26-09-2026:उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के बारहवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन
जय हिन्द!
मंच पर उपस्थित डॉ. धनसिंह रावत जी, कैबिनेट मंत्री, उत्तराखण्ड सरकार, प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी जी, कुलपति, प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय, गुवाहाटी, सारस्वत अतिथि प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय जी, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति, कार्यपरिषद् एवं विद्यापरिषद् के सम्मानित सदस्यगण, विद्वत् समुदाय तथा मेरे प्रिय छात्र-छात्राओं!
आज का यह दीक्षांत समारोह विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, उनके माता-पिता और गुरुजनों के लिए उपलब्धि, गौरव और नई आशाओं का महत्वपूर्ण अवसर है। इस गरिमामय अवसर पर आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे हर्ष और आत्मिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है।
हरिद्वार केवल एक नगर नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत चेतना का तीर्थ है। यह धर्मनगरी माँ गंगा की पावन धारा से मानवता को शुचिता, सेवा और कल्याण का संदेश देती है। ऐसी पुण्यभूमि पर स्थित उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के बारहवें दीक्षांत समारोह में आप सभी को संबोधित करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
इस पावन अवसर पर मैं सभी पदक एवं उपाधि प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को हार्दिक बधाई देता हूँ। आपके माता-पिता और गुरुजनों को भी विशेष बधाई, जिनके त्याग, तपस्या और मार्गदर्शन ने आपकी सफलता का मार्ग प्रशस्त किया है।
प्रिय स्नातकों,
दीक्षांत केवल शिक्षा पूर्ण होने का समारोह नहीं है। यह जीवन की एक नई यात्रा का प्रारंभ है। आज आपको केवल उपाधि नहीं मिल रही है, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति एक नई जिम्मेदारी भी मिल रही है। आप इस विश्वविद्यालय में शिक्षार्थ आए थे और अब सेवार्थ जा रहे हैं।
आपके पास ज्ञान है, संस्कार हैं और युवा ऊर्जा है। अब इन तीनों को समाज की आवश्यकताओं से जोड़कर सार्थक बनाना आपका दायित्व है।
हमारे आचार्यों ने विद्या की यात्रा को अत्यंत सुंदर ढंग से समझाया है-
“आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया।
पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण तु॥”
अर्थात् विद्यार्थी एक भाग ज्ञान गुरु से प्राप्त करता है, एक भाग अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ से, एक भाग सहपाठियों के संवाद से और शेष जीवन के अनुभवों से सीखता है। इसलिए आज का दीक्षांत ज्ञान की पूर्णता नहीं, बल्कि आजीवन सीखने की यात्रा का शुभारंभ है।
विद्या ऐसा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता, जिसे बाँटने से वह घटता नहीं, बल्कि और समृद्ध होता है। इसीलिए कहा गया है-
“विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।”
आज आपके पास यह अमूल्य धन है। इसकी सार्थकता तभी है, जब आपके ज्ञान से समाज में प्रकाश फैले और लोगों के जीवन को नई दिशा मिले।
प्रिय छात्र-छात्राओं,
संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं है। यह भारत की ज्ञान-चेतना, चिंतन-परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति की प्रमुख वाहक है। वेदों से उपनिषदों तक, रामायण और महाभारत से गीता तक, दर्शन से व्याकरण तक, आयुर्वेद से योग तक-भारत की विशाल ज्ञान-परंपरा का एक विराट संसार संस्कृत में सुरक्षित है।
संस्कृत हमें केवल शब्द नहीं देती, बल्कि जीवन को देखने की दृष्टि देती है। इसमें ज्ञान है, विवेक है, कर्तव्यबोध है और मानव कल्याण की व्यापक भावना है।
इसलिए संस्कृत को केवल अतीत की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है। हमें इसे भविष्य की संभावनाओं से जोड़ना होगा।
आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, भाषा-विज्ञान और मशीन ट्रांसलेशन का युग है। संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना, विशाल साहित्य और समृद्ध शब्द-संपदा पर आधुनिक तकनीक के माध्यम से नए अनुसंधान की व्यापक संभावनाएँ हैं। हमें संस्कृत को पुस्तकालय की अलमारियों से निकालकर डिजिटल संसार, शोध प्रयोगशालाओं और वैश्विक ज्ञान-विमर्श तक ले जाना होगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। यह समय संस्कृत को नई पीढ़ी, नई तकनीक और नए शोध से जोड़ने का है।
देवभाषा का देवभूमि से इससे अधिक स्वाभाविक संबंध और क्या हो सकता है!
उत्तराखण्ड वह भूमि है जहाँ वेदव्यास की स्मृतियाँ हैं, आदि शंकराचार्य की साधना है, बदरीनाथ और केदारनाथ की आध्यात्मिक चेतना है और हिमालय की तपस्या है। गंगा-यमुना सहित अनेक पवित्र नदियों, तीर्थों और आध्यात्मिक परंपराओं से समृद्ध इस देवभूमि में संस्कृत विश्वविद्यालय का होना अपने आप में एक विशेष दायित्व का बोध कराता है।
मेरी कामना है कि जिस प्रकार हिमालय से निकलने वाली गंगा देश-दुनिया का कल्याण करती है, उसी प्रकार उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय से निकलने वाली ज्ञान की गंगा भी सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन करे।
संस्कृत का संदेश सीमाओं से परे है-
“वसुधैव कुटुम्बकम्।” सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है।
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” सब सुखी हों, सब निरोग हों।
और- “संगच्छध्वं संवदध्वम्।”
हम साथ चलें, साथ संवाद करें।
ये केवल श्लोक नहीं, बल्कि मानवता के लिए जीवन-दर्शन हैं। यही संस्कृत की उदात्तता है और यही भारत की सनातन दृष्टि है।
आज संस्कृत के विद्यार्थियों के सामने संभावनाओं का क्षेत्र भी व्यापक है। अध्यापन के साथ अनुवाद, शोध, योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, पर्यटन, संस्कृति, प्रकाशन, डिजिटल मीडिया और भाषा-तकनीक जैसे अनेक क्षेत्रों में नए अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि संस्कृत को रोजगार से जोड़ें, शोध से जोड़ें, तकनीक से जोड़ें और नवाचार से जोड़ें।
मुझे प्रसन्नता है कि उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय अध्ययन-अध्यापन, शोध, संस्कृत साहित्य के प्रचार-प्रसार और आधुनिक शैक्षणिक संसाधनों के विस्तार की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन, अखिल भारतीय संस्कृत कवि सम्मेलन और शोध के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की पहलें इसकी सक्रियता को दर्शाती हैं।
लगभग दस हजार दुर्लभ पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का विश्वविद्यालय को दान देकर संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने के लिए मैं पद्मश्री अभिराज राजेन्द्र मिश्र जी के प्रति विशेष आभार व्यक्त करता हूँ। इन ग्रंथों को “अभिराज-पुस्तक-वीथी” के नाम से संरक्षित किया जाना आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदा सिद्ध होगा।
मेरी अपेक्षा है कि आने वाले समय में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय तक्षशिला और नालन्दा की ज्ञान-परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति बने-ऐसा केंद्र, जहाँ देश और दुनिया के विद्यार्थी तथा शोधार्थी संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा और उससे जुड़े आधुनिक विषयों पर अध्ययन और अनुसंधान के लिए आएँ।
प्रिय स्नातकों,
आज जब आप इस विश्वविद्यालय से बाहर निकलेंगे, तो अपने साथ पाँच संकल्प लेकर जाइए-ज्ञान को निरंतर बढ़ाने का, संस्कारों को जीवन में उतारने का, समाज की सेवा करने का, नवाचार को अपनाने का और राष्ट्र को सर्वाेपरि रखने का।
याद रखिए, आपकी उपाधि केवल आपके नाम के आगे जुड़ने वाला एक शब्द नहीं है। इसके पीछे आपके माता-पिता का त्याग, आपके गुरुजनों की तपस्या और समाज की अपेक्षाएँ जुड़ी हैं।
इसलिए जहाँ जाएँ, अपनी पहचान केवल एक उपाधिधारी व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और सेवा के वाहक के रूप में बनाइए।
आप विश्वविद्यालय से निकल रहे हैं, लेकिन विश्वविद्यालय की संस्कृति आपके साथ जा रही है। आप परिसर से दूर जा रहे हैं, लेकिन संस्कृत की ज्ञान-ज्योति आपके भीतर निरंतर जलती रहनी चाहिए।
आज मिली यह उपाधि आपके जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा की नई यात्रा का प्रथम चरण है।
जहाँ जाएँ, वहाँ ज्ञान का प्रकाश लेकर जाएँ; जहाँ रहें, वहाँ संस्कारों की सुगंध फैलाएँ; जहाँ अवसर मिले, वहाँ समाज की सेवा करें और जहाँ चुनौती मिले, वहाँ अपने संकल्प और चरित्र से उसका सामना करें।
आपकी प्रतिभा को आकाश मिले, आपके संकल्प को शक्ति मिले, आपके कर्मों को समाज का विश्वास मिले और आपकी उपलब्धियों से उत्तराखण्ड तथा भारत की कीर्ति विश्व पटल पर और अधिक उज्ज्वल हो।
चलते रहिए, सीखते रहिए, सृजन करते रहिए और समाज को प्रकाश देते रहिए।
क्योंकि- “तमसो मा ज्योतिर्गमय।” अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना ही जीवन की सच्ची यात्रा है।
आपके जीवन की यात्रा ज्ञान से सेवा की ओर, संस्कार से चरित्र की ओर और चरित्र से राष्ट्र निर्माण की ओर निरंतर आगे बढ़े-इसी मंगलकामना के साथ आप सभी के उज्ज्वल, यशस्वी और सार्थक भविष्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
एक बार पुनः सभी पदक एवं उपाधि प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं, उनके अभिभावकों, गुरुजनों तथा सम्पूर्ण विश्वविद्यालय परिवार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
जयतु भारतम्!
जयतु उत्तराखण्डम्!
जयतु संस्कृतम्!
जय हिन्द!