें यह समझना होगा कि फ्लोरीकल्चर केवल एक शौक या सजावट का माध्यम नहीं है, यह उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था की नई ‘लाइफलाइन’ है। हमारे पास दुनिया की सबसे अनूठी जलवायु है। मेरा सपना है, और यह मेरा संकल्प भी है कि उत्तराखण्ड का ‘जरबेरा’, ‘लिलियम’ और ‘आर्किड’ जब लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क के बाजारों में पहुंचे, तो वहाँ की खुशबू में देवभूमि की मिट्टी की महक होनी चाहिए।

    जब हम ‘वोकल फॉर लोकल’ की बात करते हैं, तो हमारे पुष्प उत्पादक उस मंत्र के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर होते हैं। हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए फूलों की खेती को ‘एग्री-बिजनेस’ में बदलना होगा। राज्य सरकार इस दिशा में मिशन मोड में कार्य कर रही है ताकि हमारे युवाओं को पहाड़ों से पलायन न करना पड़े, बल्कि वे ‘पुष्प-क्रांति’ के माध्यम से स्वरोजगार के नए कीर्तिमान स्थापित करें।

    मैं आज यहाँ उपस्थित अपनी मातृशक्ति को विशेष रूप से नमन करता हूँ। उत्तराखण्ड की नारी शक्ति सृजन की साक्षात देवी है। आपने जल, जंगल और जमीन को बचाए रखा है। जब मैं स्वयं सहायता समूहों (ैभ्ळे) के स्टॉल्स पर गया, तो वहाँ की दीदियों के आत्मविश्वास को देखकर लगा कि ‘विकसित उत्तराखण्ड’ का मार्ग यहीं से प्रशस्त हो रहा है।

    मेरे युवा साथियों,

    आप श्।हतप.म्दजतमचतमदमनतेश् बनिए। आज का युग तकनीक का है। हमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का विवाह कराना होगा। ड्रोन से लेकर प्रिसिजन फार्मिंग तक, और जैविक खाद से लेकर ग्लोबल मार्केटिंग तक- आकाश की कोई सीमा नहीं है। लोक भवन और सरकार आपके हर स्टार्टअप, हर इनोवेशन के साथ एक ढाल बनकर खड़े हैं।

    एक सैनिक होने के नाते, अनुशासन मेरे जीवन का मूल मंत्र है। मुझे यह जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई कि इस तीन दिवसीय उत्सव में लाखों की संख्या में जनमानस आया, लेकिन पूरे परिसर में ‘पॉलीथीन’ का उपयोग नहीं किया गया। यह केवल एक नियम का पालन नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण चेतना का उदाहरण है।

    वसंत हमें सिखाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसके ट्रस्टी हैं। हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा उत्तराखण्ड छोड़ना है जो स्वच्छ हो, हरा-भरा हो और जहाँ की नदियाँ अविरल और निर्मल हों। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके हम उन्नति नहीं कर सकते, हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर ही आगे बढ़ना होगा।

    इन तीन दिनों में लोक भवन के मंच पर जो लोक नृत्य, संगीत और कला का प्रदर्शन हुआ, उसने हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। हमारी लोक-कलाएँ हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद हैं। जब हमारे कलाकार थड्या, चौंफला और झोड़ा-चांचरी की प्रस्तुति देते हैं, तो वह केवल मनोरंजन नहीं होता, वह हमारी आत्मा का संगीत होता है। मैं उन सभी कलाकारों को बधाई देता हूँ जिन्होंने इस उत्सव में प्राण फूँक दिए।

    आज यहाँ जिन प्रतिभागियों ने पुरस्कार जीते हैं, उन्हें बहुत-बहुत बधाई! आपकी उत्कृष्टता सराहनीय है। लेकिन जिन्होंने आज पुरस्कार नहीं जीता, मैं उनसे कहना चाहता हूँ, आप हार कर नहीं जा रहे, आप अनुभव लेकर जा रहे हैं। वसंत हमें सिखाता है कि हर बीज के खिलने का अपना एक निश्चित समय होता है। आपकी मेहनत कभी निष्फल नहीं जाएगी। निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।

    मैं उद्यान विभाग, प्रशासन, पुलिस बल और उन सभी अनसंग हीरोज को भी साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इस भव्य आयोजन की व्यवस्था को संभाला और इस आयोजन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई।

    मेरे प्रिय प्रदेशवासियों,

    माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि ‘‘21वीं सदी का यह तीसरा दशक उत्तराखण्ड का दशक है।’’ वर्ष 2026 हमारे लिए उस विजन को सिद्ध करने का पड़ाव है। हमें एक ऐसे राज्य का निर्माण करना है जो न केवल आर्थिक रूप से समृद्ध हो, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक रूप से भी विश्व का मार्गदर्शन करे।

    हमारे जीवन और कार्य में 4 श्ैश् का महत्व होना चाहिए-
    ैचपतपजनंसपजल (अध्यात्म)ः ताकि हमारे कर्म निस्वार्थ हों। ैजतमदहजी (शक्ति)ः ताकि हम चुनौतियों से न डरें। ैापसस (कौशल)ः ताकि हमारे उत्पाद विश्वस्तरीय हों। ैमतअपबम (सेवा)ः ‘राष्ट्र प्रथम’ का भाव हमारे हर कार्य में हो।

    अंत में, मैं यही कामना करता हूँ कि इस वसंतोत्सव की स्मृति और इसकी खुशबू आपके घरों और मन-मस्तिष्क में सदैव बनी रहे। यह उत्सव समाप्त हो रहा है, लेकिन विकास और सृजन की जो यात्रा हमने शुरू की है, वह कभी रुकनी नहीं चाहिए।

    आइए! हम इस दिव्य प्रांगण से यह संकल्प लेकर जाएं कि हम अपने उत्तराखण्ड को ‘आत्मनिर्भर, प्रदूषण मुक्त और समृद्ध’ बनाएंगे। यह फूलों की महक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन में मुस्कान बनकर पहुंचे, तभी इस उत्सव की सार्थकता है।

    जब आप यहाँ से विदा लें, तो अपने साथ फूलों की छवियों के साथ, राष्ट्र निर्माण का एक अटूट संकल्प लेकर जाएं। परमेश्वर आप सभी का कल्याण करे। आप सभी का भविष्य इन फूलों की तरह ही उज्ज्वल और सुगंधित हो, इन मंगलकामनाओं के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वंदे मातरम! जय उत्तराखण्ड! जय हिन्द!