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    14-09-2026 : “यात्रा: दुःख से आनन्द की ओर” ग्रन्थ लोकार्पण समारोह में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : सितम्बर 14, 2026

    जय हिन्द!

    मंच पर विराजमान पूज्य संत-महात्मागण, डॉ. कृष्ण अवतार जी, विशिष्ट अतिथिगण, चिकित्सा एवं शिक्षा जगत से जुड़े विद्वज्जन, साहित्य-प्रेमी, पत्रकार बंधु तथा उपस्थित देवियों और सज्जनों! आप सभी को मेरा सादर अभिवादन।

    आज का अवसर अपने आप में विशेष है। आज श्री गणेश चतुर्थी का पावन पर्व है। आज हिन्दी दिवस है। और आज इसी लोक भवन में ऐसे ग्रन्थ का लोकार्पण हो रहा है, जो मनुष्य के एक बहुत गहरे प्रश्न से संवाद करता है-दुःख क्या है और उससे आनन्द तक कैसे पहुँचा जाए? मुझे लगता है, यह केवल संयोग नहीं, एक सुंदर संकेत है।

    डॉ. कृष्ण अवतार जी को मैं इस सार्थक सृजन के लिए हृदय से बधाई देता हूँ। एक वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट के रूप में उन्होंने तीन दशकों से अधिक समय तक मनुष्य की पीड़ा को बहुत निकट से देखा है। उन्होंने दुःख को केवल पुस्तकों में नहीं पढ़ा, बल्कि रोगी की शय्या के पास, उसकी आँखों में और उसके परिवार की चिंता में अनुभव किया है।

    आज हिन्दी दिवस पर इस ग्रन्थ का लोकार्पण इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह हिन्दी की सामर्थ्य को सामने लाता है। जब चिकित्सा-विज्ञान से जुड़े गंभीर विषयों पर पाँच सौ पृष्ठों का ग्रन्थ हिन्दी में लिखा जाता है, तो यह सिद्ध होता है कि हिन्दी ज्ञान, विज्ञान, चिन्तन और दर्शन की भी समर्थ भाषा है। इसी विचार को अंग्रेजी संस्करण के माध्यम से व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास भी हुआ है।

    मित्रों,

    इस पुस्तक का शीर्षक ही “यात्रा: दुःख से आनन्द की ओर” अपने आप में एक दर्शन है।

    हम सभी दुःख से बचना चाहते हैं। लेकिन जीवन में दुःख से पूरी तरह बच पाना संभव नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि दुःख हमारे जीवन को तोड़ेगा या हमें भीतर से मजबूत बनाएगा।

    इस ग्रन्थ का मूल विचार बहुत गहरा है-

    “दुःख तुम्हारा शत्रु नहीं है। वह उस आनन्द की पुकार है, जो तुम्हारे भीतर सदा से था।”

    यदि दुःख को शत्रु मानेंगे, तो जीवन से लड़ते रहेंगे। यदि उसे समझने का प्रयास करेंगे, तो वही अनुभव हमें अपने भीतर देखने की प्रेरणा दे सकता है।

    मेरे सैन्य जीवन ने मुझे यह सिखाया है कि कठिन परिस्थिति हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होती, लेकिन उस परिस्थिति में हमारा मनोबल, हमारा धैर्य और हमारा संकल्प हमारे हाथ में होता है।

    जीवन भी हमें यही सीख देता है। चुनौती से बचना हमेशा संभव नहीं, लेकिन चुनौती के सामने हमारा दृष्टिकोण और हमारा साहस हमारे हाथ में होता है।

    इसीलिए सुख और दुःख के बीच संतुलन बनाए रखना कमजोरी नहीं, आंतरिक शक्ति का परिचायक है।

    श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

    “यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
    समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥”

    अर्थात् सुख और दुःख में जो विचलित नहीं होता, वही धैर्यवान है। समत्व ही भीतर की शक्ति है।

    हमारी भारतीय ज्ञान-परम्परा भी दुःख को जीवन की सच्चाई मानकर उससे ऊपर उठने का मार्ग दिखाती है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु नानक देव जी कहते हैं-

    “नानक दुखीआ सभु संसारु॥”

    अर्थात् दुःख जीवन का हिस्सा है। इसलिए उससे भागने के बजाय उसे समझना और उससे सीखना आवश्यक है।

    यही इस ग्रन्थ की मूल भावना है-दुःख को समझते हुए आनन्द की ओर बढ़ना।

    डॉ. कृष्ण अवतार जी ने चिकित्सा-विज्ञान के अनुभव और आध्यात्मिक साधना को एक साथ देखने का प्रयास किया है। यह ग्रन्थ शास्त्र, विज्ञान और अनुभव-इन तीनों के प्रकाश में दुःख से आनन्द की ओर जाने की राह तलाशता है।

    मैं युवा चिकित्सकों और चिकित्सा विद्यार्थियों से विशेष रूप से कहना चाहूँगा- “रोग का उपचार करना विज्ञान है; रोगी का उपचार करना कला है।”

    आपके सामने केवल एक बीमारी नहीं होती; एक पूरा जीवन होता है। एक परिवार की आशा होती है। इसलिए चिकित्सा में ज्ञान के साथ करुणा भी आवश्यक है। विज्ञान उपचार की शक्ति देता है, लेकिन संवेदना उपचार को मानवीय बनाती है।

    आज विज्ञान और तकनीक तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। मस्तिष्क-विज्ञान नई संभावनाएँ खोल रहा है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक उपचार में सहायता कर सकती है, मनुष्य की करुणा का स्थान नहीं ले सकती।

    मित्रों,

    इस ग्रन्थ का उत्तराखण्ड की धरती से निकलना भी हमारे लिए विशेष गौरव का विषय है।

    यह गंगा और यमुना की उद्गम भूमि है। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की भूमि है। हेमकुण्ड साहिब, नानकमत्ता और रीठा साहिब जैसी पवित्र परम्पराओं की भूमि है। स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ और अनेक संत-महापुरुषों ने यहाँ साधना की है।

    इसलिए उत्तराखण्ड को केवल पर्यटन की भूमि के रूप में नहीं, बल्कि चिन्तन, योग, अध्यात्म और आत्मबोध की भूमि के रूप में भी पहचान मिलनी चाहिए।

    मेरा विश्वास है कि विकास के साथ ज्ञान और चिन्तन का विस्तार भी आवश्यक है। ऐसे सृजन उत्तराखण्ड की इसी पहचान को और मजबूत करते हैं।

    आज “यात्रा सृजन सम्मान 2026” से सम्मानित होने वाले सभी महानुभावों को भी मैं हार्दिक बधाई देता हूँ।

    किसी भी बड़े सृजन के पीछे अनेक ऐसे सहयोगी हाथ होते हैं, जो सामने दिखाई नहीं देते। उनका सम्मान उस सामूहिक साधना का सम्मान है।

    डॉ. कृष्ण अवतार जी,

    एक चिकित्सक के रूप में आपने जीवन बचाने का कार्य किया है। अब एक लेखक के रूप में आप जीवन को समझने और उसे नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं।

    मेरी कामना है कि यह ग्रन्थ केवल पुस्तकालयों की शोभा न बने। यह उस व्यक्ति तक पहुँचे, जो बीमारी, असफलता, अकेलेपन या गहरे दुःख से गुजर रहा है।

    उसे यह विश्वास मिले-

    दुःख अंतिम पड़ाव नहीं है। कठिनाई जीवन का अंत नहीं है। अंधकार के भीतर भी प्रकाश की राह होती है।

    आइए, आज हम संकल्प लें-

    दुःख से भागेंगे नहीं, उसे समझेंगे। कठिनाइयों से टूटेंगे नहीं, उनसे सीखेंगे। विज्ञान को अपनाएँगे, संवेदना को साथ रखेंगे। और अपने भीतर के प्रकाश को कभी बुझने नहीं देंगे।

    यही जीवन की यात्रा है-

    दुःख से आनन्द की ओर। निराशा से आशा की ओर। अंधकार से प्रकाश की ओर। और स्वयं से स्वयं की पहचान की ओर।

    श्री गणेश चतुर्थी के इस पावन अवसर पर मेरी प्रार्थना है कि विघ्नहर्ता भगवान गणेश इस ग्रन्थ की यात्रा के सभी विघ्न दूर करें और यह सृजन जन-जन तक पहुँचे।

    डॉ. कृष्ण अवतार जी को इस सार्थक सृजन के लिए पुनः हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    आप सभी को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जय हिन्द!
    जय उत्तराखण्ड!