17-04-2026:“शिक्षा पर एआई के प्रभाव” पर राज्य स्तरीय संवाद कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन
“जय हिन्द!
आज हम ज्ञान के केंद्र, देवभूमि की इस पावन धरा पर एकत्रित हुए हैं। उस भूमि पर, जहाँ सदियों से ऋषियों और मनीषियों ने ‘ज्ञान’ को ही जीवन का परम ध्येय माना है। ऐसे पवित्र परिवेश में आज का यह संवाद केवल एक तकनीक पर चर्चा नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड और हमारे महान राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने का एक ऐतिहासिक अवसर है।
आज हम एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ भविष्य केवल संभावना नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व बनकर हमारे सामने उपस्थित है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब कोई दूर की अवधारणा नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान का सशक्त यथार्थ है, जो हमारे बीच स्थापित हो चुका है। यह हमारे निर्णयों, व्यवस्थाओं और ज्ञान तक पहुँचने के तरीकों को निरंतर पुनर्परिभाषित कर रहा है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि ।प् हमारे जीवन और शिक्षा में आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम इस परिवर्तन के मूक दर्शक बने रहेंगे, या एक अनुशासित, दूरदर्शी और उत्तरदायी नेतृत्व के साथ इसका मार्गदर्शन करेंगे?
उत्तराखण्ड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि एक विचार है- देवभूमि का, ज्ञानभूमि का, तप और त्याग का। यह वही धरती है जहाँ से हमें अध्यात्म और विज्ञान, परंपरा और प्रगति के संतुलन का संदेश मिला है। आज हमें इसी संतुलन को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए एक नई शैक्षिक क्रांति की नींव रखनी है।
विद्वान साथियों,
हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का क्षेत्र अन्य सभी क्षेत्रों से भिन्न है। उद्योग या तकनीक में हुई भूलों को सुधारा जा सकता है, लेकिन शिक्षा में की गई एक छोटी-सी त्रुटि भी पीढ़ियों तक प्रभाव छोड़ती है। इसलिए इस दिशा में हमें अत्यंत सजगता, संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ आगे बढ़ना होगा।
हमें ।प् को “विकसित भारत 2047” के राष्ट्रीय संकल्प से जोड़कर देखना होगा। यदि हमें एक आत्मनिर्भर, सशक्त और ज्ञान-आधारित भारत का निर्माण करना है, तो उसकी आधारशिला हमारी शिक्षा प्रणाली ही होगी। मैं दावे से कह सकता हूँ कि ।प् सक्षम विद्यार्थी ही इस राष्ट्र के भविष्य के निर्माता बनेंगे।
मुझे विश्वास है कि उत्तराखण्ड ‘।प्.म्दंइसमक म्कनबंजपवद डवकमस ैजंजम’ बनने की पूर्ण क्षमता रखता है। हम एक ऐसा मॉडल विकसित कर सकते हैं, जो पूरे देश के लिए मार्गदर्शक बने और इसके लिए हमें स्पष्ट नीति, सुदृढ़ क्रियान्वयन और सतत मूल्यांकन को आधार बनाना होगा।
विद्वत साथियों,
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का मूल केंद्र ‘कैसे सिखाया जाए’ है, न कि ‘किस माध्यम से सिखाया जाए’। यदि हमारी शिक्षण-पद्धति सुदृढ़ नहीं है, तो तकनीक केवल कमियों को और व्यापक बना देगी। यदि हम दोषपूर्ण शिक्षण को डिजिटल रूप देंगे, तो हम केवल दोषपूर्ण अधिगम को बढ़ावा देंगे।
इसलिए ।प् को अपनाने से पहले हमें अपनी शिक्षण विधियों, पाठ्यक्रम और अधिगम प्रक्रियाओं को मजबूत बनाना होगा। ।प् एक उत्प्रेरक की तरह है, जो अच्छे को उत्कृष्ट बना सकता है, लेकिन कमजोर आधार को मजबूत नहीं कर सकता। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक साधन बनी रहे, उद्देश्य नहीं। 21वीं सदी में वही शिक्षा व्यवस्था सफल होगी, जो तकनीक को साधन और शिक्षक को केंद्र में रखेगी।
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या ।प् शिक्षक की जगह ले लेगा। मेरा उत्तर स्पष्ट है-नहीं। शिक्षक केवल ज्ञान का संप्रेषक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक, प्रेरक और चरित्र-निर्माता होता है।
“ज्मंबीमत ़ ।प् त्र ठमजजमत स्मंतदपदह व्नजबवउमे”- यह हमारी नीति का मूल मंत्र होना चाहिए। ।प् शिक्षकों को अधिक प्रभावी बना सकता है, उन्हें विश्लेषण और संसाधनों की शक्ति दे सकता है, और प्रशासनिक बोझ को कम कर सकता है। लेकिन एक शिक्षक ही छात्र की जिज्ञासा को पहचान सकता है, उसकी भावनाओं को समझ सकता है और उसे जीवन के मूल्यों से जोड़ सकता है। इसलिए ।प् को शिक्षक का सहयोगी बनाना है, प्रतिस्थापक नहीं।
तकनीक के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है, लेकिन शिक्षा में हमें संयम आवश्यक है। हमारी कक्षाएँ प्रयोगशालाएँ नहीं हैं, जहाँ बिना परीक्षण के हर नई तकनीक लागू कर दी जाए। हमें ‘च्पसवज → म्अंसनंजम → ैबंसम’ के सिद्धांत पर कार्य करना होगा। पहले परीक्षण, फिर मूल्यांकन और उसके बाद विस्तार। इससे हम यह सुनिश्चित कर पाएँगे कि हर पहल वास्तव में प्रभावी है और हमारे विद्यार्थियों के हित में है।
आज हमारे पास डेटा की कोई कमी नहीं है, लेकिन डेटा तभी सार्थक है, जब वह निर्णय और सुधार में परिवर्तित हो। ।प् हमें यह समझने की क्षमता देता है कि कहाँ सीखने में बाधाएँ हैं, कौन-से विद्यार्थी पीछे छूट रहे हैं और किस प्रकार के हस्तक्षेप आवश्यक हैं। यदि हम डेटा को सही ढंग से उपयोग करें, तो हम एक ऐसी शिक्षा प्रणाली बना सकते हैं, जो निरंतर स्वयं को बेहतर बनाती रहे। इन सिद्धांतों के आधार पर हमें जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे।
प्रबुद्ध शिक्षकों,
सबसे पहले, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्तराखण्ड के दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों तक भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचे। मेरे लिए ।प् की वास्तविक सफलता तब होगी, जब पिथौरागढ़ के किसी सीमावर्ती गाँव या चमोली की पहाड़ियों में बैठा छात्र भी वही अवसर प्राप्त करे, जो किसी महानगर के छात्र को मिलता है। इसके लिए हमें डिजिटल डिवाइड को समाप्त करना होगा और तकनीक को समावेशी बनाना होगा।
साथ ही, ।प् हमें भाषा की बाधाओं को तोड़ने का अवसर देता है। जब हमारे छात्र हिंदी, गढ़वाली और कुमाऊँनी जैसी अपनी मातृ भाषाओं में विज्ञान और तकनीक को समझेंगे, तभी शिक्षा वास्तव में प्रभावी बनेगी और ‘अंत्योदय’ का लक्ष्य साकार होगा। ।प् हमें व्यक्तिगत अधिगम की दिशा में भी नई संभावनाएँ देता है। हर बच्चा अद्वितीय है। ।प् के माध्यम से हम उसकी गति और रुचि के अनुसार शिक्षा प्रदान कर सकते हैं, जिससे उसका आत्मविश्वास और सीखने की गुणवत्ता दोनों बढ़ेंगे।
हमें ।प् के नैतिक उपयोग पर भी विशेष ध्यान देना होगा। बच्चों के डेटा की सुरक्षा, पारदर्शिता और गोपनीयता सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है। साथ ही, हमें अपने विद्यार्थियों में ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ विकसित करनी होगी- ताकि वे ।प् का उपयोग केवल उत्तर पाने के लिए नहीं, बल्कि सही प्रश्न पूछने के लिए करें। शिक्षा के मूल्यांकन की प्रक्रिया में भी हमें परिवर्तन लाना होगा। ।प् आधारित मूल्यांकन हमें रटने की संस्कृति से निकालकर कौशल, रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक क्षमता पर आधारित प्रणाली की ओर ले जा सकता है।
विद्वत साथियों,
।प् का उपयोग केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे हमें स्किल डेवलपमेंट, स्टार्टअप्स, उद्यमिता और रोजगार से जोड़ना होगा। हमारे युवा केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि अवसर सृजित करने वाले बनें, यही हमारी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। याद रखिए! ।प् आपको त्मचसंबम नहीं करेगा, लेकिन जो ।प् का उपयोग करना जानता है, वही भविष्य का नेतृत्व करेगा। इस दिशा में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उद्योग, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से हम एक सशक्त नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर सकते हैं।
मैं इस अवसर पर ‘संपर्क फाउंडेशन’ के संस्थापक-अध्यक्ष श्री विनीत नायर जी का विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहूँगा। शिक्षा के क्षेत्र में आपके दो दशकों के कार्य ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि हम शिक्षकों को केंद्र में रखें, तो शिक्षा मे व्यापक परिवर्तन संभव हैं।
‘संपर्क फाउंडेशन’ ने विगत वर्षों में लाखों बच्चों, हजारों विद्यालयों और शिक्षकों तक पहुँच बनाकर शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया है। ₹36 करोड़ के निवेश और 10,000 स्मार्ट क्लासरूम के लक्ष्य के साथ यह पहल उत्तराखण्ड के प्रति समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
मित्रों,
हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने ‘विकसित भारत 2047’ का जो स्वप्न देखा है, उसका मार्ग हमारी कक्षाओं से होकर गुजरता है। यदि हमें 2047 का भारत ‘विश्व गुरु’ बनाना है, तो हमें आज अपनी शिक्षा व्यवस्था को ‘एआई-पावर्ड’ बनाना ही होगा। हमें तकनीक को अपनाना भी है और उसे अपनी संस्कृति के अनुरूप ढालना भी है।
अंततः हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि जीवन का निर्माण करना है। तकनीक मिट्टी की तरह है और हमारी शिक्षा प्रणाली बीज की तरह- यदि दोनों का संतुलन सही हो, तो भविष्य का वृक्ष अवश्य ही फलदायी होगा। ।प् हमारी शक्ति बने और संस्कार हमारी पहचान। इसी संतुलन के साथ हम विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे।
याद रखिए! ‘राष्ट्र प्रथम’ हमारा मूल मंत्र है। हमारा हर नवाचार, हर प्रयास और हर कक्षा विकसित भारत के निर्माण की दिशा में एक सशक्त कदम होना चाहिए।
आइए! हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि देवभूमि उत्तराखण्ड को हम ‘।प् साक्षर’ बनाएँगे और एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करेंगे, जो आधुनिक भी हो और हमारी सनातन परंपराओं से जुड़ी भी हो। इसी विश्वास और संकल्प के साथ, मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
वंदे मातरम्! जय हिन्द!