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    03-10-2026:120वें अखिल भारतीय किसान मेले एवं कृषि-औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अक्टूबर 3, 2026

    जय हिन्द!

    आज 120वें अखिल भारतीय किसान मेले एवं कृषि औद्योगिक प्रदर्शनी के अवसर पर पंतनगर की इस कर्मभूमि पर उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह किसान, विज्ञान, युवा, उद्यमिता और नई तकनीक को एक मंच पर जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर है।

    जिस मिट्टी से अन्न निकलता है, उसी मिट्टी से भारत की आत्मनिर्भरता की शक्ति भी निकलती है। इसलिए किसान केवल खेत का स्वामी नहीं, राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है। 120वें किसान मेले तक पहुँची यह गौरवशाली परंपरा कृषि के प्रति हमारे निरंतर विश्वास और किसान के साथ संवाद की जीवंत पहचान है।

    पंतनगर का नाम लेते ही कृषि शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और किसान सेवा की एक सशक्त परंपरा हमारे सामने आती है। यह विश्वविद्यालय खेत और किसान से जुड़ा महत्वपूर्ण ज्ञान-केंद्र है। आज आवश्यकता है कि इस ज्ञान को और व्यापक बनाकर उत्तराखण्ड के प्रत्येक कृषि क्षेत्र और प्रत्येक किसान तक पहुँचाया जाए।

    हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में अन्न को केवल भोजन नहीं, जीवन का आधार माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

    “अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
    यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥”

    अर्थात् समस्त प्राणियों का आधार अन्न है, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा प्रकृति तथा कर्म के संतुलन से जुड़ी है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि किसान केवल फसल पैदा नहीं करता, वह जीवन की पूरी श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। इसलिए किसान का सम्मान जीवन, प्रकृति और राष्ट्र के सम्मान से जुड़ा है।

    आज का किसान बदलती परिस्थितियों के बीच खेती कर रहा है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, जल संकट, उत्पादन लागत, श्रम की कमी, बाजार की अनिश्चितता उसके सामने हैं।

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने किसानों की आय, कृषि सुरक्षा और आधुनिक तकनीक को मजबूत करने के लिए अनेक पहल की हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान क्रेडिट कार्ड और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों को आर्थिक सहायता, संस्थागत ऋण और फसल जोखिम से सुरक्षा देने का प्रयास किया जा रहा है।

    डिजिटल कृषि मिशन के माध्यम से किसान रजिस्ट्री, मौसम एवं उपग्रह आधारित जानकारी तथा एआई और बिग डेटा जैसी तकनीकों को कृषि से जोड़ा जा रहा है। प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना तथा उच्च उपज और जलवायु अनुकूल बीजों से जुड़े प्रयासों के माध्यम से उत्पादकता, फसल विविधीकरण और कृषि को अधिक सक्षम बनाने पर जोर दिया जा रहा है। यह बदलती कृषि का संकेत है, जहाँ परंपरागत अनुभव के साथ विज्ञान, डेटा और तकनीक किसान की नई शक्ति बन रहे हैं।

    आज कृषि में नई तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई मौसम के पूर्वानुमान, फसल में रोग की शुरुआती पहचान, मिट्टी की स्थिति के विश्लेषण, सिंचाई की जरूरत तय करने और उत्पादन का अनुमान लगाने में उपयोगी हो सकती है। ड्रोन खेतों की निगरानी और छिड़काव में सहायक हो रहे हैं, जबकि सेंसर और डिजिटल उपकरण पानी, मिट्टी और फसल की स्थिति की जानकारी देते हैं।

    तकनीक का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि कृषि की लागत कम करना, संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और किसान के निर्णय को अधिक सटीक बनाना भी होना चाहिए।

    लेकिन तकनीक तभी सार्थक है, जब वह किसान तक पहुँचे। आज एआई और डिजिटल कृषि केवल बड़े किसानों तक सीमित नहीं है। छोटे और सीमांत किसान को भी इन तकनीकों का लाभ मिल रहा है जो उसकी लागत घटा रहे है। निर्णय आसान बना रहे है। और उसकी आय के अवसर बढ़ा रहे है।

    उत्तराखण्ड की कृषि की अपनी विशिष्ट पहचान है। हमारे पास मैदान, भाबर, तराई और निम्न, मध्य तथा उच्च हिमालयी क्षेत्र हैं। यह विविधता चुनौती भी है और अवसर भी। हमें एक ही कृषि मॉडल सब जगह लागू करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि मॉडल विकसित करने होंगे।

    पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ भूमि सीमित है, वहाँ हमारा लक्ष्य होना चाहिए- कम भूमि से अधिक मूल्य। फल, सब्जियाँ, पुष्प, सुगंधित और औषधीय पौधे, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन तथा अन्य उच्च-मूल्य कृषि गतिविधियाँ किसानों के लिए आय के नए रास्ते खोल सकती हैं। केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं है। हमें बीज से उत्पादन, उत्पादन से प्रसंस्करण, प्रसंस्करण से पैकेजिंग और पैकेजिंग से बाजार तक पूरी श्रृंखला को मजबूत करना होगा। किसान का उत्पाद जितना अधिक मूल्य लेकर बाजार तक पहुँचेगा, किसान की मेहनत का लाभ उतना ही बढ़ेगा।

    मुझे प्रसन्नता है कि आज हमारे किसान केवल उत्पादक नहीं, कृषि उद्यमी बन रहे हैं। हमारे खेत केवल फसल के केंद्र नहीं, वे मूल्य संवर्धन, रोजगार और उद्यमिता के केंद्र भी बन रहे हैं। किसान उत्पादक संगठन, सहकारी संस्थाएँ, स्वयं सहायता समूह, स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयाँ और कृषि आधारित छोटे उद्यम गाँव की अर्थव्यवस्था को नई शक्ति दे रहे हैं। हमारे स्थानीय उत्पाद आज उत्तराखण्ड से बाहर निकलकर विदेशों तक अपनी पहचान बना रहे हैं।

    मुझे कृषि विरासत और नई कृषि तकनीक के साथ दिखाई देने वाला यह मेला विशेष रूप से महत्वपूर्ण लगता है। हमारी पारंपरिक फसलें, स्थानीय बीज और पीढ़ियों से संचित कृषि ज्ञान हमारी अमूल्य धरोहर हैं। परंपरा के उपयोगी ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना है। परंपरा हमारी जड़ है और विज्ञान हमारी गति; दोनों का समन्वय हमारी कृषि को अधिक टिकाऊ और सक्षम बना सकता है।

    जल संरक्षण को भी कृषि के केंद्र में रखना होगा। वर्षा जल का संचयन, कम पानी वाली फसलें, सूक्ष्म सिंचाई, मिट्टी की नमी का संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आने वाले समय की आवश्यकता है। प्रकृति से संघर्ष करके नहीं, प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने वाली कृषि ही दीर्घकाल तक किसान और समाज दोनों को समृद्ध कर सकती है।

    मैं उत्तराखण्ड की कृषक महिलाओं को विशेष रूप से नमन करता हूँ। पहाड़ की कृषि में उन्होंने कठिन परिस्थितियों में परिवार और खेत दोनों को संभाला है। इतना ही नहीं अब उनकी भूमिका कृषि श्रम से आगे बढ़कर कृषि उद्यमिता, उत्पादक समूहों के नेतृत्व और स्थानीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन तक अपनी पहुंच बना रही है।

    हमारे युवाओं के लिए कृषि में अपार संभावनाएँ हैं। एग्री-टेक से लेकर ड्रोन सेवा, कृषि प्रसंस्करण से लेकर डिजिटल बाजार और कृषि आधारित स्टार्ट-अप तक युवाओं के लिए अनेक नए अवसर खुल रहे हैं। यदि किसान का अनुभव और युवा की तकनीकी क्षमता साथ आए, तो कृषि नवाचार और रोजगार का नया आधार बन सकती है।

    कृषि को पलायन की चुनौती से जोड़कर अब एक सकारात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है। सरकार की विभिन्न योजनाओं और प्रयासों से जुड़कर कई युवा अपने गाँवों की ओर लौट रहे हैं और कृषि, बागवानी से जुड़े उद्यमों को अपना रहे हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, बाजार और रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। इससे पहाड़ों में ऐसा वातावरण बन रहा है, जहाँ युवा अपने गाँव में रहकर ही अपनी आजीविका और भविष्य की मजबूत नींव तैयार कर रहे हैं।

    पंतनगर विश्वविद्यालय की भूमिका यहाँ और महत्वपूर्ण हो जाती है। मैं अपेक्षा करता हूँ कि विश्वविद्यालय का शोध खेत की वास्तविक समस्याओं से और अधिक जुड़े, कृषि विज्ञान केंद्र स्थानीय समाधान के केंद्र बनें और वैज्ञानिक ज्ञान उत्तराखण्ड के सभी जिलों तक पहुँचे।

    शोध का अंतिम लक्ष्य केवल शोधपत्र नहीं, बल्कि किसान के खेत में दिखाई देने वाला परिवर्तन होना चाहिए। विश्वविद्यालय, सरकार, वैज्ञानिक, किसान, युवा और कृषि उद्यमी मिलकर काम करेंगे, तभी ज्ञान वास्तव में जन-शक्ति बनेगा।

    प्रिय किसान भाइयों और बहनों,

    आज इस अवसर पर हमें एक स्पष्ट संकल्प लेना है-कृषि को अधिक लाभकारी, अधिक टिकाऊ, अधिक तकनीक-सक्षम और अधिक सम्मानजनक बनाना है। खेत में विज्ञान पहुँचे, किसान के हाथ में तकनीक पहुँचे, एआई का लाभ गाँव तक पहुँचे, पानी की हर बूंद का सदुपयोग हो, स्थानीय उत्पाद को पहचान और बाजार मिले तथा युवा कृषि में अपना भविष्य देखें।

    मेरा विश्वास है कि उत्तराखण्ड के विकास की राह खेतों से होकर गुजरती है। समृद्ध किसान होगा तो समृद्ध गाँव होगा। समृद्ध गाँव होगा तो सशक्त उत्तराखण्ड बनेगा। और सशक्त उत्तराखण्ड, विकसित भारत की शक्ति बनेगा।

    आइए! हम ऐसा उत्तराखण्ड बनाने का संकल्प लें जहाँ खेत में नवाचार हो, किसान के हाथ में तकनीक हो, स्थानीय उत्पाद को बाजार मिले, गाँव में रोजगार हो और युवा को अपने गाँव में अपना भविष्य दिखाई दे।

    किसान की समृद्धि केवल कृषि की सफलता नहीं, बल्कि गाँव की समृद्धि, उत्तराखण्ड की शक्ति और भारत की आत्मनिर्भरता की आधारशिला है।

    समृद्ध किसान-सशक्त गाँव-विकसित उत्तराखण्ड-विकसित भारत।

    इसी संकल्प और विश्वास के साथ 120वें अखिल भारतीय किसान मेले के आयोजन के लिए पंतनगर विश्वविद्यालय परिवार को हार्दिक बधाई देता हूँ। देश और प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए सभी किसान भाई-बहनों का अभिनंदन करता हूँ तथा वैज्ञानिकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, कृषि उद्यमियों और कृषि क्षेत्र से जुड़े सभी साथियों को शुभकामनाएँ देता हूँ।

    वंदे मातरम्!
    भारत माता की जय!