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    29-10-2026:52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अक्टूबर 29, 2026

    (तिथिः 29 अक्टूबर, 2026)

    सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे सम्माननीय प्रो. श्रीनिवास वरखेडी जी, परम आदरणीय योगऋषि स्वामी रामदेव जी, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी, विभिन्न विश्वविद्यालयों से पधारे कुलपतिगण, विद्वज्जन, आचार्यगण, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा उपस्थित देवियों एवं सज्जनों!

    आप सभी को मेरा सादर अभिवादन!

    “असतो मा सद्गमय।
    तमसो मा ज्योतिर्गमय।
    मृत्योर्मामृतं गमय॥”

    उपनिषदों की यह प्रार्थना हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान से ज्ञान के प्रकाश की ओर तथा सीमित दृष्टि से व्यापक चेतना की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है। भारतीय ज्ञान-परम्परा का मूल उद्देश्य भी यही रहा हैकृमनुष्य के भीतर विवेक, समाज में सद्भाव और सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति कल्याणकारी दृष्टि का विकास।

    52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर हरिद्वार की इस पवित्र भूमि पर उपस्थित होना मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता और गौरव का विषय है। माँ गंगा के पावन तट पर आयोजित यह सम्मेलन हमारी प्राचीन ज्ञान-सम्पदा के संरक्षण, संवर्धन और समकालीन जीवन में उसकी प्रासंगिकता को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है।

    इस 52वें अधिवेशन में देश-विदेश के विद्वानों की सहभागिता भारतीय मनीषा की अमूल्य धरोहर के प्रति व्यापक रुचि को दर्शाती है। मुझे विश्वास है कि यहाँ होने वाला विद्वत् संवाद, शोध-विमर्श और विचारों का आदान-प्रदान भारतीय ज्ञान-परम्परा के अध्ययन को नई दिशा प्रदान करेगा।

    आज इस अवसर पर ‘भारतीय दर्शनों का इतिहास एवं मीमांसा’, ‘वेदामृतम्’ तथा ‘भारतीय-दर्शन-बोध’ जैसी कृतियों का लोकार्पण भी ज्ञान-साधना की समृद्ध परम्परा को आगे बढ़ाने वाला प्रयास है। इन ग्रंथों के माध्यम से भारतीय दर्शन की गहनता, उसकी वैचारिक विविधता और जीवनोपयोगी दृष्टि को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने में सहायता मिलेगी। मैं इन कृतियों के लेखकों, संपादकों और प्रकाशन से जुड़े सभी विद्वानों को हार्दिक बधाई देता हूँ।

    भारत की सभ्यता केवल प्राचीनता के कारण गौरवशाली नहीं है, बल्कि इसलिए भी विशिष्ट है कि उसने ज्ञान को जीवन, आचरण और लोककल्याण से जोड़ा। हमारे वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शन-ग्रंथ और विविध शास्त्रीय परम्पराएँ मानव जीवन के गूढ़ प्रश्नों पर चिंतन करने के साथ-साथ समाज को नैतिकता, कर्तव्यबोध और समरसता का मार्ग भी दिखाती हैं।

    वेदों में प्रकृति के प्रति आदर, उपनिषदों में आत्मज्ञान, भगवद्गीता में कर्मयोग, रामायण में मर्यादा और महाभारत में धर्म तथा कर्तव्य की जटिलताओं पर गहन विचार मिलता है। भारतीय चिंतन की विशेषता यह है कि यहाँ ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक उन्नति नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और सामाजिक उत्तरदायित्व का परिष्कार भी रहा है।

    हमारे आचार्यों ने व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, खगोलविद्या, आयुर्वेद, योग, वास्तु और दर्शन सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। महर्षि पाणिनि की व्याकरण-परम्परा, महर्षि पतंजलि का योगदर्शन तथा आयुर्वेद की समृद्ध परम्परा भारतीय बौद्धिक सामथ्र्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इन उपलब्धियों का अध्ययन हमें अपने अतीत पर गर्व करने के साथ-साथ ज्ञान के प्रति विनम्र, जिज्ञासु और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा भी देता है।

    संस्कृत इस विशाल ज्ञान-सम्पदा की प्रमुख वाहक भाषा रही है। इसके माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान, दर्शन, साहित्य और जीवन-दृष्टि का संरक्षण हुआ। संस्कृत का संवर्धन तथा प्राचीन ग्रंथों का प्रामाणिक संपादन, अनुवाद और अनुसंधान अत्यंत आवश्यक है, ताकि उनमें निहित ज्ञान नई पीढ़ी तक पहुँचे और समकालीन संदर्भों में उसका सार्थक अध्ययन हो सके।

    प्राच्यविद्या का अध्ययन केवल अतीत को जानने का माध्यम नहीं है। यह हमें अपनी सभ्यता के विकास, विभिन्न विचारधाराओं के संवाद और मानव समाज के बौद्धिक इतिहास को समझने का अवसर प्रदान करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी प्राचीन ज्ञान-परम्पराओं का अध्ययन श्रद्धा के साथ-साथ तर्क, प्रमाण, प्रामाणिक स्रोतों और शोध-पद्धतियों के आधार पर करें।

    हमारी परम्परा में प्रश्न पूछने, विचार-विमर्श करने और तर्क के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुँचने की समृद्ध व्यवस्था रही है। शास्त्रार्थ की परम्परा इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। विभिन्न दर्शनों के बीच संवाद और मतभेदों के बावजूद सत्य की खोज की भावना भारतीय चिंतन की महत्त्वपूर्ण विशेषता रही है।

    आज के समय में प्राचीन ज्ञान का अध्ययन इतिहास, भाषा-विज्ञान, दर्शन, पुरातत्त्व, साहित्य, गणित, चिकित्सा और आधुनिक प्रौद्योगिकी जैसे विषयों के साथ समन्वित रूप से किया जाना चाहिए। इससे न केवल प्राचीन ग्रंथों के अर्थ और संदर्भ अधिक स्पष्ट होंगे, बल्कि उनके ऐतिहासिक योगदान तथा समकालीन प्रासंगिकता का भी वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन संभव होगा।

    भारत की सांस्कृतिक एकात्मता को समझने में प्राच्यविद्या का विशेष महत्व है। हमारी विविध भाषाओं, दर्शनों, साहित्यिक परम्पराओं और ज्ञान-पद्धतियों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया है। इन परम्पराओं का प्रामाणिक एवं अंतर्विषयी अध्ययन उनके ऐतिहासिक योगदान और समकालीन प्रासंगिकता को सामने लाएगा तथा वैश्विक शैक्षणिक विमर्श में भारत की बौद्धिक विरासत का सार्थक योगदान सुनिश्चित करेगा।

    मुझे प्रसन्नता है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन ज्ञान-परम्परा और भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन को विशेष महत्व दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी का “विकास भी, विरासत भी” का विचार इस बात को रेखांकित करता है कि आधुनिक प्रगति और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति प्रतिबद्धता एक-दूसरे की पूरक हैं।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय ज्ञान-परम्परा, मातृभाषाओं, बहुविषयक शिक्षा और अनुसंधान को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह नीति विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने के साथ-साथ उनमें नवाचार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र चिंतन की क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

    इसी क्रम में ज्ञान भारतम् मिशन के माध्यम से पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, सूचीकरण, संरक्षण, अंकीयकरण और व्यापक उपलब्धता की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। भारत की प्राचीन पांडुलिपियाँ हमारी सभ्यता की स्मृति और बौद्धिक उपलब्धियों का अनमोल भंडार हैं। उनमें निहित ज्ञान को सुरक्षित रखना, उसका प्रामाणिक अध्ययन करना और उसे शोधार्थियों तथा भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना हमारा साझा दायित्व है।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य आधुनिक तकनीक का उपयोग पांडुलिपियों के पाठ-पहचान, वर्गीकरण, तुलनात्मक अध्ययन तथा ज्ञान-सामग्री की खोज में सहायक हो सकता है। साथ ही, प्रौद्योगिकी के उपयोग से प्राप्त निष्कर्षों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए विद्वानों की विशेषज्ञता और पारंपरिक ज्ञान का समुचित उपयोग आवश्यक है। आधुनिक साधनों और पारंपरिक विद्वत्ता का समन्वय इस क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।

    उत्तराखण्ड की धरती भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना की विशिष्ट भूमि है। हिमालय की दिव्य उपस्थिति, माँ गंगा और माँ यमुना की पावन धाराएँ, बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थ तथा यहाँ की समृद्ध लोक-संस्कृति हमारी ज्ञान-परम्परा को विशिष्ट आयाम प्रदान करते हैं।

    यह प्रदेश योग, आयुर्वेद, ध्यान, प्राकृतिक चिकित्सा और आध्यात्मिक साधना की परम्पराओं से गहराई से जुड़ा रहा है। यहाँ की लोकभाषाओं, लोकगीतों, लोककथाओं, पारंपरिक कृषि-पद्धतियों और औषधीय वनस्पतियों से संबंधित स्थानीय ज्ञान में भी अनुभव और पीढ़ियों की साधना का मूल्यवान संचित भंडार है। इन परम्पराओं का दस्तावेजीकरण, वैज्ञानिक परीक्षण और उत्तरदायित्वपूर्ण संवर्धन आवश्यक है, ताकि हमारी सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रहे और समाज के लिए उपयोगी भी सिद्ध हो।

    हरिद्वार में पतंजलि विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित यह सम्मेलन इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। योग, आयुर्वेद, संस्कृत और भारतीय दर्शन के अध्ययन को शोध की आधुनिक पद्धतियों से जोड़ने के प्रयास भारतीय ज्ञान-परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में सहायक हो सकते हैं। मैं इस आयोजन के लिए विश्वविद्यालय और इससे जुड़े सभी संस्थानों के प्रयासों की सराहना करता हूँ।

    किसी भी सभ्यता की ज्ञान-सम्पदा तभी जीवंत रहती है, जब नई पीढ़ी उससे जुड़कर उसका अध्ययन करे, प्रश्न उठाए और नए निष्कर्षों तक पहुँचे। हमारे युवा शोधार्थियों को प्राचीन ग्रंथों के मूल पाठ, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, भाषिक विशेषताओं और दार्शनिक आशयों का गंभीर अध्ययन करना चाहिए।

    विश्वविद्यालयों और शोध-संस्थानों को पारंपरिक विद्वानों तथा आधुनिक विषयों के विशेषज्ञों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए। पांडुलिपियों के संरक्षण, दुर्लभ ग्रंथों के संपादन, भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अनुवाद और शोध-परिणामों के व्यापक प्रसार पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही, शोध में स्रोतों की प्रामाणिकता, निष्कर्षों की पारदर्शिता और बौद्धिक ईमानदारी को सर्वाेच्च स्थान मिलना चाहिए।

    हमारी प्राचीन परम्परा में ज्ञान को लोककल्याण से जोड़ने की भावना रही है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” का मंगलभाव हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का सर्वाेच्च उद्देश्य सम्पूर्ण मानवता के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण में योगदान देना है। आज जब विश्व अनेक सामाजिक, पर्यावरणीय और नैतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारतीय ज्ञान-परम्परा में निहित संतुलन, सह-अस्तित्व, संयम और समग्र दृष्टि पर गंभीर विमर्श उपयोगी हो सकता है।

    हमारा लक्ष्य केवल अपनी विरासत का गौरवगान करना नहीं, बल्कि उसके सार्थक तत्वों को समझना, प्रमाणों के आधार पर उनका मूल्यांकन करना और मानवता के व्यापक हित में उनका उपयोग सुनिश्चित करना होना चाहिए। यही दृष्टि भारत को ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में और अधिक सशक्त बनाने में सहायक होगी।

    अंत में, मैं 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए पतंजलि विश्वविद्यालय, परम आदरणीय योगऋषि स्वामी रामदेव जी, श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भारतीय विद्वत् परिषद् तथा आयोजन से जुड़े सभी विद्वानों, आयोजकों और सहयोगियों को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

    मुझे विश्वास है कि अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का यह 52वाँ अधिवेशन सार्थक विद्वत् संवाद, नवीन अनुसंधान और भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए नए संकल्पों का आधार बनेगा। यहाँ होने वाला विमर्श हमारी प्राचीन बौद्धिक विरासत को समझने, उसका प्रामाणिक मूल्यांकन करने और उसे भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान देगा।

    आइए, हम सब मिलकर ज्ञान, संस्कृति, अनुसंधान और नवाचार की भारतीय परम्परा को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक विश्व की चुनौतियों का समाधान खोजें और भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित करने में योगदान दें, जो अपनी विरासत पर गर्व करता है तथा अपने ज्ञान से विश्व-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

    इसी मंगलकामना के साथ आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जय हिन्द!
    जय भारत!
    वन्दे मातरम्!