11-07-2026 : रामतीर्थ केंद्र (सहारनपुर) स्वर्ण जयंती समारोह एवं ‘आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब’ के प्रथम सम्पूर्ण संस्कृत पद्यानुवाद के विमोचन अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
जय हिन्द!
आज इस पावन अवसर पर आप सभी के मध्य उपस्थित होकर मुझे हार्दिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है। इस गरिमामय समारोह में उपस्थित सभी पूज्य संत-महात्माओं, विद्वतजनों, आचार्यगण, विशिष्ट अतिथियों, रामतीर्थ केंद्र परिवार तथा श्रद्धालुजनों का मैं हृदय से अभिनन्दन करता हूँ।
ऋषियों, मुनियों, संतों और तपस्वियों की तपोभूमि, देवभूमि उत्तराखण्ड भारतीय अध्यात्म, योग, वेदान्त और लोक-मंगल की सनातन परम्परा की संवाहक रही है। भारत की आध्यात्मिक चेतना के जीवंत केन्द्र देवभूमि उत्तराखण्ड में आयोजित यह समारोह भारत की विविध आध्यात्मिक परम्पराओं को संवाद, सम्मान और समरसता के सूत्र में पिरोने का अनुपम प्रयास है।
आज का यह अवसर केवल रामतीर्थ केन्द्र की स्वर्ण जयंती का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की उस अखण्ड परम्परा का अभिनन्दन है, जिसने सहस्राब्दियों से सम्पूर्ण मानवता को सत्य, करुणा, सेवा और समरसता का मार्ग दिखाया है।
साथ ही, ‘आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब’ के प्रथम सम्पूर्ण संस्कृत पद्यानुवाद का सार्वजनिक विमोचन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह गुरुवाणी और संस्कृत की शाश्वत ज्ञानधारा के दिव्य समन्वय का गौरवपूर्ण प्रतीक है।
मैं इस अवसर पर परम श्रद्धेय स्वामी रामतीर्थ जी का विनम्र स्मरण करता हूँ। उनका जीवन आत्मबोध, आत्मविश्वास, आत्मोत्थान और विश्व-बंधुत्व का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने वेदान्त को केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मानव जीवन और लोक-कल्याण का व्यावहारिक दर्शन बनाया। उनका विश्वास था कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर दिव्यता का प्रकाश विद्यमान है।
स्वामी रामतीर्थ जी कहा करते थे-
‘‘अपने भीतर के ईश्वर को पहचानो, सम्पूर्ण विश्व तुम्हारा अपना हो जाएगा।’’ आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता, भौतिक प्रतिस्पर्धा और मूल्य-संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब उनका यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। आत्मबोध ही समरस समाज और विश्व-बंधुत्व का आधार बन सकता है।
स्वामी रामतीर्थ जी के इन्हीं आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य रामतीर्थ केंद्र ने पिछले पाँच दशकों से अत्यंत समर्पण के साथ किया है। केंद्र के संस्थापक, कीर्तिशेष आचार्य डॉ. केदारनाथ प्रभाकर जी की दूरदृष्टि और सांस्कृतिक संकल्प ने इस संस्था को एक प्रेरणादायी सांस्कृतिक आन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया। भारतीय संस्कृति, व्यावहारिक वेदान्त, संस्कृत और अध्यात्म के संरक्षण एवं संवर्धन में इस केन्द्र का योगदान अत्यन्त सराहनीय है। इस स्वर्णिम यात्रा के लिए मैं रामतीर्थ केंद्र परिवार को हार्दिक बधाई देता हूँ।
साथियों,
आज यह महान संस्कृत पद्यानुवाद का सार्वजनिक विमोचन भारतीय ज्ञान-परम्परा के इतिहास की एक युगांतकारी उपलब्धि है। यह गुरुवाणी की दिव्य चेतना और संस्कृत की सनातन ज्ञानधारा के मधुर संगम का अनुपम उदाहरण है, जो भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता, आध्यात्मिक संवाद और राष्ट्रीय समरसता को नई शक्ति प्रदान करेगा।
मैं साहित्याचार्य कीर्तिशेष जयनारायण शास्त्री ‘यात्री’ जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिनकी दीर्घ साधना और संस्कृत के प्रति अनन्य समर्पण ने इस विलक्षण कृति को जन्म दिया। उनके महाप्रयाण के पश्चात् आचार्य सर्वेश्वर नाथ प्रभाकर, आचार्य गंगेश्वर नाथ प्रभाकर तथा डॉ. आमा प्रभाकर ने जिस निष्ठा, धैर्य और उत्तरदायित्व के साथ इस महान कार्य को पूर्णता प्रदान की, वह भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा और ज्ञान-साधना का प्रेरक उदाहरण है।
साथियों,
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके वर्तमान में नहीं, बल्कि उसकी संरक्षित ज्ञान-परम्परा, सांस्कृतिक स्मृतियों और जीवन-मूल्यों में निहित होती है। दस्तावेजीकरण सभ्यता की सामूहिक चेतना का संरक्षण है और प्रकाशन पीढ़ियों के मध्य ज्ञान, संस्कार तथा अनुभव का अमर सेतु। भारत की ऋषि-परम्परा ने वेदों, उपनिषदों, संत-वाङ्मय और गुरु-परम्परा के माध्यम से इस अमूल्य धरोहर को अक्षुण्ण रखा, जिससे आज सम्पूर्ण विश्व भारतीय दर्शन, अध्यात्म और जीवन-दृष्टि से आलोकित है।
यह महान कृति उसी गौरवशाली परम्परा का सशक्त विस्तार है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, अध्ययन और शोध का स्थायी आधार बनेगी। प्रसन्नता का विषय है कि आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत, भारतीय भाषाओं और ज्ञान-परम्परा के पुनर्जागरण की दिशा में नई ऊर्जा के साथ अग्रसर है। आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान का समन्वय ही भारत को विश्व के समक्ष मानवीय, संतुलित और मूल्याधारित विकास का आदर्श प्रस्तुत करने में समर्थ बनाएगा।
आज जिस पावन ग्रन्थ ‘आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब’ के प्रथम सम्पूर्ण संस्कृत पद्यानुवाद का विमोचन हो रहा है, वह केवल सिख परम्परा का धर्मग्रन्थ नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए आध्यात्मिक प्रकाश-स्तम्भ है। गुरु नानक देव जी सहित अनेक संतों की दिव्य वाणी से आलोकित यह ग्रन्थ प्रेम, सेवा, सत्य, करुणा और समरसता का सार्वभौमिक संदेश देता है तथा हमें जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता को अपनाने की प्रेरणा प्रदान करता है।
हमारे ऋषियों ने कहा है- ‘‘सा विद्या या विमुक्तये।’’ अर्थात् वही विद्या है, जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और संकीर्णता से मुक्त करे। आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का संदेश भी हमें अपने भीतर की दिव्यता का साक्षात्कार करने, प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का अंश देखने और सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार मानने की प्रेरणा देता है। आज विश्व जब शान्ति, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की तलाश में है, तब यह दिव्य संदेश सम्पूर्ण मानवता के लिए आशा और मार्गदर्शन का शाश्वत स्रोत है।
गुरुवाणी का यह अमर वचन- ‘‘एक पिता एकस के हम बारिक।’’- भारतीय संस्कृति के ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ के आदर्श को सशक्त अभिव्यक्ति देता है। जब हम सभी स्वयं को एक ही परमपिता की संतान मानते हैं, तब विभाजन, वैमनस्य और घृणा के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। यही सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और विश्व-बंधुत्व की वास्तविक आधारशिला है।
संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की सनातन ज्ञान-परम्परा की आत्मा है। वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, दर्शन और असंख्य ज्ञानग्रन्थ इसी भाषा में निहित हैं। ऐसे में आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का संस्कृत पद्यानुवाद भारतीय ज्ञान-संपदा को और समृद्ध बनाने वाला ऐतिहासिक कार्य है। यह विभिन्न आध्यात्मिक परम्पराओं के मध्य संवाद, शोध और सांस्कृतिक समन्वय का नया द्वार खोलेगा तथा राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करेगा।
मुझे प्रसन्नता है कि उत्तराखण्ड संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। हमारा सतत प्रयास है कि संस्कृत केवल अनुष्ठानों तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार और आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ भी सशक्त रूप से जुड़े। जब हमारी प्राचीन ज्ञान-परम्परा आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वित होगी, तभी भारत विश्व को ज्ञान और विकास का संतुलित, मानवीय तथा मूल्याधारित मार्ग दिखा सकेगा।
प्रिय साथियों,
भारत की आध्यात्मिक शक्ति का आधार केवल उपदेश नहीं, बल्कि सेवा, साधना और श्रेष्ठ आचरण है। गुरु परम्परा ने हमें सेवा और सिमरन का मार्ग दिया। भगवान श्रीराम ने मर्यादा का आदर्श स्थापित किया, भगवान बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया, आदि शंकराचार्य ने अद्वैत का दर्शन दिया, स्वामी विवेकानन्द ने आत्मविश्वास का मंत्र दिया और स्वामी रामतीर्थ ने आत्मबोध के माध्यम से विश्व-बंधुत्व का अमर संदेश दिया। इन सभी महापुरुषों की शिक्षाओं का सार यही है कि मनुष्य स्वयं को पहचाने, समाज के लिए जिए और सम्पूर्ण मानवता के कल्याण को अपना सर्वाेच्च कर्तव्य माने।
हमारी युवा पीढ़ी विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि आधुनिक शिक्षा के साथ उन्हें भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परम्परा और नैतिक मूल्यों का सुदृढ़ आधार प्राप्त हो, तो वे केवल सफल पेशेवर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, उत्तरदायी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक भी बनेंगे। विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय ही ऐसे समाज का निर्माण करेगा, जो प्रगतिशील होने के साथ-साथ मानवीय और मूल्यनिष्ठ भी होगा। यही विकसित भारत और विकसित उत्तराखण्ड के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति बनेगा।
मेरी हार्दिक मंगलकामना है कि रामतीर्थ केन्द्र आने वाले वर्षों में भी भारतीय संस्कृति, संस्कृत, वेदान्त और अध्यात्म के संरक्षण एवं संवर्धन का प्रेरणास्रोत बना रहे। मुझे विश्वास है कि ‘आदि श्री गुरु ग्रन्थ साहिब’ का यह प्रथम सम्पूर्ण संस्कृत पद्यानुवाद नई पीढ़ी को भारतीय आध्यात्मिक साहित्य के गंभीर अध्ययन के लिए प्रेरित करेगा तथा विविध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं के मध्य संवाद, सद्भाव और राष्ट्रीय एकात्मता को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
आइए! इस पावन अवसर पर हम सब यह संकल्प लें कि अपने महापुरुषों की शिक्षाओं को केवल ग्रन्थों तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उन्हें अपने जीवन का आचरण बनाएँगे। हम भाषा से अधिक भावना को, मत से अधिक मानवता को और विभाजन से अधिक समरसता को महत्व देंगे। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही विकसित, आत्मनिर्भर तथा श्रेष्ठ भारत की आधारशिला भी है।
अन्त में, मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हम सभी को सत्य के मार्ग पर चलने, सेवा को जीवन का आधार बनाने, राष्ट्रहित को सर्वाेपरि रखने तथा राष्ट्र, समाज और सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए निरन्तर कार्य करने की सद्बुद्धि और शक्ति प्रदान करें।
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वन्दे मातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!