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    25-03-2026 : श्री देव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित “प्रज्ञानम्” एआई चैटबॉट के शुभारंभ अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : मार्च 25, 2026

    जय हिन्द!

    आज का यह ऐतिहासिक अवसर केवल एक तकनीकी नवाचार के शुभारंभ का नहीं है, बल्कि यह उस महान विचार की उद्घोषणा है जिसमें भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सशक्त संगम साकार हो रहा है।

    श्री देव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय द्वारा विकसित “प्रज्ञानम्” एआई चैटबॉट वास्तव में एक ऐसी दूरदर्शी पहल है, जो हमारे अतीत की गहराई और भविष्य की संभावनाओं को एक सूत्र में पिरोती है।

    मैं विश्वविद्यालय परिवार, तकनीकी टीम और उन सभी मेधावी मस्तिष्क को हृदय से बधाई देता हूँ, जिन्होंने रात-दिन के परिश्रम से इस नवाचार को मूर्त रूप दिया है।

    देवभूमि उत्तराखण्ड सदियों से ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक चेतना की भूमि रही है। यही वह धरती है जहाँ ऋषि-मुनियों ने तप, चिंतन और अनुसंधान के माध्यम से मानवता को जीवन का समग्र दर्शन दिया। आज उसी पावन भूमि से “प्रज्ञानम्” जैसे नवाचार का उदय होना यह प्रमाणित करता है कि हमारी परंपरा स्थिर नहीं है, बल्कि वह निरंतर विकसित होने वाली जीवंत धारा है।

    “प्रज्ञानम्”- यह नाम अपने आप में अत्यंत गूढ़ और प्रेरणादायक है। उपनिषदों में कहा गया है- “प्रज्ञानं ब्रह्म”, अर्थात् ज्ञान ही परम सत्य है। इस दृष्टि से यह चैटबॉट केवल सूचना का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान की उस चेतना का डिजिटल रूप है, जो मानव जीवन को दिशा प्रदान करती है। यह एक ऐसा मंच है जो ज्ञान को केवल संग्रहित नहीं करता, बल्कि उसे संवादात्मक, सुलभ और जीवंत बनाता है।

    भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और व्यापक परंपराओं में से एक है। वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, गणित और खगोल विज्ञान- इन सभी में निहित ज्ञान केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और व्यावहारिक भी है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सार्थक और समृद्ध बनाना है।

    आज जब विश्व तीव्र गति से तकनीकी प्रगति के शिखर की ओर बढ़ रहा है, तब भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। योग और ध्यान आज वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के लिए अपनाए जा रहे हैं। आयुर्वेद समग्र स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो रहा है। पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांत, जो हमारे वेदों में निहित हैं, आज वैश्विक चिंतन का केंद्र बन चुके हैं।

    हमारे प्राचीन मनीषियों की वैज्ञानिक दृष्टि अत्यंत उन्नत थी। शून्य और दशमलव प्रणाली की खोज ने विश्व गणित को नई दिशा दी। महर्षि कणाद का परमाणु सिद्धांत, आचार्य सुश्रुत की शल्य चिकित्सा प्रणाली और चरक की चिकित्सा पद्धति- ये सभी इस बात के सशक्त प्रमाण हैं कि भारत ज्ञान और विज्ञान दोनों का अग्रदूत रहा है। यह हमारा दायित्व है कि हम इस धरोहर को केवल गौरव का विषय न बनाएं, बल्कि इसे आधुनिक संदर्भ में उपयोगी बनाएं।

    अंततः, यह कहा जा सकता है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। यह ज्ञान न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर मानवता के समग्र विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

    आज आवश्यकता है कि हम इस ज्ञान को आधुनिक तकनीक, विशेषकर ।प् के साथ जोड़कर इसे और अधिक प्रभावी एवं सुलभ बनाएँ। ‘प्रज्ञानम्’ जैसे नवाचार इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, जो भारतीय ज्ञान परंपरा को डिजिटल युग में पुनर्जीवित करने का कार्य कर रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त ज्ञान-स्रोत सिद्ध होंगे।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने पर विशेष बल दिया गया है। यह नीति हमें यह संदेश देती है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है। “प्रज्ञानम्” इस दृष्टिकोण को साकार करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

    आज का युग कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा और नवाचार का युग है। तकनीक हमारे सोचने, सीखने और कार्य करने के तरीकों को बदल रही है। ऐसे समय में यह अत्यंत आवश्यक है कि आप तकनीक को केवल सुविधा का साधन न मानें, बल्कि इसे समाज और राष्ट्र के निर्माण का माध्यम बनाएं। याद रखिए! एआई आपके लिए एक सहायक है, मार्गदर्शक है, लेकिन अंतिम निर्णय और विवेक हमेशा मानव के पास ही रहेगा।

    मेरे युवा मित्रों,

    भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है और इस युवा शक्ति की आँखों में जो सपने पल रहे हैं, वही कल के भारत की नियति तय करेंगे। मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि आप बड़े सपने देखें और उन्हें साकार करने का साहस रखें।

    “राष्ट्र प्रथम” का भाव हमारे प्रत्येक कार्य का आधार होना चाहिए। कोई भी तकनीक तभी सार्थक है जब वह राष्ट्र के विकास में योगदान दे। “प्रज्ञानम्” के माध्यम से शिक्षा का सशक्तीकरण होगा, ज्ञान का प्रसार होगा और यह परोक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जब एक छात्र ज्ञानवान बनता है, तो वह केवल स्वयं को नहीं, बल्कि पूरे समाज को सशक्त करता है।

    आज हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ ‘डेटा’ नई ऊर्जा के रूप में उभर रहा है और ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ नई शक्ति के रूप में स्थापित हो रही है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने ‘विकसित भारत /2047’ का जो मार्ग प्रशस्त किया है, उसमें तकनीक ही हमारा सबसे बड़ा सारथी होगी। हमारा लक्ष्य केवल ‘विकसित भारत’ नहीं, बल्कि ‘समृद्ध भारत’ और पुनः ‘विश्व गुरु भारत’ की पदवी प्राप्त करना है।

    उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए, ऐसी डिजिटल पहल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारे पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए यह तकनीक एक सेतु का कार्य करेगी, जो उन्हें मुख्यधारा से जोड़ेगी। यह ‘डिजिटल इंडिया’ की उस परिकल्पना को साकार करता है, जिसमें हर नागरिक को समान अवसर प्राप्त हो।

    इसके साथ ही, यह भी आवश्यक है कि हम तकनीकी नैतिकता को सदैव ध्यान में रखें। एआई का उपयोग तभी सार्थक है जब वह सत्य, पारदर्शिता और मानव मूल्यों के अनुरूप हो। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बने, न कि भ्रम या असंतुलन का कारण।

    मैं विश्वविद्यालय प्रशासन से अपेक्षा करता हूँ कि “प्रज्ञानम्” को निरंतर उन्नत किया जाए। इसमें बहुभाषीय सुविधाओं, वॉइस इंटरफेस और शोध आधारित सामग्री को जोड़ा जाए, ताकि यह अधिक व्यापक और प्रभावी बन सके। साथ ही, इसे वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का भी प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि भारतीय ज्ञान प्रणाली का प्रसार विश्वभर में हो सके।

    देवभूमि उत्तराखण्ड को ज्ञान और अध्यात्म की भूमि कहा जाता है। आज “प्रज्ञानम्” के माध्यम से यह भूमि एक बार फिर ज्ञान-क्रांति के नए अध्याय का नेतृत्व कर रही है। यह पहल न केवल उत्तराखण्ड, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का विषय है।

    अंततः, मैं यही कहना चाहूँगा कि भारत का ज्ञान केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह भविष्य का मार्गदर्शक है। यदि हम इसे आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हैं, तो यह न केवल हमारे राष्ट्र को सशक्त बनाएगा, बल्कि पूरे विश्व को एक नई दिशा प्रदान करेगा।

    मेरे प्यारे युवाओं, याद रखिए! आप उस देवभूमि की संतान हैं जहाँ से गंगा का उद्गम होता है। जिस प्रकार गंगा अविरल बहती है, वैसे ही आपके ज्ञान की धारा भी निरंतर बहनी चाहिए। तकनीक का हाथ थामिए, लेकिन अपनी जड़ों यानि अपनी संस्कृति को कभी मत भूलिए।

    आइए! हम सब मिलकर इस डिजिटल क्रांति को ज्ञान क्रांति में परिवर्तित करें और भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ के गौरवशाली स्थान पर स्थापित करने हेतु संकल्पबद्ध हों।

    इन्हीं शब्दों के साथ, मैं श्री देव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय को इस उत्कृष्ट और दूरदर्शी पहल के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ और “प्रज्ञानम्” एआई चैटबॉट के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।

    आप सभी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

    वंदेमातरम्! भारत माता की जय! जय हिन्द!