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    07-07-2026 : “Absolute Intelligence ” एवं ‘‘प्रज्ञा’’ पुस्तक विमोचन समारोह के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : जुलाई 7, 2026

    जय हिन्द!

    लोक भवन के सभागार में आयोजित इस गरिमामय समारोह में उपस्थित पूज्य संतजनों, विशिष्ट अतिथिगणों, विद्वतजनों, शिक्षाविदों, युवा साथियों तथा आप सभी प्रबुद्ध नागरिकों का मैं हृदय से स्वागत एवं अभिनंदन करता हूँ।

    आज का यह अवसर केवल Absolute Intelligence: Don’t Search, Find तथा उसके हिन्दी रूपांतरण ‘‘प्रज्ञा – खोजें नहीं, समाधान पाएँ’’ पुस्तकों के विमोचन का अवसर नहीं है। यह उस भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनः स्मरण का अवसर भी है, जिसने सदियों पूर्व मानवता को यह संदेश दिया कि ज्ञान का सर्वाेच्च उद्देश्य केवल सूचना का संचय नहीं, बल्कि आत्मबोध, विवेक और लोक-कल्याण है।

    भारतीय उपनिषदों का शाश्वत संदेश-‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ -हमें अज्ञान से ज्ञान, सीमित दृष्टि से व्यापक चेतना और भ्रम से सत्य की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। यही दृष्टि इन पुस्तकों की आधारभूमि है, जहाँ “बुद्धिमत्ता” केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि “प्रज्ञा” के साथ उसका संतुलन है।

    आज जब मैं इन पुस्तकों को आप सभी के समक्ष समर्पित कर रहा हूँ, तब स्वाभाविक रूप से मेरी यह सेवा-यात्रा भी स्मृतियों में उभर आती है। उत्तराखण्ड के राज्यपाल के रूप में सबसे लंबे समय तक सेवा करने का अवसर मेरे लिए परम सौभाग्य का विषय रहा है। देवभूमि की देवतुल्य जनता का स्नेह, राज्य सरकार का सतत सहयोग तथा समाज के प्रत्येक वर्ग का विश्वास मेरी इस यात्रा की सबसे बड़ी शक्ति और अमूल्य पूँजी रहे हैं।

    मैं इस पावन भूमि के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ और विश्वास दिलाता हूँ कि उत्तराखण्ड की प्रगति, सांस्कृतिक गौरव और जनकल्याण के प्रति मेरा समर्पण सदैव बना रहेगा।

    साथियों,

    आज विश्व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ रहे हैं। मशीनें सीख रही हैं, निर्णय लेने में सहायता कर रही हैं और मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि मशीनें कितनी बुद्धिमान बनेंगी, बल्कि यह है कि मनुष्य अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग किस दिशा में करेगा।

    मेरे विचार में इंटेलिजेंस तभी सार्थक है, जब उसका मार्गदर्शन प्रज्ञा करे। भारतीय दर्शन में प्रज्ञा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि विवेक, करुणा, नैतिकता और उत्तरदायित्व का समन्वित स्वरूप है। यही वह शक्ति है, जो हमें केवल यह नहीं बताती कि क्या संभव है, बल्कि यह भी सिखाती है कि क्या उचित है और क्या मानवता के हित में है।

    मेरा दृढ़ विश्वास है कि तकनीक कभी भी मानवता का विकल्प नहीं बन सकती। उसका उद्देश्य मनुष्य पर शासन करना नहीं, बल्कि उसके जीवन को अधिक सुरक्षित, सरल, समृद्ध और कल्याणकारी बनाना है। जब विज्ञान आध्यात्मिकता से, नवाचार नैतिकता से और बुद्धिमत्ता प्रज्ञा से जुड़ेगी, तभी मानव सभ्यता का संतुलित विकास संभव होगा। यही इन पुस्तकों का मूल संदेश है।

    इन पुस्तकों को लिखने का उद्देश्य कोई नया सिद्धांत प्रस्तुत करना नहीं था, बल्कि जीवन के उन अनुभवों को साझा करना था जिन्होंने मुझे यह सिखाया कि प्रत्येक चुनौती अपने भीतर समाधान का बीज लेकर आती है। आवश्यकता केवल ऐसी दृष्टि विकसित करने की है, जो समस्या में नहीं, समाधान में विश्वास करे। इसी विश्वास को मैंने एक सरल सूत्र में व्यक्त किया है-‘‘खोजें नहीं, समाधान पाएँ।’’

    आज का नया भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति, तीव्र गति से विकसित हो रही डिजिटल अर्थव्यवस्था और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का धनी है। यदि हमारी वैज्ञानिक प्रतिभा को ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’, करुणा, समरसता और लोकमंगल की भावना से जोड़ा जाए, तो भारत केवल तकनीकी महाशक्ति ही नहीं, बल्कि विश्व को मानवीय, उत्तरदायी और नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दिशा देने वाला अग्रणी राष्ट्र बन सकता है।

    साथियों,

    भारतीय सेना में लगभग चार दशकों तक राष्ट्रसेवा करने का अवसर मेरे जीवन की सबसे बड़ी साधना रहा। वहीं मैंने अनुभव किया कि नेतृत्व का वास्तविक आधार पद नहीं, बल्कि कर्तव्य, अनुशासन, साहस और राष्ट्र के प्रति निष्ठा है। यही जीवन-दृष्टि आगे चलकर मेरे सार्वजनिक जीवन और इस पुस्तक की वैचारिक प्रेरणा का आधार बनी।

    किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसके संसाधन नहीं होते, बल्कि उसके नागरिकों का चरित्र, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण होता है। सीमा पर बिताया गया प्रत्येक क्षण यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियाँ व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के संकल्प की परीक्षा लेती हैं। यदि नेतृत्व स्पष्ट हो, उद्देश्य लोक-कल्याण का हो और मन में राष्ट्र प्रथम का भाव हो, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं रहती।

    इन्हीं जीवन अनुभवों को लेकर जब मुझे देवभूमि उत्तराखण्ड की सेवा का अवसर मिला, तब मैंने सदैव यह विश्वास किया कि लोक भवन केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला प्रेरणा-केंद्र भी होना चाहिए। इसी भावना से शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, युवा नेतृत्व, सैनिक सम्मान, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति, महिला सशक्तीकरण तथा जनभागीदारी जैसे विषयों को निरंतर प्रोत्साहित किया गया।

    राज्यपाल का दायित्व ग्रहण करते समय मैंने उत्तराखण्ड के समग्र एवं सतत विकास के लिए पाँच प्रमुख मिशनों को अपना मार्गदर्शक बनाया। महिला सशक्तीकरण एवं बालिका कल्याण, रिवर्स पलायन एवं रोजगार सृजन, जैविक खेती को बढ़ावा, योग-आयुर्वेद एवं वेलनेस का संवर्धन तथा प्रत्येक क्षेत्र में नई तकनीक का व्यापक उपयोग। मुझे संतोष है कि इन सभी क्षेत्रों में राज्य ने निरंतर सकारात्मक प्रगति की है और आज उत्तराखण्ड आत्मविश्वास के साथ विकास, नवाचार और जनसहभागिता के नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन, विश्वविद्यालयों में अनुसंधान संस्कृति के विकास, स्टार्टअप और नवाचार को प्रोत्साहन, युवाओं के कौशल विकास, पूर्व सैनिकों के सम्मान तथा समाज के विभिन्न वर्गों के साथ सतत संवाद की दिशा में भी अनेक सार्थक प्रयास किए गए। मेरा सदैव यह विश्वास रहा है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे उत्तरदायी, संवेदनशील और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना है जो विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ।

    आज उत्तराखण्ड आधारभूत संरचना, चारधाम संपर्क परियोजनाओं, रेल एवं सड़क कनेक्टिविटी, डिजिटल सुशासन, निवेश, पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, सीमांत क्षेत्रों के विकास तथा स्टार्टअप संस्कृति जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। यह उपलब्धि किसी एक संस्था या व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रदेश की परिश्रमी जनता, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन तथा सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।

    मेरे लिए Absolute Intelligence और ‘‘प्रज्ञा’’ किसी निष्कर्ष का नहीं, बल्कि एक सतत विचार-यात्रा का प्रारम्भ हैं। मैं चाहता हूँ कि इन पुस्तकों को पढ़ने वाला प्रत्येक पाठक स्वयं से कुछ सरल किन्तु गहरे प्रश्न अवश्य पूछे- क्या मैं केवल जानकारी प्राप्त कर रहा हूँ, या अपने भीतर विवेक और प्रज्ञा का भी विकास कर रहा हूँ? मेरा विश्वास है कि जब व्यक्ति स्वयं से ऐसे प्रश्न पूछना प्रारम्भ करता है, तभी वास्तविक परिवर्तन का आरम्भ होता है।

    मेरे युवा साथियों,

    आपसे कहना चाहता हूँ कि इक्कीसवीं शताब्दी भारत की शताब्दी बनने की क्षमता रखती है, और उसके सबसे बड़े निर्माणकर्ता हमारे युवा होंगे। मॉर्डन साइंस, एआई, डिजिटल तकनीक और इनोवेशन के प्रत्येक अवसर का पूरे आत्मविश्वास के साथ स्वागत कीजिए, किन्तु अपनी संस्कृति, अपने संस्कारों और अपने राष्ट्रीय मूल्यों को कभी मत भूलिए। ज्ञान आपको सक्षम बनाएगा, कौशल आपको आत्मनिर्भर बनाएगा, परन्तु प्रज्ञा ही आपको उत्तरदायी नागरिक, संवेदनशील नेतृत्वकर्ता और श्रेष्ठ मानव बनाएगी।

    पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा करते थे कि महान सपने वही देखते हैं जो उन्हें साकार करने का साहस रखते हैं। आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व में विकसित भारत-2047 का राष्ट्रीय संकल्प भी ऐसा ही एक महान स्वप्न है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि विज्ञान और तकनीक का प्रत्येक नवाचार मानव गरिमा, सामाजिक न्याय और लोक-कल्याण की भावना से जुड़ा रहे। यही भारतीय चिंतन की विशिष्टता है और यही इन पुस्तकों का मूल संदेश भी है।

    अंत में, मैं इस पुस्तक के सह-लेखक प्रोफेसर अरुण तिवारी जी, हिन्दी अनुवादक श्री पारितोष बंगवाल जी, प्रकाशकों तथा इस पुस्तक के प्रकाशन और आज के इस गरिमामय आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि Absolute Intelligence और ‘‘प्रज्ञा’’ नेतृत्व, नीति-निर्माण, सुशासन, शिक्षा, राष्ट्र-निर्माण और मानवता के कल्याण के लिए चिंतन का एक स्थायी प्रेरणा-स्रोत सिद्ध होंगी।

    आज इस सुअवसर पर हम सब मिलकर ऐसे भारत और ऐसे उत्तराखण्ड के निर्माण का संकल्प लें, जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हों, जहाँ नवाचार नैतिकता से प्रेरित हो, जहाँ विकास प्रकृति के संरक्षण के साथ आगे बढ़े और जहाँ प्रगति का अंतिम उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान, समाज का उत्थान और राष्ट्र का गौरव हो।

    आइए! हम ज्ञान को प्रज्ञा से, विज्ञान को मानवता से, शक्ति को सेवा से और प्रगति को नैतिकता से जोड़ते हुए विकसित उत्तराखण्ड और विकसित भारत के निर्माण में अपना सक्रिय योगदान देने का संकल्प लें। यही इन पुस्तकों का सार है, यही भारत की सनातन जीवन-दृष्टि का संदेश है और यही उज्ज्वल भविष्य की सबसे सुदृढ़ आधारशिला भी है।

    इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आप सभी का हृदय से धन्यवाद।

    जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!