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    18-09-2026:महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : सितम्बर 18, 2026

    जय हिन्द!

    मंच पर उपस्थित माननीय कुलगुरु प्रो. शिव शंकर मिश्र जी, पद्मश्री प्रो. भगवती लाल पुरोहित जी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी जी, प्रो. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी जी, प्रो. बालकृष्ण शर्मा जी, प्रो. केदार नारायण जोशी जी, सभी सम्मानित आचार्यगण, विद्वजन, शोधार्थी, प्रिय विद्यार्थियों एवं उपस्थित सभी महानुभावों। आप सभी को मेरा सादर नमस्कार एवं सस्नेह अभिवादन।

    आज उज्जयिनी की इस पावन ज्ञानभूमि पर उपस्थित होकर मैं स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा हूँ। यह भारत की उस महान ज्ञान-परंपरा के सान्निध्य में आने का अवसर है, जिसने हजारों वर्षों से हमारी बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना को दिशा दी है।

    उज्जयिनी की धरती पर इतिहास और वर्तमान एक साथ दिखाई देते हैं। यही वह भूमि है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि सान्दीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की। यही उज्जयिनी सम्राट विक्रमादित्य और राजा भोज जैसी विभूतियों की कर्मभूमि रही है। आचार्य भर्तृहरि की साधना और महाकवि कालिदास की सृजन-परंपरा से भी इस नगरी का गहरा संबंध रहा है। सप्त मोक्षपुरियों में प्रतिष्ठित उज्जयिनी का भारत की ज्ञान-यात्रा में अपना विशिष्ट स्थान है।

    मैं स्वयं मोक्षपुरी हरिद्वार की पावन भूमि से यहाँ आया हूँ। एक ओर माँ गंगा और दूसरी ओर माँ क्षिप्रा। इन दो पुण्य धाराओं के मध्य आज मुझे ऐसा लगता है, जैसे भारत की दो महान ज्ञान-धाराएँ एक-दूसरे का अभिनंदन कर रही हों। यह नदियों का ही नहीं, ज्ञान, साधना और संस्कृति का भी संगम है।

    भारत की सनातन परंपरा ने ज्ञान को कभी केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं माना। हमारे लिए ज्ञान जीवन को देखने की दृष्टि है, सत्य की खोज है और समाज के कल्याण का माध्यम है। हमारे ऋषियों ने कहा है-

    “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।”

    अर्थात् सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ। यह भारत की उदार ज्ञान-दृष्टि है- ज्ञान को ग्रहण करना, उसका मनन करना, उसे आगे बढ़ाना और मानवता के कल्याण के लिए समर्पित करना। यही हमारी ज्ञान-परंपरा की शक्ति रही है।

    इसी महान परंपरा में महर्षि पाणिनि का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। हजारों वर्ष पूर्व उन्होंने संस्कृत भाषा को जिस वैज्ञानिक, तार्किक और व्यवस्थित रूप में समझाया, वह भारत की विलक्षण बौद्धिक क्षमता का प्रमाण है। अष्टाध्यायी भाषा के सूक्ष्म स्वरूप को सूत्रों और नियमों में व्यवस्थित करने वाली एक अद्भुत बौद्धिक रचना है।

    महर्षि पाणिनि की साधना हमें यह संदेश देती है कि ज्ञान की शक्ति उसके संग्रह के साथ-साथ उसकी सुव्यवस्थित अभिव्यक्ति और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसके संचार में भी है। यही कारण है कि आज इस विश्वविद्यालय से ‘कंठेकंठे अष्टाध्यायी’ जैसे अभिनव अभियान का शुभारम्भ विशेष महत्व रखता है।

    मैं इस प्रयास के लिए विश्वविद्यालय को हार्दिक बधाई देता हूँ। अष्टाध्यायी को केवल ग्रंथ और शास्त्र-अध्ययन की सीमा में न रखकर उसे बच्चों, युवाओं और समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाने का यह प्रयास हमारी ज्ञान-परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

    जब ज्ञान पुस्तक से निकलकर कंठ तक पहुँचता है, तो वह जीवंत परंपरा बन जाता है। जब वही परंपरा नई पीढ़ी के जीवन से जुड़ती है, तो वह भविष्य की शक्ति बनती है। इसलिए ‘कंठेकंठे अष्टाध्यायी’ ज्ञान और पीढ़ियों के बीच एक सशक्त सेतु है।

    पाणिनि ने भाषा की जटिलता को सूत्रों और नियमों की स्पष्ट संरचना में प्रस्तुत किया। आज हम ऐसे तकनीकी युग में हैं, जहाँ संरचना, नियम और तार्किकता का विशेष महत्व है। इस दृष्टि से पाणिनि का चिंतन आज भी हमारे लिए प्रासंगिक है।

    यहीं से हमारी दृष्टि आज के युग की ओर जाती है। आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक के युग में हैं। हमारे सामने प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि परंपरा और तकनीक में से किसे चुनें। प्रश्न यह होना चाहिए कि अपनी महान ज्ञान-परंपरा को तकनीक की शक्ति से कितना व्यापक और प्रभावी बनाया जा सकता है।

    संस्कृत की विशाल पाण्डुलिपि-संपदा का डिजिटलीकरण, प्राचीन ग्रंथों का संरक्षण, मंत्रों और श्लोकों के शुद्ध उच्चारण को सुरक्षित रखना, विभिन्न पाठों का तुलनात्मक अध्ययन तथा कठिन ग्रंथों के अर्थ और व्याख्या को नई पीढ़ी तक पहुँचाना- इन क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक और एआई उपयोगी सहायक बन सकती है।

    आचार्य-परंपरा और आधुनिक तकनीक का समन्वय हमारी प्राचीन ज्ञान-संपदा को भविष्य से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। परंपरा हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है और तकनीक उन जड़ों से भविष्य की ओर बढ़ने की शक्ति देती है। जब जड़ें मजबूत हों और दृष्टि भविष्य पर हो, तभी कोई समाज और राष्ट्र आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।

    इसी संदर्भ में ‘ज्ञान भारतम्’ जैसे प्रयास भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारी पाण्डुलिपियाँ केवल पुराने ग्रंथ नहीं हैं। उनमें भारत की स्मृति, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और हजारों वर्षों की सृजनात्मक चेतना सुरक्षित है। इस ज्ञान-संपदा का सर्वेक्षण, संग्रह, संरक्षण और डिजिटलीकरण आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।

    मुझे प्रसन्नता है कि यह विश्वविद्यालय इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। ‘संस्कृत गौरव ग्रंथ व्याख्यान-माला’ के माध्यम से महाभारत, रामायण, अर्थशास्त्र और नाट्यशास्त्र जैसे महान ग्रंथों को जनसामान्य तक पहुँचाने का प्रयास भी इसी सोच का विस्तार है। इन ग्रंथों को हमें केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं, भारतीय चिंतन और जीवन-दृष्टि के स्रोत के रूप में भी देखना चाहिए।

    और ज्ञान-परंपरा केवल ग्रंथों से जीवित नहीं रहती। उसे जीवित रखते हैं- आचार्य।

    आज जिन विद्वानों का सम्मान करने का मुझे सौभाग्य मिला है, उनके प्रति मैं विशेष श्रद्धा व्यक्त करता हूँ। पद्मश्री प्रो. भगवती लाल पुरोहित जी, माननीय कुलगुरु प्रो. शिव शंकर मिश्र जी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी जी, प्रो. केदार नारायण जोशी जी, प्रो. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी जी और प्रो. बालकृष्ण शर्मा जी के ज्ञान, साधना और संस्कृत के प्रति समर्पण को मैं नमन करता हूँ।

    उत्तराखण्ड के समस्त संस्कृत-विद्वानों की ओर से मैं आप सभी के प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करता हूँ। ज्ञान को सुरक्षित रखना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना भी राष्ट्रसेवा है। आपकी साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत है।

    उज्जयिनी की इस ज्ञान-परंपरा से जुड़ते हुए मुझे स्वाभाविक रूप से अपनी देवभूमि उत्तराखण्ड की स्मृति आती है। उत्तराखण्ड देवभूमि है, वीरभूमि है, योगभूमि है, शास्त्रभूमि है और संस्कृतभूमि भी है। वर्ष 2010 में उत्तराखण्ड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इस महनीय कार्य में अनेक संस्कृत साधकों का योगदान रहा है।

    आचार्य श्री दिनेश चन्द्र जोशी जी की संस्कृत-साधना और उनके योगदान का स्मरण इस अवसर पर विशेष रूप से प्रासंगिक है। इस वर्ष उनकी जन्मशताब्दी मनाई जा रही है। यह अवसर हमें संस्कृत के प्रति समर्पित उस साधना-परंपरा को स्मरण करने की प्रेरणा देता है।

    उज्जयिनी और उत्तराखण्ड भले ही भौगोलिक रूप से दूर हों, लेकिन ज्ञान और संस्कृति की दृष्टि से दोनों के बीच गहरा आत्मीय संबंध है। एक ओर हिमालय की गोद में गंगा-यमुना की उद्गमभूमि है और दूसरी ओर क्षिप्रा के तट पर उज्जयिनी की महान ज्ञान-परंपरा।

    मैं आप सभी को उत्तराखण्ड की पावन देवभूमि में आने का आत्मीय निमंत्रण देता हूँ। मुझे विश्वास है कि महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय और दून विश्वविद्यालय के हिन्दू अध्ययन विभाग के बीच प्रस्तावित शैक्षिक एवं अनुसंधान सहयोग को हम आगे बढ़ाएँगे।

    विद्यार्थियों और शोधार्थियों का परस्पर संवाद, संयुक्त शोध तथा आधुनिक तकनीक के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा का व्यापक प्रसार- उज्जयिनी और उत्तराखण्ड की इन दो ज्ञान-धाराओं को एक सार्थक ज्ञान-संगम प्रदान करेगा।

    इस पूरी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र हैं- हमारे युवा।

    मैं अपने युवा साथियों से कहना चाहता हूँ- अपनी जड़ों से जुड़िए, लेकिन अपनी दृष्टि भविष्य पर रखिए। पाणिनि को पढ़िए और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी समझिए। वेद और उपनिषद की ज्ञान-दृष्टि को जानिए और आधुनिक विज्ञान की नई संभावनाओं से भी जुड़िए। तकनीक को अपनाइए, लेकिन अपनी पहचान और अपने संस्कारों को साथ लेकर चलिए।

    जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर बढ़ना ही भारत के युवा की पहचान होनी चाहिए। हमारी विरासत केवल गर्व का विषय न बने; वह आने वाले भारत के निर्माण की शक्ति बने।

    हमारी सनातन संस्कृति ने हमें एक व्यापक दृष्टि दी है-

    “वसुधैव कुटुम्बकम्।”

    सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है। भारत का ज्ञान केवल भारत तक सीमित न रहे, बल्कि मानवता के कल्याण का माध्यम बने- यही हमारी ज्ञान-परंपरा का व्यापक संदेश है।

    आइए, महर्षि पाणिनि की इस पुण्यभूमि से हम संकल्प लें कि हमारी सनातन ज्ञान-परंपरा आधुनिक तकनीक की शक्ति के साथ आगे बढ़ेगी। संस्कृत जन-जन तक पहुँचेगी। हमारे प्राचीन ग्रंथ नई पीढ़ी से संवाद करेंगे। हमारे आचार्य ज्ञान की ज्योति जलाते रहेंगे और हमारे युवा उस ज्योति को भविष्य की दिशा देंगे।

    “ज्ञानं परमं बलम्।”

    ज्ञान हमारी शक्ति है, संस्कृत हमारी विरासत है, भारतीय ज्ञान-परंपरा हमारी पहचान है और यही ज्ञान-शक्ति विकसित भारत के निर्माण की आधारशिला बन सकती है।

    इसी विश्वास के साथ मैं महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के माननीय कुलगुरु जी, समस्त आचार्यों, विद्वज्जनों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    वन्दे मातरम्!
    भारत माता की जय!
    जय हिन्द!