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    01-04-2026 : एचएनबी उत्तराखण्ड मेडिकल एजुकेशन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित ‘चार धाम यात्रा के दौरान चिकित्सा समस्याएं और सड़क दुर्घटना सुरक्षा उपाय’ विषय पर माननीय राज्यपाल महोदय का सम्बोधन

    प्रकाशित तिथि : अप्रैल 1, 2026

    जय हिन्द!

    सर्वप्रथम, मैं भगवान बदरी-विशाल, बाबा केदार, माँ गंगोत्री और माँ यमुनोत्री के चरणों में सादर नमन करता हूँ। देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन धरा पर आयोजित यह संगोष्ठी न केवल एक विचार-विमर्श का मंच है, बल्कि यह मानव जीवन की रक्षा और आस्था की गरिमा को सुरक्षित रखने का एक गंभीर एवं संवेदनशील प्रयास भी है।

    आज हम जिस विषय पर चर्चा के लिए एकत्रित हुए हैं- “चार धाम यात्रा के दौरान चिकित्सा समस्याएँ एवं सड़क दुर्घटना सुरक्षा उपाय”- वह सीधे-सीधे लाखों श्रद्धालुओं के जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। मैं इस महत्वपूर्ण विषय पर संगोष्ठी के आयोजन हेतु एचएनबी उत्तराखण्ड मेडिकल एजुकेशन यूनिवर्सिटी की पूरी टीम को हार्दिक बधाई देता हूँ।

    देवभूमि उत्तराखण्ड में स्थित पवित्र धाम- बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिर एवं हेमकुण्ड साहिब केवल तीर्थस्थल नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, आस्था और आध्यात्मिक चेतना के जीवंत केंद्र हैं। यहाँ की यात्रा केवल दर्शन की यात्रा नहीं होती, बल्कि यह आत्मशुद्धि, धैर्य, संयम और विश्वास की परीक्षा भी होती है।

    भाइयों और बहनों,

    हिमालय की गोद में स्थित ये तीर्थ स्थल जितने दिव्य हैं, उतनी ही चुनौतीपूर्ण उनकी भौगोलिक परिस्थितियाँ भी हैं। ऊँचाई, कम वायुदाब, कम प्राणवायु, संकरी पगडंडियाँ, अचानक बदलता मौसम और लंबी चढ़ाइयाँ- ये सभी मिलकर इस यात्रा को कठिन बनाते हैं। विशेष रूप से मैदानी क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह परिवर्तन शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

    इसी संदर्भ में, उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाली स्वास्थ्य समस्याएँ अत्यंत गंभीर विषय हैं। ऊँचाई पर शरीर को पर्याप्त प्राणवायु नहीं मिल पाती, जिसके कारण ।बनजम डवनदजंपद ैपबादमेे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके लक्षण- सिरदर्द, चक्कर आना, जी मिचलाना, थकान और सांस लेने में कठिनाई- अक्सर सामान्य थकावट समझकर अनदेखा कर दिए जाते हैं, जो आगे चलकर गंभीर परिणाम दे सकते हैं।

    इसके अतिरिक्त, फेफड़ों में द्रव संचय और मस्तिष्क पर सूजन जैसी गंभीर अवस्थाएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं, जो जीवन के लिए अत्यंत खतरनाक होती हैं। अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि यात्रियों को इन लक्षणों के प्रति जागरूक किया जाए और प्रारंभिक अवस्था में ही उपचार उपलब्ध कराया जाए।

    मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि “आस्था के साथ सावधानी” इस यात्रा का मूलमंत्र होना चाहिए। यात्रा पर निकलने से पूर्व प्रत्येक यात्री को अपना स्वास्थ्य परीक्षण अवश्य कराना चाहिए। विशेष रूप से बुजुर्गों, हृदय रोगियों, मधुमेह एवं श्वसन संबंधी रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को चिकित्सकीय परामर्श लेकर ही यात्रा करनी चाहिए।

    यात्रा के दौरान धीरे-धीरे चढ़ाई करना, पर्याप्त जल का सेवन करना, शरीर को अनुकूल वातावरण में ढलने का समय देना तथा अत्यधिक परिश्रम से बचना अत्यंत आवश्यक है। यह छोटी-छोटी सावधानियाँ बड़े संकटों को टाल सकती हैं।

    अब मैं इस विषय के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा- सड़क दुर्घटना सुरक्षा।

    उत्तराखण्ड के पर्वतीय मार्ग अपनी सुंदरता के लिए विश्वविख्यात हैं, लेकिन उनकी भौगोलिक संरचना उन्हें संवेदनशील भी बनाती है। संकरी सड़कें, तीखे मोड़, गहरी खाइयाँ, भूस्खलन की आशंका और मौसम की अनिश्चितता- ये सभी कारक दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ाते हैं।

    हम सभी जानते हैं कि एक छोटी सी असावधानी कितनी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। इसलिए सड़क सुरक्षा केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि यह अनुशासन, संयम और जिम्मेदारी का विषय है।

    वाहन चालकों को नियंत्रित गति, निर्धारित मार्गदर्शन, और पूर्ण सतर्कता के साथ वाहन चलाना चाहिए। अनावश्यक आगे निकलने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए, विशेषकर मोड़ों पर। थकान की अवस्था में वाहन चलाना अत्यंत जोखिमपूर्ण है, अतः पर्याप्त विश्राम के बाद ही यात्रा करनी चाहिए।

    मैं विशेष रूप से यह भी कहना चाहूँगा कि नशामुक्त वाहन संचालन को हम एक अनिवार्य नियम के रूप में अपनाएँ। नशे की अवस्था में वाहन चलाना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह दूसरों के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है।

    भाइयों और बहनों,

    सड़क दुर्घटनाओं में “गोल्डन आवर” का विशेष महत्व होता है। यदि दुर्घटना के तुरंत बाद घायल व्यक्ति को एक घंटे के भीतर उचित चिकित्सा सहायता मिल जाए, तो अधिकांश जीवन बचाए जा सकते हैं। इसके लिए हमें अपने आपातकालीन चिकित्सा तंत्र को और अधिक सुदृढ़ बनाना होगा।

    मुझे यह जानकर प्रसन्नता है कि राज्य सरकार द्वारा चारधाम यात्रा मार्गों पर चिकित्सा शिविर, चलित चिकित्सा इकाइयाँ, रोगी वाहन सेवाएँ तथा आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं को निरंतर सशक्त किया जा रहा है। दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दूर-संचार आधारित चिकित्सा परामर्श की व्यवस्था भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है।

    आज इस अवसर पर ‘सुरक्षित चार धाम यात्रा’ से संबंधित स्मारिका का विमोचन किया गया है। मैं अपेक्षा करता हूँ कि यह केवल एक दस्तावेज न रहकर, प्रत्येक यात्री के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करे। इसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

    मैं इस अवसर पर यहाँ उपस्थित चिकित्सा विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों से विशेष आग्रह करता हूँ कि वे हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं पर और अधिक शोध करें। हमें यह समझना होगा कि इन क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार किस प्रकार की स्वास्थ्य नीतियाँ और व्यवस्थाएँ विकसित की जा सकती हैं।

    साथ ही, मैं यह भी सुझाव देना चाहूँगा कि स्थानीय समुदायों को इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाया जाए। टैक्सी चालक, घोड़ा-खच्चर संचालक, होटल व्यवसायी और स्थानीय स्वयंसेवक- ये सभी किसी भी आपात स्थिति में प्रथम सहायता प्रदान करने वाले महत्वपूर्ण सहयोगी बन सकते हैं। यदि इन्हें प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाए, तो अनेक अमूल्य जीवन बचाए जा सकते हैं।

    भाइयों और बहनों,

    चार धाम यात्रा केवल उत्तराखण्ड की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की आस्था का प्रतीक है। यह यात्रा राष्ट्रीय एकता का जीवंत उदाहरण है, जहाँ देश के विभिन्न कोनों से आए लोग एक ही भावना से जुड़े होते हैं। अतः उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारा सर्वाेच्च कर्तव्य है।

    हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम चार धाम यात्रा को “सुगम, सुरक्षित और सुव्यवस्थित” बनाएंगे। इसके लिए प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, स्थानीय समुदाय और स्वयं यात्रियों के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है।

    हमारा लक्ष्य केवल व्यवस्थाओं का विस्तार करना नहीं, बल्कि उनमें संवेदनशीलता और दक्षता का समावेश करना भी होना चाहिए। जब तक हर यात्री सुरक्षित और संतुष्ट होकर अपने घर नहीं लौटता, तब तक हमारी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

    “विकसित भारत 2047” के हमारे संकल्प में उत्तराखण्ड की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें एक ऐसे ‘हिमालयी विकास मॉडल’ की स्थापना करनी होगी, जिसमें तीर्थाटन, पर्यटन और स्वास्थ्य सुरक्षा का संतुलित और सशक्त समन्वय हो।

    मुझे पूर्ण विश्वास है कि आज की इस संगोष्ठी से प्राप्त सुझाव और निष्कर्ष भविष्य में हमारी नीतियों और व्यवस्थाओं को और अधिक प्रभावी बनाएंगे।

    अंत में, मैं एक बार पुनः आयोजकों, सभी विशेषज्ञों और प्रतिभागियों को इस महत्वपूर्ण विषय पर सार्थक चर्चा के लिए बधाई देता हूँ। आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम देवभूमि उत्तराखण्ड की इस पावन यात्रा को सुरक्षित, स्वास्थ्यपूर्ण और सफल बनाएंगे।

    ईश्वर से प्रार्थना है कि वे सभी श्रद्धालुओं की रक्षा करें, उन्हें उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें और हम सभी को इस पावन दायित्व के निर्वहन की शक्ति दें।

    वन्देमातरम! भारत माता की जय! जय हिन्द!