Close

    29-09-2026:झाझरा स्थित आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल में आयोजित “विशिष्ट अधिगम अक्षमता (डिस्लेक्सिया) एवं ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के मैपिंग अभियान” में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : सितम्बर 29, 2026

    जय हिन्द!

    मंचासीन आदरणीय अतिथिगण, विशेषज्ञगण, चिकित्सक, शिक्षकगण, सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधिगण, अभिभावकगण तथा मेरे प्यारे बच्चों!

    आज इस अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील कार्यक्रम में आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे प्रसन्नता हो रही है।

    हमारी सनातन संस्कृति ने सदैव समूची मानवता के कल्याण की कामना की है-

    “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”

    अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें, सभी का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने। यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि हमारी भारतीय जीवन-दृष्टि है। यह हमें सिखाती है कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी है, जब विकास की धारा में कोई भी व्यक्ति पीछे न छूटे।

    आज का यह डंचचपदह ब्ंउचंपहद इसी मानवीय और संवेदनशील सोच को व्यवहार में उतारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। मैं श्री तरुण विजय जी, शिक्षा विभाग, विशेषज्ञों, सामाजिक संस्थाओं और इस अभियान से जुड़े सभी लोगों को इस सार्थक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।

    भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा है-

    “आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
    सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥”

    अर्थात् जो व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख को अपने समान समझता है, वही श्रेष्ठ दृष्टि वाला है। मेरी दृष्टि में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति हमारा व्यवहार इसी समदृष्टि और संवेदना पर आधारित होना चाहिए।

    उन्हें दया नहीं, अवसर चाहिए। सहानुभूति मात्र नहीं, सहयोग चाहिए। अलगाव नहीं, स्वीकार्यता चाहिए। और सबसे बढ़कर- सम्मान और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर चाहिए।

    डिस्लेक्सिया और ऑटिज्म से जुड़े बच्चों की विशेष आवश्यकताओं की समय पर पहचान अत्यंत आवश्यक है। कई बार सीखने में कठिनाई को कमजोरी, असावधानी या सामान्य व्यवहार से अलग मान लिया जाता है। इससे बच्चे के आत्मविश्वास पर भी असर पड़ सकता है।

    इसलिए मेरी स्पष्ट धारणा है कि बच्चे की कठिनाई को उसकी कमी नहीं, बल्कि उसकी विशेष आवश्यकता के रूप में समझना होगा। समय पर पहचान होगी, तो समय पर सहायता मिलेगी। समय पर सहायता मिलेगी, तो बच्चा अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ सकेगा।

    इसीलिए आज का डंचचपदह ब्ंउचंपहद केवल बच्चों की संख्या जानने का अभियान नहीं है। यह समझने का माध्यम है कि कहाँ कितने बच्चों को किस प्रकार की सहायता, विशेषज्ञता और संसाधनों की आवश्यकता है। मैपिंग सटीक योजना निर्माण, विशेषज्ञ सेवाओं की व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं को लक्षित बच्चों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

    मेरी दृष्टि में मैपिंग तभी सफल होगी, जब उसका डेटा जमीन पर दिखाई देने वाली सहायता में बदले। डेटा से योजना बने, योजना से संसाधन आएँ, संसाधनों से सहायता मिले और सहायता से बच्चे का जीवन बदले- यही इस अभियान की वास्तविक सफलता होगी।

    इस पूरे प्रयास में हमारे शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। एक शिक्षक बच्चे के साथ प्रतिदिन रहता है। वह उसके सीखने के तरीके, व्यवहार, सहभागिता और उसकी विशिष्ट क्षमताओं को सबसे पहले समझ सकता है।

    इसलिए प्रधानाचार्यों और शिक्षकों को संवेदनशील बनाना और उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण देना अत्यंत आवश्यक है। इस कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य भी यही है कि शिक्षक बच्चों की कठिनाइयों को पहचानें और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उचित विशेषज्ञ सहायता तक पहुँचाने में सहयोग करें।

    मैं अपने शिक्षक साथियों से विशेष रूप से कहना चाहूँगा-

    किसी बच्चे की एक गलती को उसकी क्षमता का पैमाना मत बनाइए। उसकी अलग क्षमता को पहचानिए।

    हर बच्चा एक जैसा नहीं सीखता। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य हर बच्चे को एक ही साँचे में ढालना नहीं, बल्कि उसकी क्षमता और आवश्यकता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर देना होना चाहिए।

    इसी के साथ परिवार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी बच्चे में सीखने या व्यवहार से जुड़ी कोई विशेष आवश्यकता दिखाई देती है, तो उसे छिपाने या उसे लेकर संकोच करने के बजाय समय पर विशेषज्ञ सहायता लेनी चाहिए। समय पर सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य के प्रति जिम्मेदारी है।

    परिवार, विद्यालय, चिकित्सक, विशेष शिक्षक, काउंसलर, सामाजिक संगठन और प्रशासन- इन सभी के समन्वित प्रयास से ही बच्चे के लिए एक मजबूत सहयोग तंत्र तैयार किया जा सकता है। इस कार्यक्रम की विशेषता भी यही है कि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों को एक मंच पर लाकर सामूहिक समाधान की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।

    हमें ऐसी समावेशी शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ना है, जहाँ प्रत्येक बच्चे को सीखने, खेलने, अपनी प्रतिभा दिखाने और आगे बढ़ने का समान अवसर मिले।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी बच्चों के लिए समान और समावेशी शिक्षा पर बल देती है तथा दिव्यांग बच्चों की शिक्षा में पूर्ण भागीदारी के लिए आवश्यक सहयोग, विशेष शिक्षकों, संसाधन केंद्रों और सहायक तकनीक की व्यवस्था पर जोर देती है।

    माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी दिव्यांगजनों के लिए सम्मान, पहुँच और अवसर सुनिश्चित करने पर बल दिया है। उनका यह दृष्टिकोण हमें प्रेरणा देता है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सहायता का पात्र भर न मानकर उनकी क्षमता और प्रतिभा को अवसर दें और उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ें।

    देवभूमि उत्तराखण्ड की पहचान हमारी आध्यात्मिक परंपरा के साथ-साथ हमारी मानवीय संवेदना से भी है। मेरा मानना है कि उत्तराखण्ड ऐसा राज्य बने जहाँ किसी भी बच्चे की विशेष आवश्यकता उसकी प्रगति में बाधा न बने।

    चाहे बच्चा हमारे मैदानी क्षेत्र में हो या दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्र में, हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि भौगोलिक दूरी उसकी सहायता की राह में बाधा न बने। समय पर पहचान, उचित मार्गदर्शन और आवश्यक विशेषज्ञ सहायता तक उसकी पहुँच सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

    मैं चाहता हूँ कि इस मैपिंग से प्राप्त जानकारी नीति निर्माण का आधार बने, शिक्षकों के प्रशिक्षण का आधार बने, विशेषज्ञ सेवाओं के विस्तार का आधार बने और सबसे महत्वपूर्ण- बच्चों के बेहतर भविष्य का आधार बने।

    मैपिंग एक शुरुआत है, मंजिल नहीं। इसके बाद प्राप्त जानकारी के आधार पर निरंतर पहचान, परामर्श, प्रशिक्षण और सहायता की व्यवस्था को आगे बढ़ाना होगा।

    हमारा लक्ष्य केवल यह जानना नहीं होना चाहिए कि कितने बच्चे ऐसे हैं जिन्हें सहायता की आवश्यकता है। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि जिस बच्चे को जिस सहायता की आवश्यकता है, वह सहायता सही समय पर उस तक पहुँचे।

    अंत में मैं एक बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा-

    किसी बच्चे की कठिनाई को उसकी पहचान मत बनाइए, उसकी क्षमता को उसकी पहचान बनाइए।

    एक बच्चे की समय पर पहचान उसके आत्मविश्वास को बचा सकती है। एक संवेदनशील शिक्षक उसका जीवन बदल सकता है। एक सहयोगी परिवार उसे नई उड़ान दे सकता है। और एक समावेशी समाज उसे यह विश्वास दे सकता है कि वह भी इस समाज का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    आइए, आज हम केवल एक डंचचपदह ब्ंउचंपहद का उद्घाटन न करें, बल्कि एक ऐसी सोच का भी उद्घाटन करें जिसमें-

    पहचान हो, तो समय पर; सहायता हो, तो आवश्यकता के अनुसार; शिक्षा हो, तो समावेशी; और व्यवहार हो, तो सम्मानपूर्ण।

    हम मिलकर ऐसा उत्तराखण्ड बनाएँ, जहाँ हर बच्चे को अपनी क्षमता पहचानने, उसे विकसित करने और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर मिले।

    और हर बच्चा पूरे आत्मविश्वास से कह सके-

    “मेरी कठिनाई मेरी सीमा नहीं है, मेरी क्षमता मेरी पहचान है।”

    इसी विश्वास, इसी संवेदना और इसी संकल्प के साथ मैं इस महत्वपूर्ण डंचचपदह ब्ंउचंपहद की सफलता की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

    वंदे मातरम्!
    भारत माता की जय!
    जय हिन्द!