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    19-07-2026:15वीं यंग थिंकर्स मीट में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 19, 2026

    (तिथिः 19 जुलाई, 2026। स्थानः लेखक गाँव, देहरादून)

    विषय: “War and Narratives (वार एण्ड नैरेटिव्स)’’

    जय हिन्द!

    इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष आदरणीय डॉ. राम माधव जी, मंचासीन सभी विशिष्ट अतिथिगण, प्रख्यात विद्वान, नीति-विशेषज्ञ, देशभर से पधारे युवा विचारक तथा देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन भूमि पर उपस्थित आप सभी का मैं हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करता हूँ।

    15वीं यंग थिंकर्स मीट के समापन सत्र में आप सभी के मध्य उपस्थित होना मेरे लिए अत्यन्त प्रसन्नता का विषय है। पिछले तीन दिनों में आपने ‘‘वार एण्ड नैरेटिव्स’’ जैसे अत्यन्त सामयिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण विषय पर गंभीर मंथन किया है। मुझे विश्वास है कि यहाँ हुआ यह चिंतन केवल इस सम्मेलन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के भविष्य के वैचारिक, सामरिक और नीतिगत विमर्श को नई दिशा देगा।

    हमारी वैदिक परम्परा का प्रेरक मंत्र है-
    ‘‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।’’
    अर्थात् हम साथ चलें, साथ विचार करें और हमारे मन एकात्म भाव से जुड़े रहें। यही भारत की सनातन चिंतन परम्परा का मूल है। किसी भी सशक्त राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता या आर्थिक सामर्थ्य में नहीं, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना, राष्ट्रीय चरित्र और साझा नैरेटिव में निहित होती है। इसलिए आज का विषय केवल सामरिक विमर्श नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का भी विषय है।

    एक सैनिक के रूप में चार दशकों से अधिक समय तक राष्ट्र की सेवा करने के पश्चात् मैंने यह अनुभव किया है कि किसी भी युद्ध की अंतिम विजय केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना में सुनिश्चित होती है।

    आज युद्ध का स्वरूप निरन्तर बदलता रहा है। कभी संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित थे, फिर वे समुद्र और आकाश तक पहुँचे। आज युद्ध का विस्तार मानव मस्तिष्क तक हो चुका है। साइबर स्पेस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष, सूचना तंत्र और आर्थिक तंत्र आधुनिक युद्ध के नए आयाम बन चुके हैं।

    आज का युद्ध केवल इन्फॉर्मेशन वारफेयर तक सीमित नहीं है। यह कॉग्निटिव वारफेयर और साइकोलॉजिकल वारफेयर का भी युग है। किसी राष्ट्र को कमजोर करने के लिए अब उसकी सीमाएँ लांघना आवश्यक नहीं है, यदि उसके समाज में भ्रम, अविश्वास और विभाजन उत्पन्न कर दिया जाए, तो उसकी शक्ति भीतर से ही क्षीण होने लगती है।

    इसीलिए आज कहा जाता है-ष्च्मतबमचजपवद पे च्वूमतष्ए अर्थात् धारणा ही शक्ति है। आधुनिक युग में नैरेटिव राष्ट्रीय शक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है। अनेक बार युद्ध की पहली लड़ाई सीमा पर नहीं, बल्कि समाज की चेतना और विश्व जनमत के भीतर लड़ी जाती है।

    आज किसी भी वैश्विक संघर्ष में पहली चुनौती सत्य को स्थापित करने की होती है। डीपफेक, फेक न्यूज, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के द्वारा जनमत को प्रभावित करने के संगठित प्रयास किए जाते हैं। इसलिए सूचना की विश्वसनीयता, तथ्यपरक चिंतन और डिजिटल सजगता राष्ट्रीय सुरक्षा के अनिवार्य स्तम्भ बन चुके हैं।

    भारत ने भी इस चुनौती का अनेक अवसरों पर सामना किया है। आतंकवाद के विरुद्ध हमारी सशस्त्र सेनाओं की निर्णायक कार्रवाइयों के साथ-साथ दुष्प्रचार का भी सामना करना पड़ा। हमारे सैनिकों ने सीमा पर पराक्रम दिखाया और राष्ट्र ने सत्य को विश्व के समक्ष दृढ़ता से स्थापित किया। यह स्पष्ट है कि आधुनिक युग में युद्ध केवल शस्त्रों से नहीं, बल्कि विश्वास, विश्वसनीयता और नैतिक बल से भी जीते जाते हैं।

    भारत के लिए यह कोई नया विचार नहीं है। हमारी सभ्यता ने सदैव सत्य, धर्म और संवाद को शक्ति का आधार माना है। आचार्य कौटिल्य का साम, दाम, दण्ड और भेद हमें बताता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल शस्त्रों में नहीं, बल्कि नीति, बुद्धि और जनविश्वास में भी निहित होती है। महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध से पूर्व शांति के प्रत्येक प्रयास को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी। यही भारत का स्वभाव है-शक्ति का सम्मान, किन्तु उसका प्रयोग केवल धर्म, न्याय और लोकमंगल के लिए।

    ‘‘सत्यमेव जयते’’ और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ हमारे राष्ट्रीय जीवन के आधार हैं। भारत का नैरेटिव सदैव सत्य, समन्वय, सह-अस्तित्व और लोकमंगल का रहा है, वर्चस्व का नहीं। यही कारण है कि भारत ने विश्व को संघर्ष नहीं, संवाद; विभाजन नहीं, एकात्मता; और प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग; का मार्ग दिखाया है।

    राष्ट्र केवल भू-भाग का नाम नहीं होता। राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक चेतना, साझा मूल्यों और राष्ट्रीय चरित्र से निर्मित होता है। जब समाज का चरित्र दृढ़ होता है, तब कोई भी दुष्प्रचार, कोई भी वैचारिक आक्रमण और कोई भी विभाजनकारी नैरेटिव उसे पराजित नहीं कर सकता।

    आज समय की माँग है कि भारत अपना नैरेटिव स्वयं गढ़े, स्वयं लिखे और आत्मविश्वास के साथ विश्व के समक्ष प्रस्तुत करे। यदि हम अपनी सभ्यता, इतिहास और उपलब्धियों को स्वयं अभिव्यक्त नहीं करेंगे, तो कोई अन्य उन्हें अपने दृष्टिकोण से परिभाषित करेगा।

    आज का भारत आत्मविश्वासी है, आत्मनिर्भर है और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करता है। हमारी लोकतांत्रिक परम्परा, चन्द्रयान, डिजिटल परिवर्तन, योग और वैश्विक नेतृत्व भारत के सशक्त नैरेटिव के आधार हैं। इन्हें हमें तथ्य, आत्मविश्वास और गरिमा के साथ विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। यही हमारे राष्ट्रीय स्वत्व का भी दायित्व है।

    आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने विकसित भारत-2047 का जो राष्ट्रीय संकल्प देश के समक्ष रखा है, वह केवल आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प है जो आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी, नवोन्मेषी, सांस्कृतिक रूप से जागरूक और विश्व के प्रति उत्तरदायी हो। ऐसे भारत के निर्माण के लिए केवल आर्थिक और सामरिक शक्ति पर्याप्त नहीं होगी, एक सशक्त, सकारात्मक और सत्य आधारित नैरेटिव भी उतना ही आवश्यक होगा।

    जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने ‘‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’’ का जो संदेश विश्व को दिया, वह हमारी हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत चेतना का आधुनिक स्वरूप है। आज विश्व भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय साझेदार, उत्तरदायी लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों से प्रेरित राष्ट्र के रूप में देख रहा है। यह विश्वास हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

    प्रिय युवा साथियों,

    राष्ट्र केवल सरकारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी आगे बढ़ते हैं। विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान और थिंक टैंक किसी भी विकसित राष्ट्र की वैचारिक प्रयोगशालाएँ होते हैं। आप जैसे युवा विचारकों का दायित्व केवल वर्तमान का विश्लेषण करना नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाले विचारों का सृजन करना भी है।

    आज प्रत्येक युवा के हाथ में एक डिजिटल माध्यम है। वह केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं, बल्कि विचारों का संवाहक और समाज का मार्गदर्शक भी है। इसलिए आपका प्रत्येक विचार, प्रत्येक संवाद और प्रत्येक अभिव्यक्ति राष्ट्र के नैरेटिव को प्रभावित करती है। यह आवश्यक है कि आपका नैरेटिव सत्य, तथ्य, राष्ट्रहित और मानवता के प्रति उत्तरदायित्व से प्रेरित हो।

    देवभूमि उत्तराखण्ड हमें यही प्रेरणा देती है। यह अध्यात्म, संस्कृति और वीरता का अद्भुत संगम है। चारधाम की आस्था, हिमालय की तपःभूमि और सैनिक परंपरा, इस भूमि की विशिष्ट पहचान हैं। सीमाओं पर हमारे सैनिक राष्ट्र की भौगोलिक सुरक्षा करते हैं, वहीं आप जैसे युवा भारत की वैचारिक चेतना के प्रहरी बन सकते हैं। यही इस पावन भूमि का संदेश भी है।

    मैं आप सभी युवा साथियों से पाँच सरल आग्रह करना चाहता हूँ-सत्य को अपना सबसे बड़ा आधार बनाइए, किसी भी सूचना को बिना सत्यापन स्वीकार या प्रसारित मत कीजिए। नई तकनीकों को अपनाइए और ज्ञान के प्रत्येक नए क्षेत्र में दक्षता प्राप्त कीजिए। अपनी सभ्यता, संस्कृति और इतिहास से जुड़े रहिए, क्योंकि जड़ों से जुड़ा समाज ही भविष्य का नेतृत्व करता है। हमारे सैनिकों के त्याग और बलिदान का सदैव सम्मान कीजिए, क्योंकि उन्हीं के कारण हम स्वतंत्र वातावरण में विचार कर पाते हैं। और सबसे बढ़कर, भारत की एकता को सर्वाेच्च मानिए, संगठित समाज को कोई भी विभाजनकारी नैरेटिव पराजित नहीं कर सकता।

    स्वामी विवेकानन्द का आह्वान आज भी उतना ही प्रेरक है-
    ‘‘उत्तिष्ठत। जाग्रत। प्राप्य वरान्निबोधत।’’
    अर्थात् उठो, जागो और अपने श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति तक निरन्तर आगे बढ़ते रहो।

    आज भारत अमृतकाल की यात्रा पर है। यह केवल विकास का काल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का काल है। हमें ऐसा भारत बनाना है जो विज्ञान में अग्रणी हो, संस्कृति में आत्मविश्वासी हो, राष्ट्रीय चरित्र में अडिग हो और सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के प्रति समर्पित हो।

    21वीं सदी के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समाज की चेतना में भी लड़े जाएँगे। इसलिए हमें ऐसा नैरेटिव गढ़ना होगा जो सत्य से प्रेरित हो, संस्कृति से अनुप्राणित हो, विज्ञान से समर्थ हो और राष्ट्रहित के प्रति पूर्णतः समर्पित हो।

    मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस 15वीं यंग थिंकर्स मीट से निकले विचार भारत के वैचारिक भविष्य को नई दिशा देंगे। आप केवल भारत का भविष्य नहीं हैं, बल्कि उस विकसित, आत्मविश्वासी और सक्षम भारत के नैरेटिव के निर्माता हैं जिसकी ओर आज पूरा राष्ट्र अग्रसर है।

    ‘‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।’’
    अर्थात् संपूर्ण विश्व से श्रेष्ठ विचार हमारे पास आएँ।

    आइए! हम सब मिलकर ऐसा भारत निर्मित करें जो शक्ति में समर्थ, विचार में उदात्त, चरित्र में अडिग, संस्कृति में गौरवशाली और मानवता के प्रति समर्पित हो। यही विकसित भारत की आधारशिला है, यही हमारी सनातन परम्परा का संदेश है और यही अमृतकाल का संकल्प भी है।

    इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं इंडिया फाउंडेशन को इस उत्कृष्ट आयोजन के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ। मैं सभी विद्वानों, आयोजकों और विशेष रूप से यहाँ उपस्थित युवा विचारकों के उज्ज्वल भविष्य की शुभकामना करता हूँ। मुझे विश्वास है कि आप सभी ज्ञान, चरित्र, राष्ट्रनिष्ठा और नवाचार के बल पर विकसित भारत के सशक्त निर्माता बनेंगे।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!