22-03-2026:अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव-2026 के अवसर पर माननीय राज्यपाल महोदय का संबोधन
जय हिन्द!
उपस्थित देवतुल्य संत-महात्मागण, विश्व के कोने-कोने से पधारे योगाचार्यगण, विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधिगण! आप सभी को मेरा सादर प्रणाम।
आज गंगा की इन कल-कल करती लहरों के बीच, हिमालय की शीतल गोद में और ऋषिकेश की इस पावन माटी पर खड़े होकर मेरा मन असीम शांति और गौरव का अनुभव कर रहा है।
देवभूमि उत्तराखण्ड के इस दिव्य प्रांगण में, जहाँ वायु के प्रत्येक झोंके में मंत्रों की प्रतिध्वनि है, इस ऋषियों की पावन भूमि पर, जहाँ योग ही जीवन है और योग ही विश्वास है। आप सभी का हार्दिक अभिनंदन है।
ऋषिकेश वैश्विक चेतना और साधना का केंद्र है, जब हम ऋषिकेश की बात करते हैं, तो हम केवल एक भौगोलिक स्थान की बात नहीं करते, हम उस स्थान की बात करते हैं जहाँ सहस्रों वर्षों से मानवीय चेतना को परिष्कृत किया गया है। यह केवल एक नगर नहीं, बल्कि विश्व की आध्यात्मिक राजधानी है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने भी इसी क्षेत्र में तपस्या और ध्यान किया था। तब से लेकर आज तक, यह भूमि साधना, तप और आत्मबोध की परंपरा को निरंतर प्रवाहित कर रही है।
आज जब मैं यहाँ 30 देशों के विदेशी मेहमानों को देखता हूँ, तो मुझे अनुभव होता है कि ऋषिकेश आज भी विश्व पटल पर योग साधकों के स्थायी निवास के रूप में प्रतिष्ठित है।
गढ़वाल मंडल विकास निगम और पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह ‘अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव’ पिछले 35 वर्षों से योग की इसी मशाल को विश्व तक पहुँचाने का सेतु बना हुआ है। इस वर्ष आयोजित इस उत्सव में 2500 से अधिक योग साधकों और 150 से अधिक योगाचार्यों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि योग की प्यास आज पहले से कहीं अधिक तीव्र है।
इस महोत्सव का सौभाग्य है कि हमें आर्ट ऑफ लीविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर जी, जैन धर्म की परम विदुषी आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी, और योगी जीवानन्द जी जैसे सिद्ध पुरुषों का सानिध्य प्राप्त हुआ। इन महापुरुषों के विचार हमें सिखाते हैं कि योग केवल शरीर को मोड़ने का नाम नहीं है।
योग न केवल शरीर को साधने की कला है, यह तो स्वयं से स्वयं के मिलन की एक विधा है। जो अंतर्मन के अंधकार को मिटा दे, योग वही दिव्य प्रकाश और अटूट श्रद्धा है।
इन सात दिनों में प्राणायाम, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और आध्यात्मिक प्रवचनों के माध्यम से जो ज्ञान की गंगा यहाँ बही है, उसने प्रतिभागियों को ‘समग्र स्वास्थ्य’ का वह मंत्र दिया है जिसकी आज के युग में सबसे अधिक आवश्यकता है।
योग महोत्सव केवल क्रियाओं का समूह नहीं, बल्कि यह एक उत्सव है। यहाँ ब्रह्म मुहूर्त में होने वाले हवन-यज्ञ, माँ गंगा की अलौकिक आरती और फिर संगीत का वह जादू, जिसने ऋषिकेश को स्वर्ग बना दिया।
विख्यात भजन गायक अनूप जलोटा जी, लखविंदर वडाली और इस्कॉन मंडली की स्वरलहरियों ने भक्ति रस का जो संचार किया, वह अविस्मरणीय है। और आज, उत्तराखण्ड के लोक-हृदय सम्राट नरेंद्र सिंह नेगी जी अपनी आवाज से इस उत्सव को पूर्णता प्रदान करेंगे। यह सिद्ध करता है कि संगीत और संस्कृति, योग के ही पूरक अंग हैं।
मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि इस बार हमारे बीच भारतीय महिला क्रिकेटर स्नेहा राणा जी उपस्थित रहीं। उन्होंने अपने संघर्ष और कामयाबी के जो मंत्र साझा किए, वे युवाओं के लिए प्रेरणा पुंज हैं। खेल के मैदान में एकाग्रता और मानसिक दृढ़ता के लिए योग से बढ़कर कोई साधन नहीं है।
इस वर्ष हमने योग को सीमाओं से बाहर निकाला है। ‘रन फॉर योग’ और ‘बीटल्स आश्रम’ (चैरासी कुटिया) तक की हेरिटेज वॉक जैसे कार्यक्रमों ने योग को एक ‘लाइफस्टाइल’ के रूप में स्थापित किया है।
जब विदेशी साधक इन धरोहरों के बीच योग क्रियाएँ करते हैं, तो वे भारत के गौरवशाली इतिहास से सीधे जुड़ जाते हैं। निगम की टीम द्वारा पर्यटन को आगे बढ़ाने का यह प्रयास सराहनीय है।
आज जब विश्व के कोने-कोने से लोग यहाँ आए हैं, तो यह पंक्तियाँ स्वतः ही चरितार्थ होती हैं-
सरहदें बाँट सकती हैं जमीन को, पर चेतना को नहीं, योग वह सेतु है जो दिलों को जोड़ता है। भाषा कोई भी हो, पर स्वास्थ्य का सुर एक है, यही वह मार्ग है जो विश्व को शांति की ओर मोड़ता है।
माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में योग आज वैश्विक जन-आंदोलन बन चुका है, यह भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का प्रतीक है। आज विश्व योग को अपनी सांस्कृतिक सीमाओं से ऊपर उठकर अपना रहा है।
अंत में, मैं यही कहूँगा कि उत्तराखण्ड केवल गंगा का ही नहीं, बल्कि योग और अध्यात्म का भी उद्गम स्थल है। यहाँ की जड़ी-बूटियाँ, शुद्ध वायु और हिमालय की शांति इसे विश्व का ‘वेलनेस हब’ बनाती हैं।
मेरा विश्वास है कि यह महोत्सव उत्तराखण्ड को वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन के शिखर पर स्थापित करेगा।
संबोधन समाप्त करते हुए मैं बस यही कामना करता हूँ,
‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः के मंत्र को साकार करें,
तन को मंदिर और मन को गंगा की धार करें।
ले जाएँ यहाँ से योग की वह अनमोल ज्योति,
जिससे जगमग सारा संसार करें।’’
मैं इस भव्य आयोजन के लिए सभी संत-महात्माओं, प्रतिभागियों, पर्यटन विभाग और सहयोगी संस्थाओं का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। आप सभी की यह योग-यात्रा निरंतर जारी रहे।
जय हिन्द! जय उत्तराखण्ड!