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    12-07-2026 : स्वर्गीय कर्नल सोनम वांगचुक, महावीर चक्र को समर्पित नाट्य प्रस्तुति ‘द मोंक, द वॉरियर, द लीजेंड’ के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 12, 2026

    जय हिन्द!

    मॉडर्न स्कूल के आदरणीय प्रधानाचार्य,मंचासीन विशिष्ट अतिथिगण, भारतीय सेना के वरिष्ठ एवं सम्मानित अधिकारीगण, श्रीमत सोनम वांगचुक जी एहसास ‘81’फाउंडेशन के पदाधिकारीगण, सेवारत एवं सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारीगण, वीर सैनिकों के परिजन, प्रिय विद्यार्थियों, देवियों एवं सज्जनों,

    आज इस ऐतिहासिक परिसर में उपस्थित होकर मैं स्वयं को अत्यंत गौरवान्वित और भाव-विभोर अनुभव कर रहा हूँ। ‘द मोंक, द वॉरियर,द लीजेंड’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रभक्ति, त्याग, साहस, नेतृत्व और मानवीय मूल्यों का जीवंत उत्सव है। यह उस महान भारतीय सैनिक, महावीर चक्र विजेता स्वर्गीय कर्नल सोनम वांगचुक को राष्ट्र की सामूहिक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने अदम्य साहस, अद्वितीय नेतृत्व और अटूट कर्तव्यनिष्ठा से भारतीय सैन्य इतिहास में अमिट स्थान बनाया।

    मैं एहसास ‘81’ फाउंडेशन को हार्दिक बधाई देता हूँ कि उसने अपने सहपाठी, अपने मित्र और राष्ट्र के इस अमर सपूत की स्मृतियों को केवल संजोया ही नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाने का यह प्रेरणादायी माध्यम भी चुना। किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सीमाओं की सुरक्षा में नहीं, बल्कि अपने वीरों के प्रति उसकी कृतज्ञता और सम्मान में भी निहित होती है। जो समाज अपने नायकों को स्मरण रखता है, वही आने वाली पीढ़ियों में चरित्र, साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का संस्कार विकसित करता है।

    मैं श्रीमती सोनम वांगचुक जी तथा उनके समस्त परिवार के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना और गहरा सम्मान व्यक्त करता हूँ। प्रत्येक वीर सैनिक के पीछे एक ऐसा परिवार होता है, जो मौन रहकर भी उतना ही बड़ा त्याग करता है। सीमा पर सैनिक राष्ट्र की रक्षा करता है, तो परिवार धैर्य, विश्वास और संकल्प की रक्षा करता है। राष्ट्र अपने वीर सैनिकों के साथ-साथ उनके परिवारों का भी उतना ही ऋणी है, जिनके मौन त्याग से ही वीरता की ऐसी अमर गाथाएँ संभव हो पाती हैं।

    मैं मॉडर्न स्कूल परिवार को भी हार्दिक बधाई देता हूँ। विद्यालय केवल शिक्षा प्रदान करने का केन्द्र नहीं होता, बल्कि संस्कार, नेतृत्व और राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की प्रथम प्रयोगशाला होता है। यह अत्यंत प्रेरणादायक है कि जिस परिसर में कभी कर्नल सोनम वांगचुक ने अपने छात्र जीवन की यात्रा प्रारम्भ की थी, उसी परिसर में आज उनकी जीवनगाथा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनकर प्रस्तुत की जा रही है। इससे बड़ा सम्मान किसी शिक्षण संस्था के लिए और क्या हो सकता है?

    देवियों एवं सज्जनों,

    आज के कार्यक्रम का शीर्षक-‘द मोंक, द वॉरियर, द लीजेंड’-अपने भीतर अत्यंत गहन दर्शन समेटे हुए है।
    ‘मोंक’ आत्मानुशासन, करुणा, विनम्रता और आत्मसंयम का प्रतीक है। जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही जीवन की सबसे बड़ी विजय प्राप्त करता है।

    ‘वॉरियर’ साहस, कर्तव्य और राष्ट्ररक्षा का प्रतीक है। सच्चा योद्धा वह नहीं होता जो संघर्ष की खोज करता है, बल्कि वह होता है जो शांति की रक्षा, न्याय की स्थापना और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए हर चुनौती का निर्भीकता से सामना करता है।

    ‘लीजेंड’ वह व्यक्तित्व है, जो अपने जीवन-मूल्यों, कर्मों और त्याग से इतिहास में अमर हो जाता है। किंवदंतियाँ जन्म से नहीं बनतीं; वे अपने चरित्र, नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पण से निर्मित होती हैं।

    कर्नल सोनम वांगचुक इन तीनों आदर्शों का अद्भुत संगम थे। उनमें हिमालय जैसी अटल दृढ़ता थी, बौद्ध परम्परा जैसी करुणा थी और भारतीय सैनिक की अटूट राष्ट्रनिष्ठा थी। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि महान नेतृत्व केवल पद या अधिकार से नहीं, बल्कि अपने आचरण, साहस और व्यक्तिगत उदाहरण से स्थापित होता है।

    भारत की सैन्य परम्परा सदैव ‘सेवा परमो धर्मः’ के महान आदर्श पर आधारित रही है। हमारी सेनाएँ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं करतीं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं एवं मानवीय संकटों में भी सबसे पहले सहायता के लिए आगे खड़ी दिखाई देती हैं। यही कारण है कि भारतीय सैनिक केवल वर्दीधारी योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पण, अनुशासन और सेवा का सर्वाेच्च प्रतीक है।

    एक सैनिक के रूप में अपने सैन्य जीवन में मैंने अनुभव किया है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि साहस, अनुशासन, नेतृत्व और अटूट मनोबल से जीते जाते हैं। भारतीय सेना की वास्तविक शक्ति उसके सैनिकों का चरित्र और राष्ट्र के प्रति उनका समर्पण है। कर्नल सोनम वांगचुक का जीवन इन्हीं आदर्शों का प्रेरक उदाहरण है।

    आज भारत विश्व के अग्रणी, सशक्त और आत्मविश्वासी राष्ट्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत रक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आधुनिक मिसाइल प्रणालियाँ, स्वदेशी लड़ाकू विमान, अत्याधुनिक युद्धपोत, ड्रोन प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रक्षा प्रणाली, साइबर सुरक्षा तथा अंतरिक्ष क्षमताएँ भारत की सामरिक शक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा रही हैं।

    आज का नया भारत केवल अपनी सुरक्षा को ही सुदृढ़ नहीं कर रहा, बल्कि रक्षा उपकरणों के निर्यात के माध्यम से विश्व मंच पर एक सक्षम, आत्मनिर्भर और विश्वसनीय रक्षा साझेदार के रूप में भी प्रतिष्ठित हो रहा है। यह आत्मनिर्भर भारत के संकल्प और हमारे वैज्ञानिकों, अभियंताओं तथा सशस्त्र सेनाओं के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।

    किन्तु हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि युद्ध केवल तकनीक से नहीं जीते जाते। अत्याधुनिक हथियार आवश्यक हैं, परन्तु उनसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण वह मनुष्य है, जो उन्हें संचालित करता है। कोई भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता साहस का स्थान नहीं ले सकती। कोई भी मशीन कर्तव्यनिष्ठा, नैतिकता, त्याग और राष्ट्रप्रेम का विकल्प नहीं बन सकती। मानवीय चरित्र, नैतिक साहस और राष्ट्रनिष्ठा ही किसी भी सेना की वास्तविक युद्ध-शक्ति हैं। अन्ततः विजय उसी की होती है, जिसके भीतर अटूट संकल्प, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण हो।

    हमारे राष्ट्रीय जीवन का सबसे बड़ा मंत्र है-‘राष्ट्र प्रथम’। जब राष्ट्र सर्वाेपरि होता है, तब कर्तव्य, ईमानदारी और सेवा जीवन का स्वाभाविक मार्ग बन जाते हैं। यदि प्रत्येक नागरिक इस भावना को अपने आचरण का आधार बना ले, तो विकसित, आत्मनिर्भर और सुरक्षित भारत का संकल्प अवश्य साकार होगा। यही कर्नल सोनम वांगचुक जैसे अमर वीरों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

    मेरे प्रिय युवा साथियों,

    आज मैं विशेष रूप से आपसे कहना चाहता हूँ कि प्रत्येक पीढ़ी को अपने आदर्श चुनने होते हैं। डिजिटल युग में प्रसिद्धि क्षणिक हो सकती है, किन्तु चरित्र शाश्वत होता है। अपने जीवन में ऐसे व्यक्तित्वों को आदर्श बनाइए, जिनकी पहचान उनके पद से नहीं, बल्कि उनके मूल्यों से हुई हो; जिनकी महानता प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए किए गए त्याग से बनी हो। अपने आदर्श ऐसे चुनिए, जिनका जीवन आपको केवल सफल ही नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ नागरिक भी बनाए।

    यदि आज की यह नाट्य प्रस्तुति एक भी विद्यार्थी के मन में सेवा, अनुशासन, सत्यनिष्ठा, करुणा और राष्ट्रभक्ति का दीप प्रज्वलित कर दे, तो मैं समझूँगा कि इस आयोजन का उद्देश्य पूर्णतः सफल हो गया।

    हमारे शास्त्रों में कहा गया है-

    ‘‘अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
    जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥’’
    अर्थात् स्वर्णमयी लंका भी मुझे प्रिय नहीं है, क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। इसी भावना को भारतीय सैनिक अपने जीवन का सर्वाेच्च धर्म मानता है। वह अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख से ऊपर उठकर राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। कर्नल सोनम वांगचुक का सम्पूर्ण जीवन इसी आदर्श का सजीव उदाहरण है।

    आज जब हम उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, तब हमें केवल उनके पराक्रम का ही नहीं, बल्कि उनके जीवन-मूल्यों का भी अनुसरण करना होगा। सच्ची श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा, अनुशासन, साहस, करुणा, विनम्रता और राष्ट्र को स्वयं से ऊपर रखने की भावना को अपने जीवन में अपनाने से होगी।

    अन्त में, मैं एक बार पुनः एहसास ‘81’ फाउंडेशन, मॉडर्न स्कूल, सभी कलाकारों, शिक्षकों, आयोजकों, स्वयंसेवकों तथा इस भव्य और प्रेरणादायी आयोजन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को हार्दिक बधाई देता हूँ।

    आइए! हम सभी संकल्प लें कि अपने वीर सैनिकों के आदर्शों को केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि अपने जीवन के आचरण में भी उतारेंगे।यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही एक विकसित, सुरक्षित, आत्मनिर्भर एवं गौरवशाली भारत के निर्माण की सबसे सशक्त आधारशिला बनेगी। वीर कभी केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते; वे राष्ट्र के चरित्र का स्थायी आधार बन जाते हैं।

    वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!