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    18-07-2026:राष्ट्रीय सैनिक संस्था द्वारा आयोजित ‘नई शिक्षा नीति में नैतिक शिक्षा’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 18, 2026

    जय हिन्द!

    शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में आप सभी प्रबुद्धजनों का मैं लोक भवन में हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करता हूँ।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नैतिक शिक्षा जैसे अत्यंत सामयिक, प्रासंगिक और राष्ट्रनिर्माण से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े विषय पर आयोजित इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में आप सबके मध्य उपस्थित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता और आत्मिक संतोष का अनुभव हो रहा है।

    मैं राष्ट्रीय सैनिक संस्था को इस दूरदर्शी एवं राष्ट्रोपयोगी आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, सेवा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय चेतना के संवर्धन के लिए संस्था द्वारा किया जा रहा कार्य अत्यंत सराहनीय है।

    सीमाओं पर राष्ट्र की सुरक्षा का दायित्व निभाने वाले सैनिक जब समाज में लौटकर शिक्षा, संस्कार और युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण का दायित्व निभाते हैं, तब उनका अनुभव राष्ट्र की अमूल्य धरोहर बन जाता है। सैनिक जीवन से अर्जित अनुशासन, त्याग, नेतृत्व और कर्तव्यपरायणता के मूल्यों को समाज और शिक्षा जगत तक पहुँचाने का यह प्रयास वास्तव में राष्ट्रनिर्माण का एक प्रेरक अभियान है।

    मुझे विशेष प्रसन्नता है कि इस संस्था ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और नैतिक शिक्षा जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषय को राष्ट्रीय विमर्श का आधार बनाया है। यह केवल शिक्षा पर चर्चा नहीं है, बल्कि ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प है जहाँ ज्ञान के साथ संस्कार, प्रतिभा के साथ चरित्र और प्रगति के साथ उत्तरदायित्व भी समान रूप से विकसित हों।

    मेरे लिए यह विषय केवल एक वैचारिक चर्चा नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव है। भारतीय सेना में लगभग चार दशकों तक सेवा करते हुए मैंने निकट से अनुभव किया है कि किसी सैनिक की सबसे बड़ी शक्ति उसके हाथ में धारण किया गया आधुनिकतम हथियार नहीं, बल्कि उसका चरित्र, अनुशासन, कर्तव्यबोध और ‘राष्ट्र प्रथम’ का अटूट संकल्प होता है।

    युद्धभूमि में अनेक ऐसे क्षण आते हैं, जब निर्णय केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि अंतःकरण से लिए जाते हैं। वहाँ विजय केवल शस्त्रों से नहीं, बल्कि नैतिक साहस, विश्वास, नेतृत्व और त्याग की भावना से सुनिश्चित होती है। भारतीय सेना का प्रत्येक अधिकारी और सैनिक इसी मूल्य-व्यवस्था में प्रशिक्षित होता है कि राष्ट्र सर्वाेपरि है।

    मैं प्रायः कहता हूँ कि सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं, लेकिन राष्ट्र की आत्मा की रक्षा उसके संस्कार करते हैं। यदि समाज का नैतिक चरित्र सुदृढ़ हो, तो राष्ट्र की शक्ति स्वतः सुदृढ़ हो जाती है। इसलिए शिक्षा का प्रथम उद्देश्य केवल कुशल पेशेवर तैयार करना नहीं, बल्कि उत्तरदायी, संवेदनशील और चरित्रवान नागरिक तैयार करना होना चाहिए।

    किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी उपलब्धियों अथवा प्राकृतिक संसाधनों से अधिक उसके नागरिकों के चरित्र, संस्कार और नैतिक चेतना से निर्धारित होती है। यदि शिक्षा केवल आजीविका का साधन बन जाए और जीवन-मूल्यों से उसका संबंध टूट जाए, तो ज्ञान तो प्राप्त हो सकता है, किन्तु विवेक नहीं; कौशल विकसित हो सकता है, किन्तु करुणा नहीं, समृद्धि प्राप्त हो सकती है, किन्तु सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदना नहीं।

    भारतीय ज्ञान-परम्परा ने शिक्षा को सदैव मनुष्य के समग्र विकास का माध्यम माना है। उपनिषद् का यह महावाक्य आज भी हमें मार्गदर्शन देता है-

    ‘‘सा विद्या या विमुक्तये।’’ अर्थात् वही विद्या है, जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार, भय और संकीर्णताओं से मुक्त कर सत्य, विवेक और आत्मबोध की ओर ले जाए।

    हमारी गुरुकुल परम्परा में शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्वान बनाना नहीं था, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना था जो सत्यनिष्ठ, अनुशासित, करुणामय, प्रकृति के प्रति संवेदनशील तथा समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वाेपरि मानने वाला हो। ज्ञान और आचरण, विज्ञान और अध्यात्म, बुद्धि और संवेदना का समन्वय ही भारतीय शिक्षा-दर्शन की पहचान रहा है।

    स्वामी विवेकानन्द ने कहा था-‘‘शिक्षा वह है जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।’’ आज जब विश्व तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, तब यह विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है।

    इसी युगीन आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में लागू राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और युगांतकारी परिवर्तन का आधार बनी है। यह नीति भारत की प्राचीन ज्ञान-परम्परा और आधुनिक वैश्विक आवश्यकताओं का सशक्त समन्वय प्रस्तुत करती है।

    समग्र शिक्षा, मातृभाषा में अध्ययन, कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार, भारतीय ज्ञान-परम्परा तथा मूल्य-आधारित शिक्षा को समान महत्व देकर यह नीति विकसित भारत के लिए सक्षम, संस्कारवान और आत्मनिर्भर नागरिकों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 केवल शिक्षा में सुधार का दस्तावेज नहीं, बल्कि विकसित भारत के निर्माण का दूरदर्शी दृष्टिपत्र है। यह शिक्षा को परीक्षा, अंक और डिग्री तक सीमित नहीं रखती, बल्कि ऐसे नागरिकों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित करती है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ चरित्रवान हों, नवाचार में अग्रणी हों और अपनी सांस्कृतिक जड़ों तथा राष्ट्रीय दायित्वों से भी गहराई से जुड़े हों।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह नैतिक शिक्षा को किसी एक विषय अथवा पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं रखती। यह शिक्षा के प्रत्येक आयाम-शिक्षक के व्यक्तित्व, शिक्षण-पद्धति, संस्थान के वातावरण, सामुदायिक सहभागिता और जीवन-अनुभव-सभी में मूल्यों के समावेश की बात करती है। वास्तव में नैतिक शिक्षा पढ़ाई नहीं जाती, बल्कि जी जाती है, उपदेश से नहीं, बल्कि उदाहरण से सीखी जाती है।

    विद्वान गुरुजनों,

    एक शिक्षक का सत्यनिष्ठ आचरण किसी भी पाठ्यपुस्तक से अधिक प्रभावशाली होता है। एक पारदर्शी और न्यायपूर्ण शिक्षण संस्थान बिना कुछ कहे उत्तरदायित्व, अनुशासन और ईमानदारी का पाठ पढ़ा देता है। उसी प्रकार परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है। माता-पिता के संस्कार और परिवार का वातावरण ही बच्चों के व्यक्तित्व की आधारशिला रखते हैं। इसलिए नैतिक शिक्षा केवल विद्यालय का दायित्व नहीं, बल्कि परिवार, समाज और सम्पूर्ण व्यवस्था का साझा उत्तरदायित्व है।

    आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स और डिजिटल क्रांति के युग में प्रवेश कर चुके हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने विकास के नए द्वार खोले हैं, किन्तु इनके साथ अनेक नैतिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। गलत सूचना, साइबर अपराध, निजता का उल्लंघन और तकनीक का दुरुपयोग हमारे समय की गंभीर चिंताएँ हैं। ऐसे समय में विद्यार्थियों को केवल तकनीक का उपयोग करना ही नहीं, बल्कि उसका उत्तरदायी, सुरक्षित और नैतिक उपयोग भी सिखाना होगा।

    मैं मानता हूँ कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तभी मानवता के लिए वरदान बन सकती है, जब उसके साथ नैतिक चेतना और मानवीय संवेदना भी जुड़ी हो। विज्ञान को दिशा सदैव मूल्य और विवेक ही देते हैं।

    हमारा संविधान भी हमें यही प्रेरणा देता है। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व केवल संवैधानिक आदर्श नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्रीय जीवन के नैतिक स्तम्भ हैं। मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो अधिकारों के प्रति सजग होने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से प्रतिबद्ध हों।

    मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय सैनिक संस्था अपने अनुभव, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति के माध्यम से शिक्षा-जगत और समाज के बीच मूल्यों का एक सशक्त सेतु बनकर भविष्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी। पूर्व सैनिकों के जीवन-संघर्ष, नेतृत्व और सेवा की प्रेरणा युवाओं में राष्ट्रभाव, कर्तव्यनिष्ठा और आत्मविश्वास का संचार करती रहेगी।

    मेरे प्रिय युवा साथियों,

    राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के विचार, चरित्र और संकल्प से निर्मित होता है। आज का विद्यार्थी ही कल का वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक, उद्यमी, सैनिक और राष्ट्र-निर्माता बनेगा। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने युवाओं को केवल दक्ष ही नहीं, बल्कि दिशा-संपन्न भी बनाएँ, केवल सफल ही नहीं, बल्कि संस्कारवान और उत्तरदायी नागरिक भी बनाएँ।

    जीवन में सफलता प्राप्त करना महत्वपूर्ण है, किन्तु उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास अर्जित करना। ज्ञान आपको ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है, परन्तु चरित्र ही आपको उन ऊँचाइयों पर स्थापित रखता है। व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके मूल्यों से होती है।

    आज भारत ‘विकसित भारत-2047’ के अमृत संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। यह केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, नवाचार और मानवीय मूल्यों से समृद्ध भारत के निर्माण का राष्ट्रीय संकल्प है। मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 इस संकल्प को साकार करने की सबसे सशक्त आधारशिला सिद्ध होगी।

    आइए! हम सब मिलकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण का संकल्प लें, जहाँ ज्ञान के साथ गुण, उत्कृष्टता के साथ नैतिकता, विज्ञान के साथ विवेक और नेतृत्व के साथ लोकमंगल की भावना का विकास हो। ऐसी पीढ़ी तैयार करें जो केवल डिग्रियाँ प्राप्त न करे, बल्कि राष्ट्र का दायित्व निभाए, जो केवल अपने भविष्य का निर्माण न करे, बल्कि भारत के भविष्य को भी सशक्त बनाए।

    इसी विश्वास के साथ मैं पुनः राष्ट्रीय सैनिक संस्था को इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज का यह मंथन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन, मूल्य-आधारित शिक्षा के सुदृढ़ीकरण तथा विकसित भारत और विकसित उत्तराखण्ड के निर्माण में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करेगा।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!