25-10-2026 : “लेखक गाँव अंतर्राष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति एवं कला महोत्सव- 2026” के उद्घाटन अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन
आदरणीय मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति श्री पृथ्वीराज सिंह रूपन जी, माननीय पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री एवं लेखक गाँव के संस्थापक डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी, उत्तराखण्ड के माननीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री सतपाल महाराज जी, माननीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री श्री प्रदीप बत्रा जी, योगऋषि स्वामी रामदेव जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलाधिपति एवं साहित्यकार श्री संतोष चौबे जी, ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार श्री तेजेन्द्र शर्मा जी, लेखक गाँव की निदेशक सुश्री विदुषी निशंक जी, देश-विदेश से पधारे साहित्यकारों, विद्वज्जनों, कलाकारों, देवियो एवं सज्जनों!
देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पुण्यधरा पर आयोजित लेखक गाँव अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव-2026 में आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। मैं सभी अतिथियों का हृदय से स्वागत एवं अभिनंदन करता हूँ।
साहित्य, संस्कृति और कला का यह संगम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और सृजन के माध्यम से मानवता को जोड़ने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है। साहित्य किसी राष्ट्र की आत्मा का स्वर है, संस्कृति उसकी पहचान है और कला उसकी संवेदनाओं की सजीव अभिव्यक्ति है।
भारत की सभ्यता का वैभव उसकी भौतिक उपलब्धियों के साथ-साथ उसकी ज्ञान-साधना, दार्शनिक दृष्टि और मानवीय मूल्यों में निहित है। वेदों की ऋचाओं से लेकर उपनिषदों के चिंतन तक, रामायण की मर्यादा से लेकर महाभारत के धर्मबोध और श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग तक, हमारी साहित्यिक परंपरा ने मानव जीवन को दिशा प्रदान की है।
ऋग्वेद का उदात्त संदेश है-
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।”
अर्थात्, सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ।
यह मंत्र ज्ञान के प्रति उदारता और श्रेष्ठ विचारों को स्वीकार करने की भारतीय दृष्टि का परिचायक है। महर्षि वाल्मीकि, वेदव्यास, कालिदास, गोस्वामी तुलसीदास, संत कबीर और गुरु नानक देव जैसी महान विभूतियों की वाणी ने समाज को मर्यादा, करुणा, समरसता और लोकमंगल की प्रेरणा दी है।
हमारी इसी सनातन दृष्टि का उद्घोष है-“वसुधैव कुटुम्बकम्”, अर्थात् समस्त विश्व एक परिवार है। आज वैश्विक चुनौतियों के बीच यह विचार विभिन्न संस्कृतियों को संवाद, सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान के सूत्र में बाँधने की क्षमता रखता है।
देवियों एवं सज्जनों,
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक पराधीनता से मुक्ति का संघर्ष नहीं था; वह राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आत्मगौरव की पुनर्स्थापना का भी महान अभियान था। इस अभियान में साहित्य, कविता, पत्रकारिता, लोकगीतों और कला ने जनचेतना जाग्रत करने में ऐतिहासिक योगदान दिया।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का ‘वन्दे मातरम्’ मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का अमर स्वर बना। मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ ने राष्ट्रीय चेतना को प्रखर किया। रामप्रसाद बिस्मिल की क्रांतिकारी कविताओं ने युवाओं में त्याग, साहस और बलिदान की भावना जगाई। राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित समाचार-पत्रों, जनगीतों, प्रभात फेरियों और लोक-अभिव्यक्तियों ने स्वतंत्रता का संदेश गाँव-गाँव तक पहुँचाने तथा जनमानस में राष्ट्रप्रेम की भावना जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उत्तराखण्ड की धरती भी इस गौरवशाली इतिहास की साक्षी रही है। श्रीदेव सुमन, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और बद्रीदत्त पांडेय जैसे जननायकों का योगदान हमें साहस, स्वाभिमान और जनसेवा की प्रेरणा देता है।
यह इतिहास हमें स्मरण कराता है कि जिस लेखनी ने स्वतंत्रता की चेतना जगाई, वही लेखनी आज राष्ट्र के चरित्र, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के निर्माण में योगदान दे सकती है। साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि उनकी रचनाएँ समाज में संवेदना जगाएँ, सत्य के प्रति निष्ठा उत्पन्न करें और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध को सुदृढ़ बनाएँ।
उत्तराखण्ड हिमालय की दिव्यता, गंगा की पवित्रता और बदरीनाथ-केदारनाथ की आध्यात्मिक चेतना से अनुप्राणित प्रदेश है। यहाँ की पर्वत-शृंखलाएँ, नदियाँ, वन और ग्राम्य जीवन साहित्य एवं कला के लिए अनंत प्रेरणास्रोत हैं।
गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी तथा अन्य स्थानीय भाषाओं और बोलियों में हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ सुरक्षित हैं। लोकगीत, लोकगाथाएँ, जागर परंपरा, पांडव नृत्य, लोकनाट्य, संगीत, चित्रकला और हस्तशिल्प हमारी सामूहिक स्मृति को सजीव रखते हैं तथा सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं। इन लोकपरंपराओं का संरक्षण अतीत की स्मृतियों को जीवित रखते हुए नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है।
हमें स्थानीय भाषाओं में साहित्य-सृजन, अनुवाद, शोध और प्रकाशन को प्रोत्साहित करना चाहिए। साथ ही, हिमालय के पर्यावरण, जलस्रोतों, जैवविविधता और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण को भी साहित्यिक विमर्श का महत्त्वपूर्ण विषय बनाना चाहिए। विकास और प्रकृति के बीच संतुलन ही हमारी भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य का आधार है।
मित्रों,
लेखक गाँव की परिकल्पना साहित्य, ज्ञान, प्रकृति और सृजनशीलता को एक साझा मंच पर लाने की प्रेरक पहल है। पुस्तकालय, लेखक कुटीर, तक्षशिला भवन, प्रकृति की पाठशाला और ‘निशंक रचना संसार’ जैसी व्यवस्थाएँ इस परिकल्पना को साकार करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करती हैं। मैं डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी तथा उनकी पूरी टीम को इस रचनात्मक प्रयास के लिए बधाई देता हूँ।
डॉ. निशंक जी की साहित्य-साधना में हिमालय, मानवीय संवेदना, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक सरोकारों का सशक्त चित्रण दिखाई देता है। उनकी इसी सृजनशील दृष्टि से लेखक गाँव की परिकल्पना को विशेष प्रेरणा मिलती है।
मेरी अपेक्षा है कि लेखक गाँव निरंतर अध्ययन, साहित्यिक विमर्श, शोध और नवोदित प्रतिभाओं के संवर्धन का ऐसा केंद्र बने, जहाँ अनुभव और नवाचार का सुंदर समन्वय हो।
इस आयोजन की अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति भी विशेष महत्त्व रखती है। मॉरीशस और ब्रिटेन सहित विभिन्न देशों से पधारे साहित्यकार भारत की भाषायी एवं सांस्कृतिक विरासत के वैश्विक विस्तार का सजीव उदाहरण हैं। भाषा भौगोलिक सीमाओं से परे लोगों को जोड़ती है; साहित्य विभिन्न समाजों के अनुभवों और संवेदनाओं के बीच आत्मीय सेतु बनाता है।
हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकानुभव और ज्ञान-परंपरा की सशक्त संवाहिका है। विश्व के अनेक देशों में हिंदी के प्रति बढ़ती रुचि हमारी भाषायी विरासत की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाती है। भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद एवं साहित्यिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने और वैश्विक मंचों पर हिंदी की प्रतिष्ठा सुदृढ़ करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। हमारा उद्देश्य हिंदी को प्रतिष्ठित करते हुए भारत की समस्त भाषाओं की समृद्धि और परस्पर सम्मान को भी सुदृढ़ करना होना चाहिए।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के ज्ञान, चरित्र निर्माण और सृजनशीलता पर निर्भर करता है। आज आवश्यकता है कि युवाओं में पुस्तक-पठन, मौलिक चिंतन, मातृभाषा के प्रति सम्मान और साहित्यिक अभिरुचि विकसित की जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देकर नई प्रतिभाओं को आगे आने के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता साहित्य के संरक्षण, अनुवाद तथा प्रसार में उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। दुर्लभ पांडुलिपियों और लोकसाहित्य का संरक्षण भी इनके माध्यम से व्यापक स्तर पर संभव है। किंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि तकनीक साधन है; साहित्य की वास्तविक शक्ति मानवीय संवेदना, मौलिकता और सत्यनिष्ठ चिंतन में निहित है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में देश विकसित भारत-2047 के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में ज्ञान, संस्कृति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नैतिक मूल्यों से समृद्ध समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
उत्तराखण्ड अपनी लोककला, साहित्य, आध्यात्मिक विरासत और प्राकृतिक संपदा के माध्यम से विकसित भारत की यात्रा में विशिष्ट योगदान दे सकता है। सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक ज्ञान को आजीविका से जोड़कर हम आत्मनिर्भर एवं समृद्ध उत्तराखण्ड के निर्माण को गति दे सकते हैं।
आदरणीय साहित्यकारों,
मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि अपनी लेखनी और कला के माध्यम से राष्ट्रीय एकात्मता, मानवीय करुणा, सामाजिक समरसता तथा पर्यावरण संरक्षण की चेतना को सशक्त बनाएँ। ऐसा साहित्य रचें, जो हमारी गौरवशाली परंपरा से प्रेरणा ले, वर्तमान की चुनौतियों का विवेकपूर्ण चित्रण करे और भविष्य के लिए आशा का मार्ग प्रशस्त करे।
हमारी प्राचीन प्रार्थना है-
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”
अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोग हों।
यही लोकमंगल भारतीय संस्कृति की आत्मा है और यही साहित्य की सर्वाेच्च सार्थकता भी है।
मुझे विश्वास है कि यह महोत्सव विचारों के आदान-प्रदान, भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्स्मरण और नवीन साहित्यिक सृजन को प्रोत्साहित करने का प्रभावी माध्यम बनेगा। यहाँ होने वाला साहित्यिक विमर्श हमारी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण-संवर्धन को प्रोत्साहित करेगा और विकसित भारत तथा विकसित उत्तराखण्ड के संकल्प को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
इसी मंगलकामना के साथ मैं इस महोत्सव की सफलता की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
जय हिन्द!
जय उत्तराखण्ड!