23-03-2026:बिहार राज्य स्थापना दिवस पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन
जय हिन्द!
आज उत्तराखण्ड की इस पावन धरा पर ‘लोक भवन’ का यह प्रांगण एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संगम का साक्षी बन रहा है। आज हम हिमालय की इन पवित्र कंदराओं के बीच बैठकर उस ‘मगध’ और ‘मिथिला’ की सुगंध महसूस कर रहे हैं, जिसने सदियों से भारत के मस्तक को वैश्विक मंच पर गौरव से ऊँचा रखा है।
मैं ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ अभियान के तहत आयोजित इस भव्य समारोह में आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ और समस्त बिहार वासियों को स्थापना दिवस की अनंत शुभकामनाएँ देता हूँ।
जब हम बिहार का नाम लेते हैं, तो यह केवल एक प्रदेश का नाम नहीं, बल्कि भारत की चेतना का केंद्र बिंदु है। यह वह पावन धरती है जिसने संसार को ‘लोकतंत्र’ का प्रथम पाठ पढ़ाया। वैशाली की वह पावन मिट्टी, जहाँ गणतंत्र की जड़ें रोपी गईं, आज भी विश्व को सिखाती है कि जनशक्ति ही राष्ट्रशक्ति है।
इस प्रदेश ने विश्वविद्यालयों के माध्यम से उस समय विश्व को ज्ञान के आलोक से आलोकित किया, जब शेष दुनिया अंधकार में थी। यह वह धरा है, जहाँ भगवान बुद्ध और महावीर से ‘अहिंसा’ की धारा निकली, जहाँ चाणक्य की नीति से ‘न्याय’ उपजा, और जहाँ सम्राट चंद्रगुप्त व महान अशोक के पराक्रम से अखंड भारत का स्वप्न सिद्ध हुआ।
उत्तराखण्ड और बिहार का संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है,जहाँ एक ओर बद्रीनाथ-केदारनाथ मोक्ष का द्वार हैं, वहीं गया पितृ मोक्ष का महान तीर्थ है। यह संबंध हमारी सनातन सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
यह अटूट कड़ी त्रेतायुग की उस स्मृति से जुड़ी है, जब अयोध्या के राजकुमार श्री राम ने मिथिला की राजकुमारी माता सीता का वरण किया था। आज लोक भवन का यह आयोजन उसी ‘राम-सिया’ के आत्मीय संबंधों का आधुनिक और भव्य स्वरूप है।
गंगा मइया हमें जोड़ती हैं, यदि यहाँ से उनका निर्मल उद्गम होता है, तो बिहार के विशाल मैदानों में वही गंगा करोड़ों का पोषण करती हुई महासागर की ओर बढ़ती हैं।
हमारी संस्कृतियों का मूल आधार ‘प्रकृति वंदना’ है। जहाँ उत्तराखण्ड का ‘ईगास’ हिमालय की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है, वहीं बिहार का ‘छठ महापर्व’ अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य की उपासना कर पूरी दुनिया को आशावाद का संदेश देता है। दोनों ही पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के प्रति आशावाद का अद्भुत संदेश देते हैं।
जब उत्तराखण्ड के ढोल-दमाऊ की थाप और बिहार की शहनाई की गूँज एक सुर में मिलती है, तब वह ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ की वास्तविक समवेत ध्वनि बन जाती है। यह सामंजस्य सिद्ध करता है कि हमारी लोक-आत्मा एक ही है।
बिहार की माटी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ‘बौद्धिक उर्वरता’ है। चाणक्य से लेकर आर्यभट्ट तक और राजेंद्र बाबू से लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक, बिहार ने देश को सदैव वैचारिक नेतृत्व दिया है।
आज उत्तराखण्ड के विकास में भी बिहार की मेधा का महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ शासन-प्रशासन में कार्यरत भारतीय प्रशासनिक और पुलिस सेवा के अधिकारी हों, या शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र के कर्मठ साथी, आप सभी ने अपनी बुद्धिमत्ता से देवभूमि को सींचा है।
साथ ही, मैं उन श्रमिक भाई-बहनों को भी नमन करता हूँ, जो बिहार से आकर उत्तराखण्ड की दुर्गम पहाड़ियों पर सड़कों, सुरंगों और बांधों का निर्माण कर रहे हैं। आपका श्रम केवल निर्माण नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के भविष्य की नींव गढ़ रहा है।
मेरे युवा साथियों,
तकनीक और नवाचार के इस युग में एआई और डिजिटल क्रांति विकास के नए ‘अमोघ अस्त्र’ हैं। मेरा आह्वान है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि समाज की जटिल समस्याओं के समाधान हेतु होना चाहिए। आपकी मेधा और आधुनिक तकनीक का यह संगम ही ‘विकसित भारत’ के संकल्प को सिद्ध करने का सामर्थ्य रखता है।
‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के लिए भविष्य की दृष्टि
इस मंच से मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमारे युवा नालंदा के अवशेषों से प्रेरणा लें और बिहार के युवा ऋषिकेश के योग विज्ञान की गहराई को समझें। जब नालंदा की ज्ञान परंपरा और ऋषिकेश की योग साधना का संगम होगा, तब एक सशक्त, संतुलित और जागरूक भारत का निर्माण होगा।
मेरे युवा साथियों!
आप इस राष्ट्र के भाग्य विधाता हैं। बिहार की माटी का संदेश है-‘‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।’’ कार्य केवल इच्छा करने से नहीं, बल्कि कठोर परिश्रम से सिद्ध होते हैं। बिहार का इतिहास संघर्ष से सफलता की सबसे बड़ी गाथा है।
अपनी जड़ों को कभी न भूलें, अपनी भाषा, अपने लोकगीत और अपनी परंपराओं पर सदैव गर्व करें। आज का यह आयोजन केवल एक समारोह नहीं, बल्कि एक संकल्प है कि हम भाषाई और क्षेत्रीय दीवारों को तोड़कर एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहाँ सबसे बड़ा गौरव केवल ‘भारतीय’ होना होगा।
भाइयों और बहनों,
भारत की विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि वह सूत्र है जो हमें एक माला में पिरोता है। राष्ट्र की एकता और अखंडता वह अभेद्य कवच है, जिसे हमें अपनी वैचारिक और सांस्कृतिक प्रगाढ़ता से और भी मजबूत करना होगा। जब ‘स्व’ से ऊपर ‘सर्वाेपरि राष्ट्र’ का भाव जागृत होगा, तभी एक अखंड और शक्तिशाली भारत का निर्माण संभव होगा।
हमारी क्षेत्रीय पहचान हमें विशिष्ट बनाती है, लेकिन हमारी राष्ट्रीय पहचान हमें ‘अजेय’ बनाती है। हमें ‘राष्ट्र प्रथम’ के मंत्र को अपने जीवन का मूल आधार बनाना होगा। जब प्रत्येक नागरिक निजी और क्षेत्रीय हितों से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति समर्पित होकर कार्य करेगा, तभी हम एक विकसित और सुरक्षित भारत की सशक्त नींव रख पाएंगे। इसलिए हमारी निष्ठा का केंद्र सदैव ‘माँ भारती’ होनी चाहिए।
मेरे युवा साथियों,
वर्ष 2047 का ‘विकसित भारत’ केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि हमारी पीढ़ियों के स्वर्णिम भविष्य का आधार है। आज इस मंच से मेरा आह्वान है कि आप अपनी ऊर्जा और नवाचार को राष्ट्र-निर्माण की वेदी पर अर्पित करें। जब हमारी मेधा अपने पुरुषार्थ से एक साथ संकल्पित होकर विकसित भारत के निर्माण में योगदान देगी, तभी हम पराधीनता की मानसिकता को त्यागकर भारत को पुनः ‘विश्व गुरु’ के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर सकेंगे।
अंत में, मैं पुनः बिहार की उस महान माटी को नमन करता हूँ, जिसने भारत को प्रथम राष्ट्रपति के रूप में सरलता की प्रतिमूर्ति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और राष्ट्रकवि दिनकर जैसा तेजस्वी स्वर दिया।
बिहार का भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि जहाँ ‘श्रम’ और ‘शास्त्र’ का संगम होता है, वहाँ प्रगति की विजय सुनिश्चित होती है।
बिहार की वह अदम्य शक्ति सदैव जाग्रत रहे। यह राज्य प्रगति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहे, यहाँ की लोक कलाएँ फलती-फूलती रहें, ऐसी मेरी मंगलकामना है।
राष्ट्र सर्वाेपरि रहे, यही हमारा अंतिम ध्येय हो। आइए! हम सब मिलकर ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए ‘विकसित भारत /2047’ के महान लक्ष्य को साकार करें।
इन्हीं शब्दों के साथ, आप सभी को पुनः बिहार राज्य स्थापना दिवस की हृदय की गहराइयों से शुभकामनाएं देते हुए मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
जय हिन्द! जय बिहार! जय उत्तराखण्ड!