15-09-2026:‘आत्मा के स्वर’ सहित 04 पुस्तकों तथा डिजिटल ऐप के विमोचन समारोह में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन
जय हिन्द!
लोक भवन में आज का यह अवसर मेरे लिए अत्यंत विशेष और भावुक है। यह केवल पुस्तकों और डिजिटल ऐप के विमोचन का समारोह नहीं है, बल्कि पाँच वर्षों की उस यात्रा को स्मरण करने और उसे शब्दों, विचारों तथा अनुभवों के रूप में आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का अवसर है।
हमारी सनातन दृष्टि ने इस विराट ब्रह्मांड को एक चेतना से जुड़ा माना है। हिमालय की ऊँचाई और गंगा की निर्मल धारा हमें निरंतर आगे बढ़ने, अपने कर्तव्य को पहचानने और स्वयं से बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देती है।
15 सितम्बर, 2021 को मैंने देवभूमि उत्तराखण्ड के राज्यपाल के रूप में दायित्व संभाला था। आज 15 सितम्बर, 2026 को इस दायित्व के पाँच वर्ष पूर्ण हो गए हैं।
इन पाँच वर्षों को मैं केवल समय की अवधि के रूप में नहीं देखता। यह उत्तराखण्ड को जानने, समझने और इस देवभूमि की सेवा करने की एक आत्मीय यात्रा रही है। इस यात्रा में मैंने हिमालय में धैर्य, गंगा में निरंतरता, मातृशक्ति में सामथ्र्य, सैनिक परिवारों में राष्ट्रभक्ति और युवाओं की आँखों में नए उत्तराखण्ड का स्वप्न देखा है।
इस अवसर पर मैं आदरणीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी के स्नेह, मार्गदर्शन और आत्मीय सहयोग के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। उनका उत्तराखण्ड के प्रति विशेष स्नेह रहा है और उनका सानिध्य मेरे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहा है।
मैं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के मार्गदर्शन और सहयोग के लिए भी विशेष रूप से कृतज्ञ हूँ। उत्तराखण्ड के प्रति उनका आत्मीय जुड़ाव और विकास की स्पष्ट दृष्टि हम सभी के लिए प्रेरणा है। उनका विश्वास कि “21वीं सदी का तीसरा दशक उत्तराखण्ड का दशक होगा”, मेरे लिए केवल प्रेरक कथन नहीं, बल्कि इस देवभूमि के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण है।
मैं उत्तराखण्ड की जनता के प्रति भी हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। यहाँ की माताओं-बहनों ने अपनापन दिया, युवाओं ने ऊर्जा दी, सैनिक परिवारों ने राष्ट्रभक्ति का विश्वास दिया और किसानों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, उद्यमियों तथा समाज के हर वर्ग ने अपने अनुभवों से मुझे समृद्ध किया। राज्य सरकार, शासन-प्रशासन, लोक भवन परिवार और सभी सहयोगियों का भी मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
आज का यह अवसर इसलिए भी विशेष है कि पाँच वर्षों के विचार, अनुभव और संकल्प पुस्तकों तथा डिजिटल माध्यम के रूप में हमारे सामने हैं।
दस्तावेजीकरण केवल अतीत को सुरक्षित रखना नहीं है; यह अनुभवों को स्मृति, विचारों को दिशा और आने वाली पीढ़ियों को भविष्य की राह देने का माध्यम है।
मेरे पाँच वर्षों के कार्यकाल में लोक भवन और विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रकाशित 113 पुस्तकें केवल बीते वर्षों की स्मृतियाँ नहीं हैं; ये विचारों, अनुभवों और संकल्पों की ऐसी जीवंत धरोहर हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा और प्रेरणा देती रहेंगी।
आज प्रस्तुत पुस्तकों में मेरे लिए सबसे अधिक आत्मीय है- “आत्मा के स्वर” – पाँचवाँ खंड।
पाँच वर्षों में विभिन्न अवसरों पर मैंने जो विचार व्यक्त किए, जिन विषयों पर चिंतन किया और जिन संकल्पों को समाज के सामने रखा, वे “आत्मा के स्वर” के विभिन्न खंडों में संजोए गए हैं।
मेरे लिए “आत्मा के स्वर” केवल भाषणों का संकलन नहीं है। इन पृष्ठों में पाँच वर्षों की वह यात्रा धड़कती है, जिसमें मैंने उत्तराखण्ड के गाँवों को देखा, युवाओं से संवाद किया, मातृशक्ति का सामथ्र्य महसूस किया, सैनिक परिवारों की राष्ट्रभक्ति को नमन किया और इस देवभूमि की संस्कृति तथा प्रकृति को निकट से जाना।
इसलिए “आत्मा के स्वर” मेरे लिए शब्दों की पुस्तक नहीं, भावों की यात्रा है। यह मेरे और उत्तराखण्ड के बीच बने उस आत्मीय रिश्ते की स्मृति है, जिसे मैंने इन पाँच वर्षों में हृदय से जिया है।
“21वीं सदीः चुनौतियाँ और अवसर” हमें भविष्य की ओर देखने की दृष्टि देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नई तकनीक, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और बदलती वैश्विक परिस्थितियाँ नई चुनौतियाँ सामने ला रही हैं। हमें इनसे भयभीत नहीं होना है; ज्ञान, नवाचार और युवा शक्ति से समाधान तलाशने हैं।
“विकसित भारत /2047ः आत्मनिर्भर, समावेशी और सतत राष्ट्र निर्माण के बढ़ते कदम” हमें उस राष्ट्रीय संकल्प से जोड़ती है, जिसका लक्ष्य 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है। 2047 केवल एक वर्ष नहीं, ऐसे भारत की कल्पना है जो आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर, ज्ञान-विज्ञान में अग्रणी, सामाजिक रूप से समावेशी और प्रकृति के प्रति संवेदनशील हो।
मेरा विश्वास है कि विकसित भारत की यात्रा में उत्तराखण्ड अपनी विशिष्ट सामथ्र्य के साथ अग्रणी भूमिका निभा सकता है। इसी विश्वास की उत्तराखण्ड-केंद्रित अभिव्यक्ति है- “विकसित उत्तराखण्डः माननीय राज्यपाल महोदय के पंच स्वप्न और संकल्प”।
उत्तराखण्ड के भविष्य को लेकर मैंने पाँच क्षेत्रों को विशेष महत्त्व दिया है- रिवर्स पलायन, महिला सशक्तीकरण, स्थानीय उत्पाद एवं पारंपरिक फसलें, योग-आयुर्वेद- वेलनेस एवं प्राकृतिक चिकित्सा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीक।
इन पाँचों के केंद्र में एक ही विचार है- ऐसा विकास जो व्यक्ति को अवसर दे, गाँव को मजबूत करे, प्रकृति को सुरक्षित रखे और उत्तराखण्ड को आत्मनिर्भर बनाए।
हम चाहते हैं कि पहाड़ का युवा रोजगार के लिए बाहर जाने को विवश न हो, बल्कि अपने गाँव में अवसर पाए और अवसर पैदा करे। हमारी बेटियाँ शिक्षा, उद्यम और नेतृत्व में आगे बढ़ें। हमारी पारंपरिक फसलें और स्थानीय उत्पाद अर्थव्यवस्था की नई शक्ति बनें। योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा उत्तराखण्ड को विश्व के कल्याण मानचित्र पर नई पहचान दें। हमारी युवा प्रतिभा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीक के क्षेत्र में देश का नेतृत्व करे।
इन पुस्तकों के साथ आज मेरे पाँच वर्षों के कार्यकाल पर आधारित डिजिटल ऐप का विमोचन भी हो रहा है। यह मेरे कार्यों, कार्यक्रमों और विचारों को डिजिटल माध्यम से समाज और विशेषकर युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है।
मुझे प्रसन्नता है कि आज शब्द, विचार, अनुभव और तकनीक एक साथ हमारे सामने हैं।
मैं उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति, विश्वविद्यालय के सभी शिक्षकों, शोधार्थियों और पूरी टीम को हार्दिक बधाई देता हूँ। आपने इन विचारों और अनुभवों को पुस्तकों तथा डिजिटल माध्यम में संरक्षित कर उन्हें व्यापक समाज तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
लेकिन आज का अवसर केवल पाँच वर्षों का स्मरण करने का नहीं है। यह भविष्य के उत्तराखण्ड का संकल्प लेने का अवसर भी है।
हमें ऐसा उत्तराखण्ड बनाना है जहाँ पलायन मजबूरी नहीं, लौटना संभावना बने; महिला शक्ति केवल सहभागी नहीं, नेतृत्वकर्ता बने; युवा रोजगार खोजने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बने; हमारी पारंपरिक पहचान आधुनिक अर्थव्यवस्था की शक्ति बने; प्रकृति विकास की कीमत न चुकाए; और शिक्षा ज्ञान के साथ कौशल, चरित्र और राष्ट्रबोध का निर्माण करे।
हमारे विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के केंद्र बनें। उत्तराखण्ड की चुनौतियों के समाधान यहीं से निकलें और यहाँ का ज्ञान देश-दुनिया के लिए उपयोगी बने- यही हमारी दिशा होनी चाहिए।
मेरे लिए राज्यपाल का पद केवल एक संवैधानिक दायित्व नहीं रहा; यह देवभूमि की सेवा, यहाँ के लोगों से जुड़ने और इस पवित्र भूमि के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने का सौभाग्य रहा है।
आज पाँच वर्ष पूरे होने पर पीछे देखता हूँ, तो मन में उपलब्धियों से अधिक कृतज्ञता का भाव है। उत्तराखण्ड ने मुझे अपनापन, विश्वास, स्नेह और सेवा का अवसर दिया है। इस प्रेम का ऋण शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है। पाँच वर्ष पूरे हुए हैं, सेवा का संकल्प नहीं। एक पड़ाव आया है, लेकिन उत्तराखण्ड के उज्ज्वल भविष्य की यात्रा निरंतर जारी है।
हिमालय सिखाता है कि लक्ष्य कितना भी ऊँचा हो, कदम निरंतर बढ़ते रहने चाहिए। गंगा सिखाती है कि सेवा का प्रवाह कभी रुकना नहीं चाहिए। और देवभूमि सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता अपने से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए जीने में है।
आइए, इन्हीं प्रेरणाओं को अपने जीवन का आधार बनाएं-
हमारी सोच हिमालय जैसी ऊँची हो, हमारी चेतना गंगा जैसी निर्मल हो, हमारा कर्म राष्ट्रहित से जुड़ा हो, और हमारी सेवा की भावना देवभूमि जैसी पवित्र हो।
आज मेरा संकल्प है कि उत्तराखण्ड केवल विकास की गति में आगे न बढ़े, बल्कि विकास की ऐसी मिसाल बने, जिसमें हिमालय की ऊँचाई, गंगा की निर्मलता, हमारी संस्कृति की गहराई और युवाओं के सपनों की उड़ान- सब साथ दिखाई दें।
ऐसा उत्तराखण्ड जहाँ पहाड़ों से पलायन नहीं, प्रतिभा का प्रवाह हो; हमारी बेटियाँ नेतृत्व करें; हमारे युवा नए अवसरों का सृजन करें; हमारे गाँव समृद्ध और आत्मनिर्भर बनें; हमारी परंपराएँ नए भारत की शक्ति बनें; और हमारी प्रकृति विकास की आधारशिला बने।
हम ऐसा उत्तराखण्ड बनाएँ, जहाँ विकास और विरासत एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हों। मेरा विश्वास है- सशक्त उत्तराखण्ड ही विकसित भारत की शक्ति बनेगा।
इसी विश्वास के साथ, इसी देवभूमि को साक्षी मानकर, मैं अपने संकल्प को दोहराता हूँ-
इन पाँच वर्षों में देवभूमि उत्तराखण्ड की सेवा का जो अवसर मुझे मिला, वह मेरे जीवन की अमूल्य निधि है। उत्तराखण्ड की सेवा में मेरा हर प्रयास समर्पित रहेगा, राष्ट्र निर्माण में इस देवभूमि की भूमिका और मजबूत होगी, और आने वाली पीढ़ियों के लिए हम ऐसा उत्तराखण्ड छोड़कर जाएंगे, जिस पर वे गर्व कर सकें।
वंदे मातरम्! जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!