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    02-09-2026 : एकीकृत चिकित्सा संगोष्ठी में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : सितम्बर 2, 2026

    एकीकृत चिकित्सा संगोष्ठी में माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    (तिथिः 02 सितम्बर, 2026)

    जय हिन्द!

    भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री, माननीय श्री प्रतापराव जाधव जी, उत्तराखण्ड के माननीय चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्री सुबोध उनियाल जी, पूज्य स्वामी रामदेव जी, देश-विदेश से पधारे चिकित्सा विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, चिकित्सकों, विश्वविद्यालयों के कुलपतिगण, चिकित्सा संस्थानों के प्रतिनिधिगण तथा उपस्थित सभी प्रबुद्धजन! लोक भवन में आप सभी का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन करता हूँ।

    भारत की सनातन संस्कृति ने स्वास्थ्य को केवल रोग से मुक्ति नहीं माना, बल्कि स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और संतुलित जीवन को मानव कल्याण का आधार माना है। हमारी प्राचीन प्रार्थना में इसी व्यापक भावना का दर्शन होता है-
    “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।”
    सभी सुखी हों, सभी निरोग हों और किसी को दुःख का भागी न बनना पड़े- यही हमारी चिकित्सा-दृष्टि का मूल भाव रहा है।

    आयुर्वेद ने शरीर, मन और जीवन-पद्धति के संतुलन को महत्व दिया। योग ने शरीर के साथ मन और चेतना के संतुलन का मार्ग दिखाया। प्रकृति के साथ सामंजस्य, संयमित आहार और अनुशासित जीवन हमारी परंपरा का हिस्सा रहे हैं। आज की यह संगोष्ठी उसी महान ज्ञान-परंपरा को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और तकनीक की शक्ति से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है।

    आज हुए व्यापक विमर्श के बाद मेरा विश्वास और दृढ़ हुआ है कि हमें चिकित्सा पद्धतियों के बीच श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा नहीं, रोगी के हित में सहयोग की संस्कृति विकसित करनी है। हमारी चिकित्सा पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, उनके दृष्टिकोण अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा केंद्र एक ही है- मनुष्य और उसका स्वास्थ्य।

    एकीकृत चिकित्सा का वास्तविक अर्थ भी यही है कि आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद, योग और अन्य प्रमाणित प्रणालियों की उपयोगी क्षमताओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़कर रोगी को अधिक समग्र और सुरक्षित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई जाए। चिकित्सा की अंतिम कसौटी किसी पद्धति की प्रतिष्ठा नहीं, रोगी का स्वास्थ्य, उसकी सुरक्षा और उसके जीवन की गुणवत्ता है।

    साथियों,

    आज स्वास्थ्य की चुनौतियाँ भी बदल रही हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी रोग, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ तेजी से हमारे सामने आ रही हैं। इनमें से अनेक समस्याएँ हमारी जीवनशैली से भी जुड़ी हैं।

    इसलिए हमें बीमारी का इंतजार करने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था से आगे बढ़कर बीमारी की रोकथाम और स्वस्थ जीवन की संस्कृति विकसित करनी होगी। स्वस्थ आहार, योग, नियमित शारीरिक सक्रियता, मानसिक संतुलन, पर्याप्त नींद, समय पर स्वास्थ्य-जाँच और प्रारंभिक पहचान। ये सभी स्वास्थ्य सेवा के महत्वपूर्ण अंग बनने चाहिए।

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था भी इसी व्यापक दृष्टि के साथ आगे बढ़ रही है। आयुष्मान भारत ने स्वास्थ्य सुरक्षा को व्यापक बनाया है और आयुष्मान आरोग्य मंदिर के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के निकट ले जाने पर बल दिया गया है। भारतीय चिकित्सा परंपराओं और योग को भी व्यापक स्वास्थ्य-दृष्टि से जोड़ने का प्रयास हो रहा है।

    यह हमें एक स्पष्ट दिशा देता है- स्वास्थ्य सेवा केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह सकती; उसे घर, परिवार और समुदाय तक पहुँचना होगा। लेकिन इस यात्रा में एक संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। हमारी परंपरा हमारी शक्ति है और विज्ञान उसकी विश्वसनीयता का आधार।

    हमें अपने पारंपरिक ज्ञान पर गर्व है, लेकिन उसे आधुनिक अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता मानकों और उचित नियमन से जोड़ना भी हमारी जिम्मेदारी है। जो प्रभावी है, उसे शोध से प्रमाणित करें, जो सुरक्षित है, उसे गुणवत्ता की कसौटी पर परखें, और जो रोगी के लिए उपयोगी है, उसे जिम्मेदारी के साथ स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुँचाएँ।

    आस्था का सम्मान हो, पर चिकित्सा में रोगी की सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रमाण सर्वाेच्च रहें। यही संतुलन हमारी विरासत को भविष्य की शक्ति बनाएगा। और इस दिशा में उत्तराखण्ड के पास असाधारण संभावनाएँ हैं।

    यह देवभूमि है। हिमालय की भूमि है। योग और अध्यात्म की भूमि है। आयुर्वेद और औषधीय वनस्पतियों की समृद्ध परंपरा यहाँ की पहचान है। हमारी जैव-विविधता और प्राकृतिक संपदा हमें एक अनूठी प्रयोगशाला प्रदान करती है। लेकिन अब समय है कि हम अपनी विरासत को केवल गौरव का विषय न रहने दें, बल्कि उसे अनुसंधान, नवाचार और जन-स्वास्थ्य की शक्ति में बदलें।

    हमारी विरासत हमें पहचान देती है, लेकिन हमारा अनुसंधान उस पहचान को विश्वसनीयता देगा। हमारे विश्वविद्यालय और चिकित्सा संस्थान एकीकृत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अंतर-विषयक अनुसंधान को बढ़ावा दें। आयुर्वेद, आधुनिक चिकित्सा, योग, पोषण, औषधीय वनस्पति, जैव-विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल स्वास्थ्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विशेषज्ञ मिलकर काम करें।

    वन यूनिवर्सिटी-वन रिसर्च की भावना के अनुरूप हमारे विश्वविद्यालय उत्तराखण्ड की विशिष्ट स्वास्थ्य चुनौतियों को अपने शोध का केंद्र बना सकते हैं। हिमालयी औषधीय पौधों से लेकर पर्वतीय जीवनशैली, योग और मानसिक स्वास्थ्य तथा मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसे जीवनशैली संबंधी रोगों की रोकथाम तक-हमें ऐसे शोध की आवश्यकता है, जिसका लाभ प्रयोगशाला से निकलकर समाज तक पहुँचे। शोध-पत्र तभी सार्थक है, जब उसका परिणाम किसी व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाए।

    उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियाँ हमें एक और बड़ी जिम्मेदारी देती हैं। दूरस्थ गाँव, ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को चुनौती देती हैं। हमारे लिए स्वास्थ्य की वास्तविक कसौटी केवल देहरादून का आधुनिक अस्पताल नहीं है। हमारी असली कसौटी वह दूरस्थ पहाड़ी गाँव है, जहाँ आज भी विशेषज्ञ चिकित्सा तक पहुँच कठिन है।

    यहीं तकनीक परिवर्तन ला सकती है। टेलीमेडिसिन, डिजिटल स्वास्थ्य, आधुनिक निदान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विवेकपूर्ण उपयोग से हम विशेषज्ञता को पहाड़ों तक पहुँचा सकते हैं। जिस दिन पहाड़ के किसी दूरस्थ गाँव का नागरिक समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा सलाह प्राप्त कर सकेगा, उस दिन तकनीक की वास्तविक शक्ति दिखाई देगी।

    आज एचएनबी उत्तराखण्ड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय, आयुष मंत्रालय और आईसीएमआर के बीच सहयोग की दिशा में हुआ महत्वपूर्ण कदम इसी संभावना को नई गति दे सकता है।

    मेरी अपेक्षा है कि यह समझौता केवल एक दस्तावेज बनकर न रहे। यह शोध का मिशन बने। यह नवाचार का मिशन बने। यह युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को अवसर देने का मिशन बने। और यह उत्तराखण्ड के प्रत्येक नागरिक तक बेहतर स्वास्थ्य पहुँचाने का मिशन बने।

    मेरे मानना है कि कोई भी बड़ा लक्ष्य केवल संसाधनों से प्राप्त नहीं होता। उसके लिए स्पष्ट उद्देश्य, अनुशासन, समन्वय और टीम भावना आवश्यक होती है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हमें इसी मिशन भावना के साथ आगे बढ़ना होगा। सरकार दिशा दे, विश्वविद्यालय ज्ञान और शोध की शक्ति दें, वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध कराएँ, चिकित्सक अपने अनुभव से योगदान दें, तकनीकी संस्थान नवाचार को गति दें और समाज स्वस्थ जीवनशैली को अपनाए।

    भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन लक्ष्य एक होना चाहिए- स्वस्थ नागरिक और स्वस्थ समाज। और इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में हमेशा रोगी होना चाहिए। रोगी किसी पद्धति का नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है। उसकी सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। उसका विश्वास हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। और उसके चेहरे पर लौटती स्वास्थ्य की मुस्कान हमारी सफलता की सबसे बड़ी पहचान है।

    मेरा विश्वास है कि हिमालय की इस धरती से हम ऐसा स्वास्थ्य मॉडल विकसित कर सकते हैं, जिसमें सनातन ज्ञान-परंपरा, आधुनिक विज्ञान, अत्याधुनिक तकनीक और मानवीय संवेदना एक साथ दिखाई दें।

    आइए, आज इस देवभूमि से एक नया संकल्प लें- हम अपनी समृद्ध चिकित्सा परंपरा को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और अत्याधुनिक तकनीक की शक्ति से जोड़कर उत्तराखण्ड को साक्ष्य-आधारित एकीकृत स्वास्थ्य सेवा, अनुसंधान और नवाचार का अग्रणी केंद्र बनाएँगे।

    हिमालय की इस धरती से ऐसा स्वास्थ्य मॉडल विकसित करेंगे, जो देश के लिए उदाहरण बने, देश को नई दिशा दे और विश्व को भारत की समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि से परिचित कराए। क्योंकि- स्वस्थ नागरिक हमारी शक्ति हैं, सशक्त समाज हमारी पहचान है, समर्थ उत्तराखण्ड हमारा संकल्प है, और विकसित भारत हमारा लक्ष्य है।

    आइए, ज्ञान को प्रमाण से जोड़ें, प्रमाण को नीति से जोड़ें, नीति को सेवा से जोड़ें और सेवा को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाएँ। यही मानवता की सच्ची सेवा है। यही स्वस्थ भारत का संकल्प है। यही स्वस्थ उत्तराखण्ड की दिशा है। और यही विकसित भारत के निर्माण में हमारा योगदान है।

    इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी के आयोजन के लिए एचएनबी उत्तराखण्ड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय तथा सभी सहयोगी संस्थानों को हार्दिक बधाई देता हूँ। देश-विदेश से आए सभी विशेषज्ञों, चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों को शुभकामनाएँ देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।

    जय हिन्द!