21-06-2026:अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर माननीय राज्यपाल, उत्तराखण्ड का उद्बोधन
जय हिन्द!
सर्वप्रथम मैं इस ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित सभी योगियों, देवभूमि उत्तराखण्ड के सम्मानित नागरिकों तथा देश-विदेश में योग साधना से जुड़े सभी साधकों को 12वें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।
आज का यह दिवस भारत की सनातन संस्कृति, ऋषि परम्परा और आध्यात्मिक चेतना के वैश्विक उत्कर्ष का महापर्व है। यह वह गौरवशाली अवसर है जब सम्पूर्ण विश्व भारत की उस अमूल्य ज्ञान परम्परा के समक्ष श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होता है, जिसने मानवता को स्वास्थ्य, संतुलन, शांति और आत्मबोध का शाश्वत मार्ग प्रदान किया है।
योग भारत की आत्मा, हमारी संस्कृति का प्राण और सनातन सभ्यता की वह शाश्वत चेतना है, जिसने व्यक्ति को आत्मबोध, समाज को समरसता और विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है। यह शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा और परमात्मा के दिव्य मिलन का सेतु है। यही कारण है कि योग केवल साधना नहीं, बल्कि संतुलित, श्रेष्ठ और सार्थक जीवन जीने का सनातन विज्ञान है।
हिमालय की यह तपोभूमि अनादिकाल से योग, ध्यान और आध्यात्मिक साधना की धरा रही है। यहीं तप से ज्ञान का उदय हुआ और उसी ज्ञान ने योग के रूप में सम्पूर्ण मानवता को आत्मोन्नति और अमृतमय जीवन का मार्ग प्रदान किया। गंगा, हिमालय और हमारे पावन तीर्थ आज भी आत्म उन्नति, संयम और विश्वकल्याण की उस दिव्य परम्परा के जीवंत प्रतीक हैं।
हमारे ऋषियों ने योग को केवल आत्मकल्याण का साधन नहीं, बल्कि लोक-मंगल का माध्यम बनाया। भगवद्गीता का अमर संदेश- ‘योगः कर्मसु कौशलम्’- हमें बताता है कि कर्म में उत्कृष्टता, समर्पण और संतुलन ही वास्तविक योग है।
योग केवल आसनों या शारीरिक व्यायाम का नाम नहीं है, बल्कि संतुलित, अनुशासित और जागरूक जीवन जीने की भारतीय जीवन-पद्धति है। यह हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य, आत्मविश्वास और मन का संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। योग बाहरी उपलब्धियों से पहले अपने भीतर की विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।
महर्षि पतंजलि ने योग को ‘चित्तवृत्ति निरोध’ का मार्ग बताया। अष्टांग योग के आठ सोपान केवल साधना के चरण नहीं, बल्कि अनुशासित, चरित्रवान और उत्तरदायी जीवन की आधारशिला हैं। जब मन, वचन और कर्म में एकरूपता स्थापित होती है, तभी योग अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक और श्रेष्ठ मानव बनाता है।
आज जब विश्व तनाव, मानसिक अशांति, अवसाद और जीवनशैली जनित रोगों से जूझ रहा है, तब योग केवल भारत की प्राचीन धरोहर नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की आवश्यकता बन गया है। आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि योग शरीर को निरोग, मन को संतुलित और जीवन को शांत, सकारात्मक तथा ऊर्जावान बनाने का प्रभावी माध्यम है।
योग हमें बाहर की दुनिया को जीतने से पहले अपने भीतर की अशांति पर विजय प्राप्त करना सिखाता है। जिसने स्वयं को जीत लिया, उसके लिए कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रह जाता।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदर्शी पहल से योग आज वैश्विक जन-आंदोलन बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की मान्यता भारत की सांस्कृतिक शक्ति और आध्यात्मिक विरासत का ऐतिहासिक सम्मान है। आज करोड़ों लोग योग के माध्यम से स्वस्थ और संतुलित जीवन की ओर अग्रसर हैं। यह भारत की ऐसी सॉफ्ट पावर है जिसने बिना किसी शक्ति प्रदर्शन के सम्पूर्ण विश्व के हृदय को स्पर्श किया है।
मेरे युवा साथियों,
विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, सशक्त मन, अनुशासित चरित्र और राष्ट्रनिष्ठ चेतना से होता है। योग आत्मविश्वास, एकाग्रता, नेतृत्व क्षमता और संयम का आधार है। आज नशा, तनाव और डिजिटल व्यसन जैसी चुनौतियों के बीच योग ही युवाशक्ति को सही दिशा देता है। इसलिए इसे केवल अभ्यास नहीं, बल्कि अपने जीवन का स्थायी संस्कार बनाइए।
हमारी मातृशक्ति भारतीय संस्कृति और संस्कारों की प्रथम संवाहक है। यदि प्रत्येक परिवार में योग, ध्यान और प्राणायाम की परम्परा विकसित हो, तो आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ, संस्कारित, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ बनेंगी। स्वस्थ परिवार सशक्त समाज का आधार है और सशक्त समाज ही समर्थ एवं विकसित राष्ट्र की सबसे मजबूत नींव बनता है।
योग हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य और सह-अस्तित्व का संदेश देता है। हमारी संस्कृति ने नदियों को माता, पर्वतों को देवतुल्य और वृक्षों को जीवनदाता माना है। आज पर्यावरणीय संकट के दौर में योग संयमित जीवन और संतुलित उपभोग की प्रेरणा देता है। योग हमें उपभोग नहीं, उपयोग का और दोहन नहीं, संरक्षण का संस्कार सिखाता है; यही प्रकृति और मानवता के प्रति हमारी सच्ची साधना है।
हमारा सनातन दर्शन सदैव उद्घोष करता आया है-‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।’
योग इसी सार्वभौमिक कल्याण का व्यवहारिक स्वरूप है। यह किसी जाति, भाषा, पंथ या देश की सीमाओं में बँधा नहीं है। यह सम्पूर्ण मानवता के लिए स्वास्थ्य, सद्भाव और शांति का पथ है।
साथियों,
स्वस्थ व्यक्ति ही सशक्त समाज और विकसित राष्ट्र की आधारशिला है। हम ऐसा भारत निर्मित करें जहाँ योग केवल अभ्यास न होकर जीवन का आधार बने, स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत लक्ष्य न होकर राष्ट्रीय शक्ति बने और आध्यात्मिक चेतना केवल साधना न होकर मानवता के कल्याण का मार्ग बने।
योग को व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व कल्याण की महायात्रा का माध्यम बनाना ही हमारी सनातन संस्कृति का संदेश और विकसित भारत की दिशा में हमारा सामूहिक संकल्प है।
मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि योग का यह दिव्य प्रकाश प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में स्वास्थ्य, शांति, संतुलन और आत्मिक आनंद का संचार करे तथा हमारा भारत ज्ञान, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों के आलोक से सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करता रहे।
आइए! हम सब योग को अपने जीवन का संस्कार, परिवार की परम्परा और राष्ट्र निर्माण का आधार बनाकर विकसित भारत के संकल्प को नई ऊर्जा दें।
इसी विश्वास, इसी संकल्प और इसी मंगलकामना के साथ मैं आप सभी को पुनः अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वन्दे मातरम्!
जय माँ भारती!
जय हिन्द!