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    20-08-2026:लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में आईएएस प्रशिक्षुओं को माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अगस्त 20, 2026

    (तिथिः 20 अगस्त, 2026)

    जय हिन्द!

    माननीय उपराष्ट्रपति जी, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक महोदय, सम्मानित संकाय सदस्यगण, गणमान्य अतिथिगण और मेरे युवा अधिकारी प्रशिक्षुओं,

    आप सभी को मेरा सादर अभिवादन।

    आज इस ऐतिहासिक अकादमी में आपके बीच उपस्थित होना मेरे लिए गौरव का विषय है। 2024 बैच के सभी अधिकारी प्रशिक्षुओं को अपना व्यावसायिक प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर हार्दिक बधाई और आपके उज्ज्वल, सार्थक तथा राष्ट्रसेवा को समर्पित सेवाकाल के लिए मेरी शुभकामनाएँ।

    माननीय उपराष्ट्रपति जी, आपकी गरिमामयी उपस्थिति ने इस अवसर को हमारे लिए और अधिक विशेष बना दिया है। मैं इस अवसर पर आपका हृदय से स्वागत और अभिनंदन करता हूँ।

    मेरे युवा साथियों,

    आज आपके जीवन में एक अध्याय पूरा हो रहा है, लेकिन आपकी सबसे महत्वपूर्ण यात्रा अब शुरू हो रही है।

    इस अकादमी ने आपको प्रशासन का ज्ञान, कौशल और दृष्टि दी है। अब आपकी परीक्षा इस बात की होगी कि आप इस ज्ञान को कितनी संवेदनशीलता, निष्ठा और साहस के साथ लोकहित में बदलते हैं। मुझे विश्वास है कि आप इस कसौटी पर खरे उतरेंगे और अपने ज्ञान को जनसेवा की शक्ति, अपने अधिकार को जनविश्वास और अपने दायित्व को राष्ट्रसेवा के संकल्प में बदलेंगे।

    आप जिस सेवा में प्रवेश कर रहे हैं, वह केवल एक प्रतिष्ठित करियर नहीं है। यह संविधान, लोकतंत्र और करोड़ों नागरिकों के विश्वास की जिम्मेदारी है। आपकी मेज पर रखी एक फाइल के पीछे किसी नागरिक की आशा हो सकती है, आपका एक निर्णय किसी परिवार के भविष्य को प्रभावित कर सकता है और आपकी एक संवेदनशील पहल किसी दूरस्थ क्षेत्र में नया विश्वास जगा सकती है।

    इसलिए सदैव याद रखिए- आपके पद की वास्तविक शक्ति आपके अधिकार में नहीं, उस विश्वास में है जो राष्ट्र आपको सौंपता है।

    प्रशासन की असली कसौटी तब सामने आती है, जब परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं होतीं- जानकारी सीमित हो, समय कम हो और निर्णय का प्रभाव व्यापक हो। ऐसे समय में नियम आपका मार्गदर्शन करेंगे और अनुभव आपकी सहायता करेगा, लेकिन अंततः आपका विवेक, निष्पक्षता और दूरदृष्टि ही आपको सही निर्णय तक पहुँचाएगी।

    अपने सैन्य जीवन से एक अनुभव आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। वर्दी हो या सिविल सेवा का दायित्व- राष्ट्रसेवा का मूल भाव एक ही है। कठिन परिस्थिति में व्यक्ति अपने पद के पीछे नहीं छिप सकता, उसे आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेनी होती है। कई बार सही निर्णय आसान या लोकप्रिय नहीं होता, लेकिन राष्ट्रहित में आवश्यक होता है। ऐसे समय में साहस केवल निर्णय लेने में नहीं, बल्कि सही निर्णय पर दृढ़ रहने में होता है।

    मेरे युवा साथियों,

    भारत आज परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए हमें नीतियों के साथ-साथ जमीनी हकीकत और नागरिकों की आकांक्षाओं को समझना होगा।

    भारत को केवल आंकड़ों में नहीं, उसके गांवों, कस्बों, शहरों और सामान्य नागरिक के जीवन में देखिए। फाइलें आपको तथ्य देंगी, लेकिन फील्ड आपको वास्तविकता से परिचित कराएगा। लोगों के बीच जाइए, उनकी बात सुनिए और उनकी कठिनाइयों को समझिए। प्रशासन का पहला धर्म है- जनता की बात सुनना और उसके विश्वास को बनाए रखना।

    लोकतंत्र में निर्वाचित जनप्रतिनिधि और स्थायी सिविल सेवा अपनी-अपनी भूमिका में राष्ट्रसेवा के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। आपकी जिम्मेदारी है- निष्पक्ष, तथ्यपूर्ण और निर्भीक सलाह देना तथा लिए गए निर्णयों को पूरी निष्ठा और दक्षता से लागू करना। भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है- जनहित और राष्ट्रहित। संवैधानिक दायित्वों की समझ, संस्थागत मर्यादा और परस्पर विश्वास ही सुशासन की आधारशिला हैं।

    इसीलिए अपने सेवाकाल में केवल योजनाएँ पूरी करने की बजाय संस्थाओं को मजबूत बनाइए। जहाँ भी काम करें, वहाँ बेहतर व्यवस्था, मजबूत टीम, पारदर्शी प्रक्रिया और ऐसी कार्य-संस्कृति छोड़िए, जो आपके बाद भी नागरिकों की सेवा करती रहे। आपकी सबसे बड़ी विरासत आपका पद नहीं, बल्कि आपके द्वारा मजबूत की गई संस्था और नागरिकों के जीवन में आया सकारात्मक परिवर्तन होगा।

    आज एआई, डेटा साइंस और नई तकनीक प्रशासन की कार्यक्षमता और निर्णय क्षमता को नई शक्ति दे रही हैं। इन्हें सीखिए, अपनाइए और स्वयं को निरंतर अद्यतन रखिए। लेकिन तकनीक को कभी नागरिक से दूरी का कारण न बनने दें। तकनीक शासन को सक्षम बना सकती है, संवेदनशीलता ही उसे मानवीय बनाती है।

    मेरे युवा साथियों,

    आपका सेवाकाल अनेक अवसरों और चुनौतियों से भरा होगा। हर परिस्थिति में एक बात अपने भीतर जीवित रखिए- आपके हर निर्णय में राष्ट्र सर्वाेपरि हो। यही भावना आपको पद से ऊपर उठाकर सच्चा राष्ट्रसेवक बनाएगी।

    याद रखिए- पद की अवधि सीमित होती है, लेकिन कर्म की छाप स्थायी होती है। आपकी असली पहचान इस बात से बनेगी कि आपके कार्यकाल में कितने जीवन बदले, कितनी संस्थाएँ मजबूत हुईं और लोगों का विश्वास कितना बढ़ा।

    मेरी कामना है कि इस अकादमी से निकलते हुए आप केवल सक्षम प्रशासक नहीं, बल्कि ऐसे राष्ट्रसेवक बनें, जिनकी कार्यशैली में पारदर्शिता, व्यवहार में संवेदना, निर्णयों में दृढ़ता और हृदय में सदैव राष्ट्र प्रथम का भाव हो।

    आप सभी को एक गौरवपूर्ण, सार्थक और राष्ट्र को समर्पित सेवाकाल के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

    माननीय उपराष्ट्रपति जी, इस अवसर पर अपनी गरिमामयी उपस्थिति और प्रेरणादायी मार्गदर्शन के लिए मैं आपके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपका मार्गदर्शन हमारे युवा अधिकारी प्रशिक्षुओं के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बनेगा।

    जय हिन्द!