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    24-03-2026 : विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर “जन-जन का रखे ध्यान – टीबी मुक्त अभियान” कार्यक्रम में माननीय राज्यपाल महोदय का उद्बोधन

    प्रकाशित तिथि : मार्च 24, 2026

    जय हिन्द!

    आज ‘विश्व क्षय रोग दिवस’ के अवसर पर हम यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र संकल्प के साथ एकत्रित हुए हैं। आज का यह दिन केवल एक स्वास्थ्य दिवस नहीं, बल्कि ‘स्वस्थ भारत’ के निर्माण हेतु हमारे सामूहिक संकल्प का प्रतीक है।

    सीमा पर युद्ध हो या शान्ति काल की चुनौतियाँ, हर परिस्थिति ने एक सैनिक के रूप में मुझे यह सिखाया है कि किसी भी शत्रु को पराजित करने के लिए स्पष्ट रणनीति, अटूट अनुशासन और अडिग संकल्प सबसे आवश्यक शस्त्र होते हैं। आज क्षय रोग-टीबी-भी हमारे लिए एक ऐसा ही अदृश्य शत्रु है, जो हमारे समाज को भीतर से खोखला और कमजोर करता है।

    आज हम यहाँ इसी चुनौती के विरुद्ध एक निर्णायक युद्ध का शंखनाद करने के लिए एकत्रित हुए हैं। यह केवल एक संघर्ष नहीं, बल्कि हमारे सामर्थ्य की परीक्षा है। हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाए। मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि यह लड़ाई हम अपनी पूरी शक्ति, आक्रामकता और प्रतिबद्धता के साथ जीतेंगे।

    भाइयों और बहनों,

    हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने ‘टीबी मुक्त भारत’ का जो आह्वान किया है, वह वैश्विक लक्ष्यों से भी कहीं अधिक महत्वाकांक्षी है। जहाँ पूरी दुनिया ने वर्ष 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा है, वहीं भारत ने इसे समय से पूर्व जड़ से मिटाने का संकल्प लिया है। यह संकल्प ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत /2047’ की आधारशिला है, क्योंकि एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण केवल स्वस्थ और सामर्थ्यवान नागरिक ही कर सकते हैं।

    आज का दिन विशेष है, क्योंकि आज से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तत्वावधान में ‘टीबी मुक्त भारत- 100 दिवसीय गहन अभियान’ का शुभारंभ हो रहा है। यह अभियान केवल सरकारी आंकड़ों को पूरा करने के लिए नहीं है, बल्कि यह तकनीक और केंद्रित प्रयासों के माध्यम से टीबी उन्मूलन की गति को कई गुना बढ़ाने का एक मिशन है।

    अब हम टीबी के विरुद्ध इस युद्ध में केवल रक्षात्मक नहीं रहेंगे। हम अपनी रणनीति में एक क्रांतिकारी बदलाव ला रहे हैं। अब हम केवल लक्षणों के आधार पर प्रतीक्षा नहीं करेंगे, बल्कि सक्रिय रूप से संदिग्ध मामलों की पहचान करेंगे। अब हमारा फोकस ‘सिम्पटोमैटिक’ से हटकर ‘प्रोएक्टिव स्क्रीनिंग’ की ओर बढ़ेगा।

    इस रणनीति का सबसे मजबूत स्तंभ है- आधुनिक तकनीक। मुझे यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि हम स्वास्थ्य सेवाओं में ।प् और डिजिटल क्रांति का समावेश कर रहे हैं। उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहाँ दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ एक बड़ी चुनौती हैं, वहाँ ।प्-सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे उपकरण एक वरदान साबित होंगे, जो त्वरित जांच और सटीक निदान में सहायक होंगे।

    ‘निक्षय वाहनों’ और मोबाइल मेडिकल यूनिट्स के माध्यम से हम देवभूमि के उन दूरस्थ गांवों तक पहुँचेंगे जहाँ बुनियादी सुविधाएँ पहुँचना कठिन होता है। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में आयोजित शिविरों में अब न केवल रक्तचाप और शुगर, बल्कि आधुनिक छ।।ज् जांच और डिजिटल एक्सरे की सुविधा भी सुनिश्चित की जाएगी।

    देवभूमि उत्तराखण्ड की पावन धरा से मैं यह घोषणा करना चाहता हूँ कि हमारा लक्ष्य केवल टीबी को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड को देश का पहला टीबी मुक्त राज्य बनाना है। मैं जानता हूँ कि हमारे पहाड़ ऊँचे हैं और रास्ते कठिन, लेकिन हमारे स्वास्थ्य कर्मियों और प्रदेशवासियों का मनोबल हिमालय से भी ऊँचा है।

    एक सैनिक के नाते मैं जानता हूँ कि अंतिम विजय ही सबसे महत्वपूर्ण होती है। हम अब इस अभियान के अंतिम और निर्णायक चरण में हैं। हमें अपनी चौकसी और तेज करनी होगी। कोई भी संभावित मरीज जांच से छूटना नहीं चाहिए और कोई भी उपचार बीच में अधूरा नहीं रहना चाहिए।

    यह लड़ाई केवल औषधियों और अस्पतालों की नहीं है, यह मानवीय संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व की भी है। प्रधानमंत्री जी की ‘निक्षय मित्र’ योजना संवेदना का एक अद्भुत सेतु है। टीबी का मरीज अक्सर समाज में अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो जाता है। निक्षय मित्र यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी मरीज इस लड़ाई में अकेला न रहे।

    मैं आज राज्य के सभी प्रबुद्ध नागरिकों, कॉर्पाेरेट घरानों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (च्ैन्े) और स्वयंसेवी संस्थाओं से आह्वान करता हूँ कि वे अधिक से अधिक संख्या में निक्षय मित्र के रूप में आगे आएँ। जब समाज का समर्थ वर्ग वंचित वर्ग का हाथ थामता है, तभी राष्ट्र का वास्तविक उदय होता है।

    मेरे प्रिय प्रदेशवासियों,

    टीबी के विरुद्ध हमारी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा मेडिकल नहीं, बल्कि ‘सामाजिक कलंक’ है। समाज में व्याप्त डर और भेदभाव के कारण लोग जांच कराने से कतराते हैं। आज इस मंच से मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि- टीबी लाइलाज नहीं है। यह पूरी तरह से ठीक होने वाली बीमारी है। हमें एक ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ मरीज बिना किसी संकोच के उपचार के लिए आगे आए। हमारा मंत्र स्पष्ट होना चाहिए- ‘‘मरीज से सहानुभूति और बीमारी से लड़ाई।’’

    हमारे युवा, एनसीसी कैडेट्स, एनएसएस और रेडक्रॉस के स्वयंसेवक इस जन-आंदोलन के सबसे मजबूत सेनानी हैं। आपकी ऊर्जा ही इस संदेश को गांवों की अंतिम पगडंडी तक ले जाएगी कि ‘‘दो हफ्ते से अधिक खांसी हो, तो तुरंत जांच कराएं।’’

    इस अवसर पर, मैं गुरु ग्रंथ साहिब की एक अमर पंक्ति का स्मरण करना चाहूँगा- (मन जीतै जग जीत)

    अर्थात- यदि हम अपने मन के संकल्प को जीत लें, तो हम पूरी दुनिया को जीत सकते हैं।

    यदि हमारा संकल्प अडिग है, तो टीबी जैसा शत्रु हमारे सामने टिक नहीं सकता। मैं उत्तराखण्ड के स्वास्थ्य विभाग के सभी अधिकारियों, डॉक्टरों, नर्सों और विशेष रूप से हमारी आशा बहनों और एएनएम कार्यकर्ताओं की सराहना करता हूँ। भीषण ठंड और कठिन रास्तों में आपके द्वारा दी जा रही सेवाएँ अनुशासन और सेवा भावना का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। आपकी यह सेवा ही सच्ची ‘ईश्वर सेवा’ और ‘राष्ट्र सेवा’ है।

    सरकार मरीजों को पोषण हेतु प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (क्ठज्) के माध्यम से निरंतर सहायता प्रदान कर रही है। हमारा प्रयास है कि यह सहायता पारदर्शी तरीके से हर पात्र व्यक्ति तक पहुँचे।

    आइए! आज इस अवसर पर हम सब मिलकर एक ‘निक्षय शपथ’ लें। यह केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण का हमारा वचन है। हम पीछे नहीं हटेंगे, हम थकेंगे नहीं, जब तक टीबी का पूर्ण उन्मूलन नहीं हो जाता।

    हमें एक ऐसा उत्तराखण्ड बनाना है जहाँ हर बच्चा, हर युवा और हर बुजुर्ग पूर्णतः स्वस्थ और सुरक्षित हो। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हमारे समन्वित प्रयासों और आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस संगम से यह ‘100 दिवसीय गहन अभियान’ एक स्वर्णिम सफलता प्राप्त करेगा।

    याद रखिये!

    टीबी हारेगा, उत्तराखण्ड जीतेगा! टीबी हारेगा, भारत जीतेगा!
    इन्हीं शब्दों के साथ, मैं इस अभियान की भव्य सफलता की मंगलकामना करता हूँ।

    जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!